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बुधवार, 29 अप्रैल, 2009 को 11:02 GMT तक के समाचार
 
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भारतीय चुनाव:आपके सवालों के जवाब-3
 

 
 
भारतीय मतदाता
भारत में नेताओं से नाराज़गी के बावजूद भारी संख्या में लोग मतदान भी करते देखे जाते हैं
चुनाव लड़ने में बहुत पैसा ख़र्च किया जाता है. तो क्या ऐसा कोई नियम है कि कितना पैसा ख़र्च किया जा सकता है. यह सवाल किया है पानीपत से चिन्मय धींगरा ने.

जी हाँ. चुनाव आचार संहिता-1961 के, नियम 90 में इसकी सीमा दी हुई है. यह सीमा समय-समय पर बढ़ाई जाती रही है. इस समय उत्तर प्रदेश, बिहार, आंध्र प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में लोकसभा का चुनाव लड़ रहे प्रत्याशियों के लिए यह सीमा 25 लाख रुपए है. छोटे चुनाव क्षेत्रों में यह सीमा कम है, जैसे दादरा नगर हवेली, लक्षद्वीप और दमन दीव में कोई भी उम्मीदवार अपने चुनाव अभियान में अधिक से अधिक 10 लाख रुपए ख़र्च कर सकता है. यह सुनिश्चित करने के लिए कि कोई उम्मीदवार सीमा से अधिक धन नहीं ख़र्च कर रहा है उसे जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 के भाग 77 के अनुसार पूरे ख़र्च का रिकॉर्ड रखना पड़ता है. यह काम आमतौर पर उम्मीदवार के एजेंट करते हैं. नामांकन पत्र स्वीकार होने से लेकर चुनाव के नतीजे आने तक जो कुछ भी ख़र्च हुआ उसका पूरा लेखा-जोखा चुनाव परिणाम आने के 30 दिन के भीतर जमा करना होता है.

राज्यों में यह लेखा जोखा उम्मीदवार को अपने चुनाव क्षेत्र के ज़िला चुनाव अधिकारी के पास जमा कराना होता है जबकि केंद्र शासित प्रदेशों में इसे रिटर्निंग ऑफ़िसर यानी मतदान अधिकारी के पास जमा किया जाता है. और अगर चुनाव आयोग को लगे कि उम्मीदवार ने चुनाव ख़र्च का ब्यौरा समय से और ठीक से जमा नहीं किया है और इसका कोई समुचित कारण भी नहीं है, तो चुनाव आयोग उस उम्मीदवार को तीन साल तक के लिए अयोग्य घोषित कर सकता है. चाहे वह चुनाव जीत ही क्यों न गया हो.

इलाहबाद उत्तर प्रदेश से सौरभ श्रीवास्तव यह जानना चाहते हैं कि भारत में वामपंथी पार्टी का उदय कब और कैसे हुआ. और इस समय कौन - कौन प्रमुख नेता हैं.

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी यानी सीपीआई की शुरूआत 1928 में हुई. आरंभिक वर्षों में साम्यवादी नेता पार्टी ऑफ़ ब्रिटेन के साथ इसके गहरे संबंध थे और फिर सोवियत संघ के साथ इसके घनिष्ठ संबंध बने. दरअसल सोवियत संघ (अब रूस) में साम्यवादी क्रांति के बाद दुनिया में कम्युनिज़्म यानी साम्यवाद के प्रसार के लिए कोमिंतांग नामक एक अंतरराष्ट्रीय अभियान आरंभ किया गया था. भारतीय साम्यवादी नेता भी भारत के किसान और मज़दूरों को एक सूत्र में बांधकर साम्यवादी नेता क्रांति का सपना देखने लगे.

