घर से भागकर मुंबई आए बच्चे क्या करते हैं?

  • 24 अगस्त 2016
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हर माह कम से कम 6000 बच्चे घर से भागकर मुंबई आते हैं.

इनमें से कई सड़कों पर जीते हैं, कई ग़लत धंधे में जुड़ते हैं और कई नशे में गुम हो जाते हैं.

एस. हरिहरन के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ होता अगर वह वापस घर न पहुंचते.

हरिहरन केरल के पल्लकाड से तीन बार भागे. उन्होंने बताया, “मेरे घर का माहौल बहुत सख्त था और छोटी सी बात पर भी मार पड़ती थी. पहली बार मैं 12 साल की उम्र में घर से भागा लेकिन लौट आया.”

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वो आगे कहते हैं, “दूसरी बार जब घर से भागा तब पहले मुंबई और फिर पुणे पहुंचा, जहां एक पंचर बनाने वाली दुकान पर, फिर ट्रक में हैल्पर के तौर पर भूखे पेट हफ़्तों तक रहा. इसके बाद दोबारा घर जा पहुंचा.”

हरिहरन कहते हैं कि लौटने के बाद पहले तो सब ठीक था, लेकिन एक बार सिगरेट पीने के कारण पड़ी मार के बाद वो 16 साल की उम्र में तीसरी बार घर से भागे. इस बार अलग अलग शहरों से हो कर मद्रास में एक चाय की दुकान से लेकर रेस्तरां और फिर बेकरी में नौकरी की.

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एक साल जूझने के बाद हरिहरन वापस अपने गाँव लौटे और इस बार घरवालों ने उन्हें भागने नहीं दिया. हरिहरन भी ग़रीबी का सबक़ सीखने के बाद बदल चुके थे.

ऐसे में हरिहरन ने स्ट्रीट चिल्ड्रन फाउन्डेशन की स्थापना की और इसी फ़ाउंडेशन के साथ एक दूसरी संस्था 'समतोल' के साथ वो घर से भाग कर आए बच्चों पर विशेष काम करने लगे.

हरीहरन का कहना है, “बच्चे कोई फ़िल्म स्टार को देखने या खुद हीरो बनने मुंबई नहीं आते. घर में मार पीट होना, माता-पिता का सख्त रुख़, पाबंदियां या यौन शोषण होने पर, या माँ-बाप का प्यार न मिलने पर बच्चे घर छोड़कर भाग आते हैं.”

वो कहते हैं, “जैसे उत्तरी भारत में बच्चे भागकर दिल्ली पहुंचते हैं, वैसे ही मध्य भारत और दक्षिण भारत के बच्चों ने मुंबई का नाम सुना होता है और वो मुंबई आ जाते हैं. ज़्यादातर बच्चे 9-16 की उम्र में ही ऐसा करते हैं.”

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अमोल धनावडे जो 14 साल की उम्र में घर से भाग कर मुंबई आ गए थे, बताते हैं, “में सोलापूर के पास रहता था और एक दिन गाय को चारा देना भूल गया, खेलने चला गया, जिस पर मेरे चाचा ने मुझे बहुत मारा. मैं गुस्से में गांव से पैदल ही निकल गया और स्टेशन पहुंच कर मुंबई आ गया.”

वो बताते हैं, “सुबह होने पर भूख लगी थी लेकिन भीख मांगने में शरम आ रही थी. ऐसे में मैंने एक लड़के से मदद मांगी और उसके साथ रह कर बोतल वगैरह इकठ्ठा करने का काम करने लगा. हम दोनों साथ में बीजापुर, हैदराबाद, गोआ तक घूमे और दो साल ऐसे ही निकल गए. भूखा रहना पडता था, तब मैं नशा भी करने लगा था. एक बार मुझे इस संस्था के लोग मिले. कुछ ट्रेनिंग के बाद मुझे घर भेजा गया. मुझे डर लग रहा था कि मुझे घर पर मार पड़ेगी, लेकिन सब खुश हुए. मैं स्कूल जाने लगा. अब मैं 24 साल का हूं, ग्रेज्युएट हो चुका हूं और इलेक्ट्रिश्यन हूं.”

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भागकर आने वाले बच्चों की मदद में लगी प्रसिद्धी म्हात्रे कहती हैं, “सबसे मुश्किल होता है बच्चों से सच बुलवाना. बच्चे अपनी पहचान या पता मार के डर से नहीं बताते. कई बार मां बाप के मृत होने की बात कहते हैं.”

एक सात साल के बच्चे का उदाहरण देते हुए वो कहती हैं, “हैदराबाद से मुंबई आ गए उस बच्चे को हिंदी भी नहीं आती थी और वो अपने माता पिता का नाम बताने को भी राजी नहीं था. एक दिन हमने उसके गाँव का नाम पता कर लिया और फिर बड़ी मुश्किल से उसके घरवालों को ढूंढकर उसे घर पहुंचाया.”

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प्रसिद्धी बताती है कि एक बार लखनऊ से एक बड़े अफ़सर का बेटा मुंबई भाग आया और कहता था कि सचिन को देखना चाहता था.

“ हम इन मामलों से निपटने के लिए रेलवे स्टेशनों पर अपने कार्यकर्ताओं को रखते हैं जो भागे हुए बच्चों को पहचान कर उन्हें समझा कर संस्था तक ले आते हैं. फिर 45 दिनों तक उनकी काउन्सलिंग करने के बाद उन्हें घर ले जाया जाता है.”

स्ट्रीट चिल्ड्रन फ़ाउंडेशन अभी तक प्रशासन के साथ मिलकर मुंबई आनेवाले लगभग 10,000 बच्चों को बचा चुका है और इनमें से 6000 को घर पहुंचाया जा चुका है.

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क्या यह संस्था सिर्फ़ भाग कर आने वाले लड़कों की ही मदद करती है?

इस पर उनका कहना है कि लड़कियों के मामले में संस्था के पास अभी अधिकार नहीं है और प्रशासन के नियमों के चलते अभी वो सिर्फ़ लड़कों की ही मदद कर रहे हैं. लेकिन लड़कियों को भी बेसहारा नहीं छोड़ा जाता, बल्कि पुलिस या रेलवे अधिकारियों के पास छोड़ा जाता है.

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हरिहरन मानते हैं कि यह मुद्दा बेहद संवेदनशील है और इस पर ध्यान दिए जाने की ज़रुरत है.

वो कहते हैं, “घर छोड़कर भागने वाले बच्चे बहुत हिम्मती होते हैं और उन्हें गंभीरता से लिया जाना चाहिए. वह सड़कों पर जीने में अपना बचपना खो देते हैं और भूख ख़त्म करने के लिए वैक्स या शू पॉलिश का नशा करने लगते हैं."

हरिहरन कहते हैं कि कई बच्चों के साथ यौन शोषण भी होता है. ऐसे में वो आपराधिक काम करने लगते हैं. वो बताते हैं कि उन्होंने खुद भी ऐसे दिन देखे हैं और इसलिए वो ऐसे बच्चों का जीवन सुधारने की कोशिश करते हैं.

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