यहां स्कूलों में पढ़ाया जाएगा 'मौत का सबक'

  • 6 जुलाई 2018
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गणित, विज्ञान, इतिहास, मौत?

जी हां. हो सकता है आने वाले वक्त में ऑस्ट्रेलिया के बच्चे अन्य विषयों के साथ-साथ मौत की पढ़ाई भी करें.

ऑस्ट्रेलिया के मेडिकल एसोसिएशन क्वीन्सलैंड ने इससे जुड़ा एक प्रस्ताव पेश किया है.

वो चाहते हैं कि युवा ज़िंदगी के अंत के बारे में जाने और खुलकर इसपर बात करें.

डॉक्टरों के मुताबिक बेहतर होती चिकित्सा व्यवस्था और उम्रदराज़ होती आबादी ने परिवारों के सामने मुश्किल सवाल खड़े किए हैं.

डॉक्टर रिचर्ड रिड कहते हैं, "हमारा मकसद है कि युवा अपने माता-पिता और दादा-दादी से जीवन के अंत को लेकर सहजता से बात कर सकें. ताकि वो जान सकें कि उनके बड़े किस तरह मरना चाहते हैं. ये जानकारी भविष्य में उनके काम आएगी."

फिलहाल युवा इस तरह के मुश्किल फैसलों को लेकर बात नहीं कर पाते, क्योंकि इसे लेकर एक तरह का टैबू है. जिसकी वजह से कई करीबी लोगों की मौत आपकी आंखों से दूर अस्पतालों में हो जाती हैं.

यही वजह है कि बच्चों को स्कूलों में ही मौत से जुड़े पाठ पढ़ाए जाने की योजना बनाई गई है.

वो ज़िंदगी के आखिरी पल

ऑस्ट्रेलिया के डॉक्टरों का तर्क है कि अगर बच्चों को क्लासरूम में ज़रूरी कानूनों और नैतिक कर्तव्यों के अलावा इच्छामृत्यु के बारे में बताया जाएगा तो उनके लिए ऐसे मामले कम "तकलीफदेह" होंगे और इससे लोगों को बेहतर फैसले लेने में मदद मिलेगी.

Image caption डॉक्टर रिचर्ड के मुताबिक युवाओं को अंतिम दिनों के लिए कड़े फैसले लेने के लिए तैयार करना बेहद ज़रूरी है

डॉक्टर रिचर्ड किड कहते हैं कि अगर स्कूलों में ये विषय पढ़ाया जाता है तो युवा इस बारे में बेहतर फैसला ले सकेंगे कि अंतिम दिनों में उनके रिश्तेदारों का इलाज किस तरह से किया जाए.

वो कहते हैं, "मैंने 21 साल के युवाओं को ऐसे मुश्किल सवालों से जूझते देखा है."

उन्हें पता ही नहीं होता कि वो क्या करें कि चीज़ें उनके "प्रियजनों के हित में भी हो जाएं और कानून का उल्लंघन भी ना हो."

उनका कहना है कि मौत को लेकर बने टैबू की वजह से परिवार ज़रूरी फैसले लेने में बहुत देर कर देते हैं.

ज़्यादातर लोगों को पता ही नहीं होता कि अगर उनके रिश्तेदारों के साथ कुछ बहुत बुरा हो जाता है तो वो किस तरह का इलाज चाहेंगे.

वो कहते हैं, "इसलिए ये ज़रूरी है कि युवाओं को इन चीज़ों के लिए तैयार किया जाए, ताकि वो अपने प्रियजनों से मुश्किल बातचीत कर सकें."

"डेथ लैसन" में इससे जुड़े कानूनी पहलु, इच्छामृत्यु, भविष्य में किस तरह का इलाज दिया जाए और मौत की प्रक्रिया के बारे में पढ़ाया जाएगा.

संस्कृति का हिस्सा

ये टॉपिक पहले से मौजूद विषयों बॉयोलॉजी, मेडिसिन, लॉ एंड एथिक्स के हिस्से के तौर पर पढ़ाए जा सकते हैं.

डॉक्टर किड कहते हैं मृत्यु से जुड़ी शिक्षा मिलने पर ऑस्ट्रेलिया, अमरीका और ब्रिटेन जैसे देश मेक्सिको के पद चिन्हों पर चलने लगेंगे.

मेक्सिको में मृत्यु संस्कृति का अहम हिस्सा है. यहां तक की वहां के लोग मौत का जश्न भी मनाते हैं. इसके लिए मेक्सिको में डेथ फेस्टिवल मनाया जाता है.

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उन्होंने आयरलैंड का भी उद्हारण दिया, जहां उन्होंने बताया कि मौत के बाद जश्न मनाया जाता है.

मौत के बारे में खुलकर बात करने का कल्चर शुरू होने से लोगों की मरने की जगहों में भी बदलाव आएगा.

ऑस्ट्रेलिया में ज़्यादातर लोगों की मौत अस्पतालों में होती है. जबकि कई लोग चाहते हैं कि वो अपने आखिरी पल अपने घर पर और अपनों के बीच बिताएं.

डॉक्टर किड बताते हैं, "सिर्फ 15% लोग ही अपने घर में आखिरी सांस ले पाते हैं. लेकिन ज़्यादातर लोगों को ये नसीब नहीं होता, वो अस्पताल में ही दम तोड़ देते हैं, जबकि थोड़ी सी तैयारी करके उन्हें अपने आखिरी पल घर में बिताने का मौका दिया जा सकता है."

ज़िंदगी और मौत का सवाल

सैंकड़ों सालों पहले लोगों का घर पर मरना आम बात थी. लेकिन आधुनिक चिकित्सा पद्धति के ज़रिए ऐसी मशीने विकसित कर दी गईं, जिससे इंसान को और लंबे वक्त तक ज़िंदा रखा जा सकता है. अस्पतालों में इन्हीं मशीनों पर लोगों को महीनों और सालों तक जीवित रखा जाता है, जबकि इसका कोई फायदा अंत में मरीज को नहीं मिलता.

वो कहते हैं, "लोग ये तय कर सकेंगे की वो एक वक्त के बाद अस्पताल में पड़े रहने के बजाए आराम से घर आखिरी सांस लें."

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Image caption डॉक्टर कहते हैं कि परिवारों को ये बात करना बेहद ज़रूरी है कि लोग कैसे अपने आखिरी दिन बिताना चाहते हैं

डैथ लैसन के प्रस्ताव को क्विन्सलैंड के शिक्षा मंत्रालय भेज दिया गया है और डॉक्टर किड उम्मीद जताते हैं कि ये संदेश दुनिया के बाकी हिस्सों तक भी पहुंचेगा.

तो हो सकता है शायद आप अपने अगले फैमिली लंच पर इस मामले पर बात कर रहे हों.

ये बातचीत बेश्क आसान नहीं होगी लेकिन ये ज़िंदगी और मौत का सवाल ज़रूर हो सकती है.

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