कश्मीर के हालात कैसे सुधारेगी सरकार?

  • 7 सितंबर 2016
केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह. इमेज कॉपीरइट EPA

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बुधवार को कश्मीर के मुद्दे पर घाटी से लौटे सर्वदलीय सांसदों से मिल रहे हैं. कहा जा रहा है कि सरकार के पास कश्मीर के संकट के हल के लिए एक एक्शन प्लान है, जिसपर इस बैठक में चर्चा होगी.

पिछले हफ़्ते 20 पार्टियों के 26 सांसदों का एक सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल घाटी गया था, जो वहां से ख़ाली हाथ वापस दिल्ली लौट आया है. सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल से अलगाववादी हुर्रियत कांफ्रेंस के नेता सैय्यद अली शाह गिलानी और दूसरे अहम नेताओं ने मिलने से इंकार कर दिया था.

आठ जुलाई को सुरक्षा बलों की कार्रवाई में चरमपंथी बुरहान वानी के मारे जाने के बाद से जारी हिंसा में घाटी में अब तक 70 से अधिक प्रदर्शनकारी मारे जा चुके हैं. इस दौरान सुरक्षाकर्मियों समेत कई हज़ार लोग घायल हुए हैं.

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हुर्रियत कांफ्रेंस ने बुरहान की मौत के बाद आम हड़ताल बुलाई थी, जो अब तक जारी है. कश्मीर मामलों के विशेषज्ञ जानते हैं कि कश्मीर संकट को हल करने के लिए हुर्रियत से बातचीत ज़रूरी है.

हुर्रियत नेताओं पर दबाव बढ़ाने के लिए केंद्रीय सरकार ने ऐसे संकेत दिए हैं कि वो हुर्रियत नेताओं पर दबाव बढ़ा सकती है.

मोदी सरकार देर से ही सही लेकिन कश्मीर संकट के समाधान की कोशिश में अब जुट गई है. विशेषज्ञ कहते हैं कि सरकार को गंभीरता ज़रूर दिखानी चाहिए, ताक़त नहीं.

सरकार को अलगाववादी नेताओं के हाथ मरोड़ने से पहले हर हरबे का इस्तेमाल कर लेना चाहिए जिससे हुर्रियत के नेता बातचीत के लिए तैयार हो जाएं.

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पिछले महीने जब मैं घाटी में था तो प्रदर्शनकारियों ने बताया था कि इस बार हुर्रियत नेता हड़ताल ख़त्म करने की हिम्मत नहीं करेंगे. अगर इस बार उन्होंने ये हरकत की तो वो उनके घरों पर भी पथराव करेंगे.

प्रदर्शनकारियों के मुताबिक़ 2008 और 2010 में हिंसा के बाद हुर्रियत बातचीत के लिए आगे आई थी, इससे घाटी के लोगों को मायूसी हुई थी.

हड़ताल को जारी रखना हुर्रियत के नेताओं की मजबूरी हो सकती है. सरकार को ये समझना होगा. गृहमंत्री राजनाथ सिंह पिछले एक महीने में तीन बार कश्मीर जा चुके हैं. लेकिन वो समझते हैं कि केवल श्रीनगर के आरामदायक नेहरू गेस्ट हाउस में बैठकर कर हुर्रियत को मना लेंगे तो ये नादानी होगी.

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सरकार को कुछ ठोस क़दम उठाने होंगे. विश्वास बहाली के उपायों पर ध्यान देना होगा, जैसे कि पथराव करने वाले सैकड़ों युवाओं के ख़िलाफ़ लगे मुक़दमे और पुलिस केस वापस लेना और जेलों में बंद प्रदर्शनकारियों की रिहाई. कर्फ़्यू में ढील देना भी एक अच्छा क़दम होगा. सुरक्षाकर्मियों की संख्या में कमी पर भी विचार करना चाहिए .

मुख्यधारा से कटे युवाओं को इससे जोड़ने की कोशिश गंभीरता से करने की ज़रूरत है.

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लेकिन सबसे बढ़कर भारत को इस मुद्दे पर पाकिस्तान से बातचीत शुरू करने के लिए माहौल बनाना पड़ेगा. अगर भारत सरकार की यह बात सही है कि कश्मीर में जारी संकट में पाकिस्तान का हाथ है तो ये और भी ज़रूरी हो जाता है कि बातचीत शुरू की जाए. हम ये दशकों से जानते हैं कि कश्मीर मुद्दे का हल दिल्ली और श्रीनगर के अलावा इस्लामाबाद से भी जुड़ा है.

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