नाउम्मीदी का स्मारक बना फरक्का बैराज!

  • 11 सितंबर 2016
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इस उद्देश्य के साथ कि फरक्का में गंगा पर इस बैराज के निर्माण के बाद कोलकाता पोर्ट को हर रोज 40,000 क्यूसेक पानी मिलेगा 21 मई 1975 को अंतरराष्ट्रीय महत्व का फरक्का बैराज देश को समर्पित किया गया था. इससे कोलकाता बंदरगाह का अस्तित्व बचा रहेगा.

कोलकाता के लोगों को पीने के लिए मीठा पानी भी मिलेगा. बंगाल की खाड़ी से जुड़े होने के कारण हुगली का पानी खारा है. ऐसे में फरक्का बैराज से निकले फीडर कैनाल से गंगा का पानी हुगली तक पहुंचाकर पानी के खारापन को दूर करने की बात सोची गई थी.

बैराज के निर्माण का उद्देश्य क्या पूरा हो पा रहा है. फरक्का से माकपा के टिकट पर दो बार विधायक और जंगीपुर से एक बार सांसद रह चुके अबू हसनत खां इसका जवाब नहीं में देते हैं.

वे फरक्का को लेकर बनी कई विधायी समितियों के सदस्य रह चुके हैं.

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उन्होंने बीबीसी से कहा, "गर्मी के दिनों में कोलकाता बंदरगाह को फरक्का से 40,000 क्यूसेक पानी नहीं मिलता है. बांग्लादेश को भी करार के मुताबिक पानी नहीं जा पाता. 1996 में जब भारत-बांग्लादेश के बीच गंगा जल समझौता हुआ तब वहां की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने कहा था कि उन्हें उम्मीद से ज्यादा मिल रहा है. आज बांग्लादेश की सरकार आरोप लगाती है कि भारत उसे समुचित पानी नहीं दे रहा. इस कारण पदमा नदी के जलग्रहण क्षेत्र मे रेगिस्तान-सा नजारा दिखता है."

उधर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने फरक्का बैराज को तोड़ देने की मांग की है.

उन्होंने कुछ दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलकर कहा कि फरक्का में जमा गाद के कारण बिहार में भीषण बाढ़ आई है. इसका हल निकालना जरूरी है.

ऐसा क्या हुआ, जो उम्मीदों का फरक्का बैराज नाउम्मीदी और आक्रोश का स्मारक बन गया.

पूर्व सांसद अबू हसनत खां कहते हैं, "बैराज से महज 500 मीटर की दूरी पर ऊपरी इलाके में टापूनुमा जगह दिखती है. यह गंगा में जमा गाद है. जिसपर पेड़-पौधे उग आए हैं."

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साउथ एशिया नेटवर्क आन डैम्स, रिवर एंड पीपुल के लिए तैयार अपनी रिपोर्ट में मनीषा बनर्जी ने दावा किया है कि गंगा में हर साल करीब 736 मिलियन टन गाद जमा होता है. इसमें अकेले फरक्का में 328 मिलियन टन गाद जमा है.

तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय के डॉक्टर सुनील कुमार चौधरी भी इससे सहमत हैं.

उन्होंने कहा, "गंगा में जमा गाद के कारण बिहार में बाढ़ है. इससे गंगा की जैव विविधता में बदलाव आ रहा है. फरक्का बैराज से न भारत को फायदा है न बांग्लादेश को."

फरक्का बैराज प्रोजेक्ट के एक वरिष्ठतम अधिकारी ने पहचान छिपाने की शर्त पर बताया कि बैराज बनने के बाद कभी भी यहां से गाद नहीं निकाला गया.

उनका तर्क है कि यहां 24 स्लुईस गेट हैं. इन्हें गाद निकालने के लिए ही बनाया गया है. इसके अतिरिक्त सिल्ट मैनेजमेंट की कोई दूसरी योजना नहीं है.

दरअसल, फरक्का बैराज की परिकल्पना अंग्रेज अफसर आर्थन काटन ने साल 1853 में की थी.

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भारत की आजादी के बाद जब इस बैराज पर चर्चा हुई तब पश्चिम बंगाल सरकार के लिए काम कर रहे अभियंता प्रमुख कपिल भट्टाचार्य ने इसके ख़िलाफ़ रिपोर्ट दी.

उन्होंने अपनी रिपोर्ट मे कहा था कि फरक्का बैराज के कारण बंगाल के मालदा व मुर्शिदाबाद तथा बिहार के भागलपुर, पटना, बरौनी, उत्तरी मुंगेर जैसे इलाके बाढ़ के पानी में डूब जाएंगे. वहीं, बांग्लादेश (तब पूर्वी पाकिस्तान) मे सूखे की स्थिति पैदा होगी. लेकिन, तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने उनकी बात को नज़रअंदाज कर दिया.

फरक्का बैराज प्रोजेक्ट के साथ करीब 38 सालों तक जुड़े रहे रिटायर्ड मुख्य अभियंता डॉक्टर पी के परुआ ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा था कि फरक्का बैराज बनते वक्त इसमें लगे अभियंताओं ने इस कारण जमा होने वाली गाद के प्रबंधन की कोई योजना ही नहीं बनाई.

अब फरक्का के पास गंगा मे जमा गाद निकालना टेढ़ी खीर साबित हो रहा है. पर्यावरणविदों का मानना है कि इसे निकालने में काफी मशक्कत करनी पड़ेगी. जो संभव नहीं दिखती.

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