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रविवार, 26 अप्रैल, 2009 को 14:06 GMT तक के समाचार

पल्लवी जैन
बीबीसी संवाददाता, ग्वालियर

सिंधिया परिवार के वर्चस्व में कमी

ग्वालियर आते ही दो नाम ज़ेहन में उभरते हैं एक महान गायक तानसेन का जिनके बारे में मशहूर है कि उनके गाने से दीपक ख़ुद जल उठते थे और दूसरा नाम है सिंधिया परिवार.

पिछले दो दशकों से मराठा वंश से जुड़े ग्वालियर और उससे सटे गुना से अधिकतर सिंधिया परिवार का सदस्य ही चुनाव जीत कर सांसद बनता आया है.

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नेता राजमाता विजयराजे सिंधिया जहाँ गुना से चुनाव जीती थी तो कांग्रेस से माधवराव सिंधिया ग्वालियर के साथ साथ गुना से भी चुनाव जीत कर सांसद बने थे.

इस समय स्वर्गीय विजयराजे सिंधिया की पुत्री यशोधरा राजे सिंधिया ग्वालियर से सांसद हैं तो माधवराव के पुत्र और कांग्रेस के उभरते युवा नेता ज्योतिरादित्य गुना से सांसद हैं.

राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा नेता वसुंधरा राजे यशोधरा राजे की बड़ी बहन हैं.

वैसे तो मध्य प्रदेश में कई ज़मींदारों और रजवाड़ों ने राजनीति में अपनी क़िस्मत आज़माई है. कुछ कांग्रेस नेता अर्जुन सिंह और दिग्विजय सिंह की तरह सफल रहे हैं और कुछ विफल भी.

लेकिन ऐसे कुछ ही परिवार होंगे जिसके इतने सारे सदस्य न सिर्फ़ राजनीति में आए बल्कि सार्वजनिक जीवन में अपनी साख भी बनाए रखी.

राजनीतिक विश्लेषक एपीएस चौहान सिंधिया परिवार के सदस्यों की राजनीतिक सफलता का राज़ बताते हैं- "एक तो वो इस क्षेत्र की समस्याओं से अपने आप को जोड़े रखते हैं दूसरे इनके ऊपर चोरी और भ्रष्टाचार के आरोप नहीं हैं."

चौहान आगे कहते हैं, "एक और बात ये है कि ये केंद्रीय राजनीति में अपने असर से इस क्षेत्र के लिए विकास से जुड़ी बड़ी-बड़ी योजनाएँ लाने की कोशिश करते हैं. इसीलिए आम जनता का रुझान इनकी तरफ़ रहता है."

राह आसान नहीं

एक आम धारणा यही है कि अगर आप एक राजनीतिक परिवार से हैं तो राजनीति में आने की राह आसान होती है लेकिन ग्वालियर की सांसद यशोधरा राजे सिंधिया इस बात से सहमत नहीं हैं.

वे कहती हैं, "आसान बिल्कुल नहीं हैं. पार्टी की सदस्यता तो मिल जाएगी लेकिन जनता का विश्वास पाने के लिए आपको ख़ुद अपने पैरों पर खड़े होकर मेहनत से अपनी जगह बनानी होगी. दो बार विधान सभा के लिए चुने जाने के बाद मुझे लोगों ने मेरे काम से स्वीकार किया".

यशोधरा आगे कहती हैं कि लोग उन्हे जब देखते हैं तो उन्हें एक आशा की किरण नज़र आती है कि ये कुछ कर पाएँगी.

लोगो का मानना ये है कि पहले के मुक़ाबले सिंधिया परिवार के वर्चस्व में थोड़ी कमी तो आई है.

माधव राव सिंधिया को 1998 में जयभान सिंह पवैया ने चुनाव में कड़ी टक्कर दी थी. पवैया चुनाव जीत तो नहीं पाए थे लेकिन इसके बाद माधव राव सिंधिया ने अपना चुनाव क्षेत्र बदलकर गुना कर लिया था.

वंशवाद की राजनीति पर अपने विचार व्यक्त करते हुए जयभान सिंह ने कहा, "इसमें कोई शक नहीं कि 1967 तक रजवाड़ों का एक जादू छाया रहता था लेकिन वो अपरिपक्व राजनीति की वजह से था. 1998 के चुनाव में मैंने वंशवाद और सामंतवाद का मुद्दा उठाया था और कहा था कि ये लोकतंत्र पर कोढ़ के धब्बे हैं.”

वो कहते हैं, "1947 में जब पंडित नेहरू ने झंडा फहराया तो उसके बाद न कोई राजा रहा और न कोई महारानी."

उन्होंने कहा, "1998 में उठाए गए मुद्दों का ही असर है कि ग्वालियर अंचल में तो वंशवाद की राजनीति का असर ख़त्म हो गया है. थोड़ा बहुत गुना के पिछड़े क्षेत्रों से इसका फ़ायदा परिवारवादी उठा रहे हैं."

अब भी चुनाव विश्लेषकों का मानना हैं कि सिंधिया परिवार का वर्चस्व कम होने के बावजूद अगर इस परिवार का कोई सदस्य चुनाव में होता है तो उसे पारिवारिक राजनीति का लाभ मिलता है.