'कटाव के डर से रात को नींद नहीं आती'

  • 10 सितंबर 2016
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पश्चिम बंगाल के मालदा और मुर्शिदाबाद ज़िले की हजारों हेक्टेयर जमीन गंगा में समा चुकी है.

ऐसा क्या हुआ, जो उम्मीदों का फरक्का बैराज नाउम्मीदी और आक्रोश का स्मारक बन गया.

साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रिवर एंड पीपुल के लिए तैयार अपनी रिपोर्ट ने दावा किया है कि गंगा में हर साल करीब 736 मिलियन टन गाद जमा होता है.

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इसमें अकेले फरक्का में 328 मिलियन टन गाद जमा है.

फरक्का बराज प्रोजेक्ट के एक वरिष्ठतम अधिकारी ने पहचान छिपाने की शर्त पर बताया कि बराज बनने के बाद कभी भी यहां से गाद नहीं निकाला गया.

उनका तर्क है कि यहां 24 स्लुईस गेट हैं. इन्हें गाद निकालने के लिए ही बनाया गया है. इसके अतिरिक्त सिल्ट मैनेजमेंट का कोई दूसरा प्लान नहीं है.

इससे लाखों लोग परेशान हैं. इससे बंगाल सरकार चिंतित है. यहां के आम लोग इसके लिए लोग फरक्का बैराज को जिम्मेवार मानते हैं.

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इस गंगा कटाव में माकपा के पूर्व सासंद और फरक्का के विधायक रह चुके अबू हसनत खां की भी जमीन गंगा में चली गयी.

उन्होंने बताया कि गंगा का यह कटाव बंगाल की सबसे बड़ी समस्या है.

अबू हसनत खां ने बीबीसी से कहा, "गंगा में जमा गाद के कारण फरक्का बैराज के ऊपरी हिस्से में स्थित मालदा जिले के कालियाचक और माणिकचक जैसे इलाके कटाव से सर्वाधिक प्रभावित हैं. अकेले मालदा जिले में 4000 हेक्टेयर जमीन को गंगा ने अपनी सरहद मे मिला लिया."

वर्ष 2004 में पश्चिम बंगाल विधानसभा की सर्वदलीय कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में फरक्का बैराज को इस कटाव का कारण बताया था. बैराज के ऊपरी और निचले दोनों इलाकों के लोग कटाव से परेशान हैं.

फरक्का बैराज के ऊपरी इलाके में है डीयर फारेस्ट गांव. यहां मेरी मुलाकात हुई अताउर रहमान से.

उन्होंने बीबीसी से कहा, "पहले तो फरक्का बैराज के निर्माण के वक्त ही हमारी ज़मीन ले ली गयी. जिन लोगों को इसके बदले नौकरी और मुआवजा मिला, वे तो ठीक हो गए.लेकिन, बाकी के सब लोग भिखारी बने हुए हैं. गंगा ने धीरे-धीरे कटाव कर खेती योग्य ज़मीन को निगल लिया और बची-खुची ज़मीन पर भी जल जमाव के कारण खेती मुश्किल है."

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इसी गांव के नगर देवराई कहते हैं कि बैराज बनने से उन्हें कोई फ़ायदा नहीं हुआ.

उन्होंने बीबीसी को बताया कि पहले उनके गांव के बगल से गंगा बहती थी. इधर से नाव और स्टीमर चलते थे. लेकिन गाद के कारण अब इधर से स्टीमर नहीं जाते.

लाल पोल लगाकर प्रशासन ने इधर से स्टीमर के जाने पर रोक लगा दी है. उनकी सारी ज़मीन गंगा में समा गयी. अब मछली मार कर उसी से घर चलाते हैं.

फरक्का के निचले तल में मौजूद घाटपाड़ा कुंतीपाड़ा गांव की कहानी भी कुछ ऐसी ही है.

गंगा यहां भीषण कटाव कर रही है. गांव के अधिकतर रास्तों पर पानी भरा है. औरतें बीड़ी बना रही हैं, मर्द मछलियां मार रहे हैं.

यहां मुझे प्रसन्न हलदर मिलते हैं. कहते हैं कि कटाव के डर से रातों को नींद नहीं आती. खाने की दिक्कत है. पहले गंगा में उन्हें हिलसा मछली भी मिल जाती थी.

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गंगा में मौजूद गाद के कारण अब हिलसा जैसी मछलियां न के बराबर मिलती हैं. इससे आमदनी पर असर पड़ता है.

फरक्का बैराज तमाम समस्याओं का कारण बना हुआ है. इससे न केवल बिहार बल्कि पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश की सरकारें भी नाखुश हैं.

फरक्का बैराज अस्तित्व विहिन हो चुका है. इससे नुकसान हो रहा है, फायदा नहीं.

21 मई 1975 को फरक्का बैराज देश को समर्पित किया गया.

इस उद्देश्य के साथ कि फरक्का में गंगा पर इसके निर्माण के बाद कोलकाता पोर्ट को हर रोज 40,000 क्यूसेक पानी मिलेगा. इससे कोलकाता का अस्तित्व बचा रहेगा.

बैराज के निर्माण का उद्देश्य क्या अब पूरा हो पा रहा है. फरक्का से माकपा के टिकट पर दो बार विधायक और जंगीपुर से एक बार सांसद रह चुके अबू हसनत खां कहते हैं— नहीं.

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बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने फरक्का बैराज को तोड़ देने की मांग की है.

उन्होंने कुछ दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलकर कहा कि फरक्का में जमा गाद के कारण बिहार में भीषण बाढ़ आयी है. इसका हल निकालना जरुरी है.

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