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सोमवार, 20 अप्रैल, 2009 को 11:33 GMT तक के समाचार

आलोक कुमार
बीबीसी संवाददाता, दरभंगा से

मुसलमानों को नए विकल्प की तलाश

बिहार में चुनाव लोकसभा का हो या विधानसभा का, चर्चा हमेशा हर दल के समीकरण की होती है. चाहे वो मुस्लिम-यादव समीकरण (माई) हो या मुस्लिम-दलित (एमडी) समीकरण, मुसलमानों का वोट पाने के लिए हर पार्टी एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाती रही है.

पहले चरण का चुनाव हो चुका है और दूसरे चरण में 11 लोकसभा सीटों के लिए 23 अप्रैल को मतदान होना है. तारीख़ नज़दीक आते ही बेतिया से लेकर मधुबनी तक की सीटों पर मुस्लिम मतदाताओं को रिझाने की कोशिश तेज़ हो गई है.

राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) ने आपस में हाथ मिलाया तो दोनों दलों के नेताओं ने कहा कि ऐसा उन्होंने धर्मनिरपेक्ष वोटों के बंटवारे को रोकने के लिए किया है.

दूसरी ओर राज्य में सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा)-जनता दल युनाईटेड (जदयू) गठबंधन के मुखिया नीतीश कुमार विकास के नारे को बुलंद करते हुए सभी समीकरणों के ध्वस्त होने का दावा कर रहे हैं.

लेकिन क्या ये दावे-प्रतिदावे सच हैं? लगता है नहीं, क्योंकि बेतिया, मोतिहारी, वैशाली, मुज़फ़्फ़रपुर, समस्तीपुर, दरभंगा, मधुबनी का दौरा करते हुए मुस्लिम बहुल इलाक़ों से गुजरने और वहां के लोगों से बात करने के बाद ऐसा लगता है कि कांग्रेस पार्टी नए विकल्प के तौर पर उभर रही है.

'सबने ठगा है'

बेतिया शहर से लगभग 45 किलोमीटर दूर भटही गांव के बुज़ुर्ग वसी अहमद कहते हैं, "चंपराण की स्थिति तो आज़ादी से पहले बेहतर थी. पिछले पचास-साठ साल में यहां कोई परिवर्तन नहीं दिखाई देता. हम लोगों ने कांग्रेस राज से मुक्ति के लिए लालू को वोट दिया था. मगर उन्होंने हमारे लिए किया क्या?"

ये पूछने पर कि इस बार प्रधानमंत्री किसे देखना चाहते हैं वो कहते हैं, "मनमोहन सिंह ईमानदार नेता हैं, उन्हीं को होना चाहिए. कांग्रेस ने लालू से अलग होकर अच्छा फ़ैसला किया है और इसका परिणाम दिखाई देगा."

वैशाली के नवयुवा सरफ़राज़ अहमद कहते हैं, "मंत्री होते हुए रघुवंश प्रसाद सिंह ने क्षेत्र में सड़के बनवाई और विकास के अन्य काम किए. लेकिन सांप्रदायिक ताक़तों से निपटने के लिए कांग्रेस से बेहतर कोई और विकल्प नहीं है."

दरभंगा और मधुबनी दो ऐसे लोकसभा क्षेत्र हैं जहां के बारे में कहा जाता है कि मुस्लिम मतदाता अगर एकजुट हो जाएँ तो निर्णायक भूमिका में होते हैं. दरभंगा में लालू यादव ने ये बयान देकर सियासी तूफ़ान खड़ा किया कि बाबरी मस्जिद विध्वंस के लिए कांग्रेस भी ज़िम्मेदार है.

लेकिन यही सवाल जब मैंने जमीयत उलेमा-ए-हिंद के सदस्य मक्की अंसारी के समक्ष रखा तो उनका जवाब था, "लालू को पता हो गया है कि सारण में मुसलमानों ने उन्हें वोट नहीं दिया. ये भाजपा से हमें डराना चाहते हैं और ये काम हर चुनाव करते रहे हैं."

उनका आगे कहना था, "लालू यादव और राम विलास पासवान ने मुसलमानों में पिछड़ी जाति के एक भी व्यक्ति को टिकट नहीं दिया जिनकी संख्या मुस्लिम आबादी में आधी से ज़्यादा है. इन दोनों ने मुसलमानों को वोट बैंक के रुप में इस्तेमाल किया है."

उन्हीं के बग़ल में खड़े राजा अंसारी कहते है, "लालू कांग्रेस को किस मुंह से ज़िम्मेदार ठहराते हैं. उनकी पहली सरकार भाजपा के समर्थन से बनी और अब कल्याण सिंह को साथ लेकर उन्होंने साबित कर दिया है कि मुसलमानों के सबसे बड़े दुश्मन वही हैं."

फ़ातमी का विश्वास

दरभंगा लोकसभा से राजद प्रत्याशी और केंद्रीय मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री अली अशरफ़ फ़ातमी संयुक्त प्रगतिशील (यूपीए) सरकार की ओर से मुसलमानों के कल्याण के लिए उठाए गए क़दमों का हवाले देते हुए विश्वास जताते हैं कि अल्पसंख्यकों का समर्थन उन्हें ही मिलेगा. फ़ातमी का मुक़ाबला भाजपा के कीर्ति आज़ाद और कांग्रेस के अजय जलान से है.

फ़ातमी का कहना है, "जहां तक अल्पसंख्यकों का सवाल है तो लालू-मुलायम ही उनके सच्चे लीडर हैं."

