बिना नदियों के उफान के ही पटना डूब गया

  • 26 अगस्त 2016
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पटना के इतिहास में गंगा के पानी का स्तर 21 अगस्त को सबसे ज़्यादा था. इसने 1994 के 50.27 मीटर के लेवल का रिकॉर्ड तोड़ दिया था.

लेकिन इससे 10 दिन पहले ही वहां सूखे की हालत थी. नासा ने 10 अगस्त और 23 अगस्त के दो फ़ोटो जारी किए हैं, उससे यह अंतर पता चल रहा है कि 10 दिन में ही वहां बाढ़ आ गई.

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इस बार पटना में जो बाढ़ देखी गई है वह असामान्य है. बिहार में जब भी बाढ़ आती है तो कहा जाता है कि नेपाल से पानी आ गया. नेपाल से आने वाली कोसी, गंडक, घाघरा, महानंदा और शारदा जैसी नदियों से ही वहां बाढ़ आती रही है. लेकिन इस बार जब बाढ़ आई तो इनमें से कोई भी नदी उफ़ान पर नहीं थी.

ये बाढ़ इसलिए आई क्योंकि मध्य प्रदेश में सोन नदी पर 'बाण सागर' एक बहुत बड़ा बांध है. 19 अगस्त को सुबह वो बांध 93 फ़ीसद भर चुका था और वहां से अचानक 6 लाख क्यूसेक पानी छोड़ दिया. वो उस समय छोड़ा जब पटना के निचले इलाके में बहुत बारिश हो रही थी.

इन दोनों की वजह से पटना के इतिहास में अचानक सबसे ज़्यादा पानी चढ़ गया. उसके दो दिन बाद यह बलिया और भागलपुर तक चला गया.

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इसका दूसरा कारण जो बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी बता रहे हैं. असल में फरक्का बांध की वजह से गंगा में संकुचन आ गया है. इससे नदी में गाद जमा हो गई है और उसका जलस्तर ऊपर चढ़ गया है.

हमें यह स्वीकार करना होगा कि हमारे पर्यावरण और मानसून की स्थिति में बाढ़ तो आएगी और बाढ़ कोई आपदा नहीं है, यह भी हमें मानना होगा. लेकिन हमें सोचना है कि इसे आपदा बनने से कैसे रोका जाए.

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हम विकास के लिए सड़क बनाते हैं, रेलवे लाइन बनाते हैं, शहरीकरण करते हैं, नहर और बांध बनाते हैं. यह सब काम करते समय हमें ध्यान रखना होगा कि नदी घाटी पर इसका क्या असर पड़ रहा है. हमें ध्यान रखना होगा कि पानी बहने के रास्ते में हम क्या रूकावट डाल रहे हैं.

नदियां केवल पानी नहीं लाती है. ख़ासकर गंगा, ब्रह्मपुत्र और कोसी जैसी नदियां बड़े पैमाने पर अपने साथ गाद लेकर आती हैं. उस गाद का हम प्रबंधन नहीं करेंगे तो भविष्य में बड़े पैमाने पर विनाश को न्यौता देंगे. बिहार या यूपी में यही हुआ है जहां नदियों का तट ऊपर उठ गया है.

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नदी का काम है बहना और अगर हम इसका ध्यान रखेंगे तो हम किसी भी विनाश से बच सकते हैं. आज से 60 साल पहले बाढ़ आती थी, तो लोग उसका स्वागत करते थे. कोसी या गंगा नदी अपने साथ जो गाद लाथी थी, वो पूरे इलाके में फैला देती थी जिससे ज़मीन की उर्वरता बढ़ जाती थी.

आज हमने तटबंध बना दिए हैं, उससे सिल्ट(गाद) तो बह जाती है, लेकिन रेत और भारी तत्व रह जाते हैं. ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि हमने जब तटबंध बनाया तो हमने इसके बारे में सोचा नहीं. अगर हम नदी के प्रवाह और गाद का प्रबंधन सही तरीके से करेंगे तभी बाढ़ से निपट पाएंगे.

( बीबीसी संवाददाता अमरेश द्विवेदी के साथ बातचीत पर आधारित)

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