भारत के साम्यवादी नेता महात्मा गाँधी, जवाहर लाल नेहरू और कांग्रेस पार्टी के विरोधी थे और मुस्लिम लीग की पाकिस्तान की माँग का उन्होंने समर्थन किया. इसलिए आज़ादी के बाद भारत में उन्हें संदेह की नज़र से देखा जाने लगा. जब 1948 में पार्टी के महासचिव बने तो उन्होंने रूस की तर्ज़ पर देश में क्रांति की योजना बनाई. आंध्र प्रदेश के तेलंगाना क्षेत्र में किसानों के विद्रोह को भड़काया. लेकिन लोकतांत्रिक भारत में रूस की तर्ज़ पर क्रांति संभव नहीं थी और 1950 के दशक के आरंभ में राजेश्वर राव के नेतृत्व में पार्टी की लोकप्रियता में तेज़ी से कमी आई. इसलिए पीसी जोशी, एसए डांगे और अजय घोष जैसे नेताओं ने पार्टी की रणनीति में परिवर्तन किया और हिंसक क्रांति का रास्ता छोड़कर Constitutional Communism यानी संवैधानिक साम्यवाद का रास्ता अपनाया.

कम्युनिस्ट नेता प्रकाश करात, डी राजा, एबी बर्धन
अनेक राज्यों में वामपंथी सरकारें रही हैं लेकिन पश्चिम बंगाल में सबसे लंबे समय तक.

1957 के चुनाव में केरल के विधान सभा चुनाव में ईएमएस निंबूदरीपाद के नेतृत्व में सीपीआई को जीत हासिल हुई और भारत के किसी राज्य में पहली साम्यवादी सरकार बनी. उसके अगले ही वर्ष यानी 1958 में अमृतसर में आयोजित वार्षिक सम्मेलन में पार्टी ने अपनी नई रणनीति पर मोहर भी लगा दी जिसे अमृतसर घोषणा का नाम दिया गया. इस घोषणा में कहा गया कि सीपीआई शांतिपूर्ण ढंग से संपूर्ण लोकतंत्र और समाजवाद की स्थापना के लिए काम करेगी. दो वर्ष बाद 1959 में केरल में साम्यवादी नेता पार्टी की सरकार को केंद्र की कांग्रेस सरकार ने बर्ख़ास्त कर दिया. नेहरू सरकार के इस क़दम की विपक्ष ने भारी आलोचना की. और जब उसी वर्ष चीन ने तिब्बत पर हमला किया तो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने उसका समर्थन किया लेकिन 1962 में भारत पर चीन के हमले के बाद साम्यवादी नेताओं के लिए नई वैचारिक मुश्किल खड़ी हो गई. आधिकारिक रूप से सीपीआई ने चीन के आक्रमण का विरोध किया और मातृभूमि की रक्षा के लिए भारतीय जनता से अपील की. लेकिन पार्टी के भीतर साम्यवादियों का एक ऐसा गुट था जो चीन की आलोचना के पक्ष में नहीं था. और इसी तरह के आपसी विवादों की वजह से 1964 में सीपीआई दो गुटों में बँट गई. ईएमएस निंबूदरीपाद और ज्योति बसु जैसे नेताओं ने कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (मार्क्सवादी) यानी सीपीएम का गठन किया.

1967 में कम्युनिस्ट आंदोलन की एक और शाखा अस्तित्व में आई जब पश्चिम बंगाल में नक्सलबाड़ी गाँव में एक विफल हिंसक क्रांति का प्रयोग किया गया. हिंसा के ज़रिए सामाजिक परिवर्तन के इन समर्थकों ने 1969 में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) यानी सीपीआई-एमएल का गठन किया. इन्हें बाद में माओवादियों के नाम से जाना गया. भारत के कई राज्यों में आज भी इस संगठन से प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से जुड़े हुए लोगों के हिंसक वारदातों में शामिल होने की ख़बरें आती हैं.

सन् 1952 में गठित पहली लोकसभा में विपक्ष के नेता कौन थे. यह जानना चाहते हैं गुनसेज, सासाराम बिहार से रवि शंकर तिवारी.

सन 1952 में विपक्ष का कोई नेता नहीं था. बल्कि यूँ कह सकते हैं कि विपक्ष में कई नेता थे. लेकिन कोई भी मान्यता प्राप्त विपक्षी दल नहीं था क्योंकि मान्यता प्राप्त विपक्षी दल होने के लिए यह आवश्यक था कि कम से कम 50 सांसद या कुल सांसद संख्या के दसवें हिस्से के बराबर सदस्य संसद में होने चाहिए थे. और 1952 के चुनाव में कांग्रेस के अलावा किसी भी अन्य दल को इतनी सीटें संसद में हासिल नहीं हुई थीं.