हालाँकि वो भी ये स्वीकार करते हैं कि कुछ सीटों पर मुसलमानों का वोट कांग्रेस को जा सकता है.

फ़ातमी बाबरी विध्वंस पर लालू के बयान को सही ठहराते हुए कहते हैं, "दंगों का इतिहास कांग्रेस पार्टी के साथ जुड़ा हुआ है. उसका आचरण जगजाहिर है. बाबरी मस्जिद विध्वंस के लिए भी उसे ज़िम्मेदारी लेनी होगी."

ये पूछने पर कि फिर कांग्रेस के साथ जाने का क्या मतलब है, वो कहते हैं, "कभी-कभी मज़बूरी में भी एक साथ आना पड़ता है. हमनें सेक्युलर सरकार बनाने के लिए कांग्रेस का साथ दिया."

साथ में वो ये भी जोड़ते हैं, "कांग्रेस की जो भी थोड़ी सेक्युलर छवि बची है उस में लालू यादव की मुख्य भूमिका रही है."

दरभंगा के मिल्लत कॉलेज के प्रिंसिपल मुश्ताक अहमद फ़ातमी के इन दावों पर कहते हैं, " लालू जब बिहार के मुख्यमंत्री बने तो घोषणा की थी कि हर थाने में मुसलमान दारोग़ होगा. क्या हुआ? सीधी सी बात है कि फ़ातमी हों या लालू ये इस समय मुसलमानों का सेंटिमेंट उभारने की कोशिश कर रहे हैं."

काम बोलेगा लेकिन...

मुश्ताक अहमद कहते हैं, "राज्य की नीतीश सरकार ने विकास के काम किए हैं, इसमें कोई शक नहीं. उन्होंने अल्पसंख्यक विद्यार्थियों के लिए वजीफ़े की घोषणा की है. भागलपुर दंगों के दोषियों को सजा दिलाने का काम किया है."

फिर चुनाव में रुझान विकास की ओर क्यों नहीं हैं, इस पर मक्की अंसारी कहते हैं, "विधानसभा का चुनाव होगा तो नीतीश को इसका फल मिलेगा. लेकिन ये चुनाव विधानसभा का नहीं न है. हम आडवाणी को कैसे प्रधानमंत्री स्वीकार कर सकते हैं."

दरभंगा के बाद मधुबनी जाते हुए पंडौल के निकट बलहा गांव में पेड़ की छांव के नीचे राजनीति पर ही चर्चा हो रही थी. यहां बैठे मोहम्मद अली कहते हैं, "कांग्रेस ने हम सबको नया विकल्प दिया है. वैसे हमारे यहां से पहले भी कांग्रेस से शकील अहमद ही चुनाव लड़ते रहे हैं, लेकिन इस बार वो और ज़्यादा मतों से जीतेंगे."

जब मैंने पूछा कि शकील अहमद के ख़िलाफ़ राजद प्रत्याशी अब्दुल बारी सिद्दीकी चुनाव मैदान में उतरे हैं, उनके बारे में क्या राय है तो वहीं बैठे ज़ाकिर हुसैन कहते हैं, "उनको भी थोड़ा बहुत वोट मिलेगा. लेकिन शकील साहब ने काम भी तो बहुत किया है और वो यहीं के हैं, हम लोग तो सिद्दीक़ी जी को बाहरी मानते हैं."

मधुबनी से ही भाजपा उम्मीदवार हुकुमदेव नारायण यादव का प्रचार कार्य देख रहे मनोज तिवारी कहते हैं, "उम्मीद थी कि राजद और कांग्रेस प्रत्याशी के बीच अल्पसंख्यक वोट बंटेगा लेकिन ऐसा बहुत अधिक नहीं हो रहा है. हम लोग नीतीश सरकार के काम को ही आधार बनाकर वोट मांग रहे हैं."

किसे पड़ेंगे अल्पसंख्यक वोट?

राजनीतिक समीक्षक और स्वतंत्र पत्रकार सुरेंद्र किशोर कहते हैं कि इस चुनाव में कांग्रेस ने अलग रास्ता अख़्तियार कर अल्पसंख्यकों को नया विकल्प दिया है.

हालांकि उनका ये भी कहना है, "मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने किसी तरह के ध्रुवीकरण को तोड़ने की कोशिश की है. मुझे लगता है इसमें वे थोड़े कामयाब हुए हैं क्योंकि हथियार उन्होंने विकास को बनाया है."

सुरेंद्र किशोर कहते हैं, "भाजपा को उन जगहों पर मुसलमानों का थोड़ा बहुत वोट मिल सकता है जहां उसके उम्मीदवार अल्पसंख्यक वर्ग के हैं. लेकिन अन्य स्थानों पर नहीं. यही हाल कमोबेश जयदू के साथ भी होगा लेकिन नीतीश कुमार ने अल्पसंख्यकों का विश्वास पाने में थोड़ी सफ़लता हासिल की है."

वहीं जमीयत उलेमा-ए-हिंद के मक्की अंसारी कहते हैं, "किसी भी सीट पर जनता दल युनाईटेड या कांग्रेस पार्टी में से जिसका उम्मीदवार जीत की ओर बढ़ता दिखाई देगा उसी को मुसलमानों के वोट मिलेंगे."

बिहार में पहले चरण के चुनाव के बाद दूसरे चरण के लिए अब तक के प्रचार से जो माहौल बना है, उससे लगता है कि अल्पसंख्यक वर्ग नए विकल्प की तलाश में हैं और कांग्रेस ने कई सीटों पर मुक़ाबले को दिलचस्प बना दिया है.