इस तरह पहली, दूसरी और तीसरी लोकसभा में कोई भी मान्यता प्राप्त विपक्षी नेता नहीं था. चौथी लोक सभा में पहली बार 1969 में कांग्रेस का विभाजन हुआ और कांग्रेस से ही निकलकर 55 लोक सभा सदस्य विपक्ष में आ गए और उन्होंने अपना अलग दल बनाया तो डॉक्टर राम सुभाक सिंह को पहली बार लोक सभा में विपक्षी नेता के रूप में मान्यता मिली.

ऐलनाबाद, सिरसा से संदीप कुमार वर्मा ने पूछा है कि विभिन्न राजनीतिक दलों ने आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों को चुनाव में खड़ा किया है. क्या इसके ख़िलाफ़ कोई क़ानून नहीं है. अमरीका के कैलीफ़ोर्निया राज्य से हरस दीया ने भी यही पूछा है.

क़ानून है लेकिन ये क़ानून कहता है कि जिसका अपराध अदालत में साबित हो जाता है और उसे दो वर्ष से अधिक कारावास की सज़ा भी हो चुकी हो तो वह व्यक्ति चुनाव नहीं लड़ सकता है. लेकिन ऐसा कोई क़ानून नहीं है कि किसी व्यक्ति पर अगर कोई आरोप लगा हो और उसका मुक़दमा अदालत में चल रहा हो तो उसे चुनाव से अयोग्य ठहराया जा सके. ऐसा कोई क़ानून नहीं होने के पीछे एक कारण ये भी है कि अगर सिर्फ़ आरोप लगने या अदालत में मुक़दमा चलने को ही अयोग्यता मान लिया जाए तो फिर तो बहुत से व्यक्ति चुनाव लड़ने के अयोग्य ठहरा दिए जाएंगे. और यह तो हम सभी जानते हैं कि जब तक किसी व्यक्ति का अपराध अदालत में साबित नहीं हो जाता तब तक वह व्यक्ति निर्दोष माना जाता है. क़ानूनी जानकार यह भी कहते हैं कि पुलिस अधिकतर मामलों में सरकार के इशारों पर काम करती है और ऐसा भी हो सकता है कि सत्ता में बैठे लोग अपने विरोधी नेताओं पर कोई भी झूठा मुक़दमें में फँसाकर उन्हें चुनाव लड़ने से रोकने में कामयाब हो जाते. क़ानून में ऐसी व्यवस्था होती तो बहुत से लोगों को अपना यह लोकतांत्रिक अधिकार हासिल नहीं होता क्योंकि भारतीय अदालतों में तो मुक़दमों का फ़ैसला होने में वर्षों-दशकों का समय लग जाता है. कुछ मामले तो कई दशक तक चलते देखे गए हैं.

पप्पू यादव ने जेल से चुनाव लड़ा था
पप्पू यादव ऐसे सांसदों में से एक हैं जिन्होंने जेल में बंद रहते हुए ही चुनाव लड़े हैं

इसका एक दूसरा पहलू ये भी है कि जो लोग अपराधी होते हैं वे इस क़ानून का फ़ायदा भी उठाते हैं. क्योंकि उन पर चल रहे मुक़दमों का फ़ैसला होने में अनेक वर्ष लगते हैं इसलिए उन्हें चुनाव लड़ने का पूरा अधिकार हासिल है. क़ानूनी जानकार ये भी कहते हैं कि इस तरह के लोग जान बूझकर अपने मुक़दमों को लंबा खिंचवाते हैं क्योंकि उन्हें संदेह होता है कि फ़ैसला उनके ख़िलाफ़ ही आना है इसलिए वे फ़ैसलों को लंबित करवाने के लिए धन-बल का भी प्रयोग करते हैं. क़ानूनी जानकार इस समस्या का हल यह देखते हैं कि भारत की न्यायिक व्यवस्था में व्यापक सुधार किए जाएँ ताकि मुक़दमों की सुनवाई और फ़ैसला आने में ज़्यादा देर ना लगे क्योंकि यह भी कहा जाता है कि अगर किसी को न्याय मिलने में देरी होती है तो उसे अन्याय के तौर पर देखा जाता है.

 
 
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