इंटरनेट पर 'पाबंदी' के लिए रूस में क़ानून

इंटरनेट का इस्तेमाल करते बच्चे
Image caption सरकार का कहना है कि बच्चों को आपत्तिजनक सामग्री देखने से रोकने के लिए क़ानून बना है.

इंटरनेट पर मौजूद बच्चों के लिए कथित हानिकारक सामग्री पर पाबंदी लगाने या उनपर निगरानी रखने के लिए रूस में एक नया क़ानून लागू किया गया है.

इस क़ानून के लागू होने के बाद रूस में अधिकारियों को किसी भी वेबसाइट पर पाबंदी लगाने या उनके किसी सामग्री को साइट से हटाने के लिए आदेश देने का हक़ होगा.

यह क़ानून इसी साल जूलाई में दोनों संसद में पास हुआ था और फिर उस पर राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन की मुहर लग गई थी.

सरकार का कहना है कि इस क़ानून का मुख्य उद्देश्य बच्चों के अत्यधिक यौन सामग्री देखने पर नियंत्रण रखना, ख़ुदकुशी करने के तरीक़े बताने पर पाबंदी लगाना, नशीले पदार्थों के सेवन के प्रोत्साहन पर अंकुश लगाना और अश्लील फ़िल्मों के लिए बच्चों के इस्तेमाल पर नज़र रखना है.

लेकिन मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि नए क़ानून से देश में सेंसर-व्यवस्था या अभिव्यक्ति की आज़ादी पर पाबंदी लगाने को बढ़ावा मिलेगा.

क़ानून के विरोधियों का कहना है कि नया क़ानून लोगों पर अंकुश लगाने का राष्ट्रपति पुतिन का एक और हथकंडा है.

सेंट पीटर्सबर्ग स्थित एक मानवाधिकार संगठन 'सिटिज़ेन्स वॉच' के उपाध्यक्ष यूरी डोविन ने बीबीसी से बातचीत के दौरान कहा, ''ये सच है कि बहुत सारी ऐसी वेबसाइट्स हैं जिन्हें बच्चों को नहीं देखना चाहिए, लेकिन मुझे नहीं लगता है कि बात सिर्फ़ वहीं तक सीमित रहेगी. सरकार किसी भी लोकतंत्र समर्थक वेबसाइट को बंद कर देगी. और ये अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला होगा.''

मानवाधिकार संगठनों के अलावा रूस की सर्च इंजन वेबसाइट यानडेक्स और सोशल मीडिया साइट मेंलडॉटआरयू ने भी नए क़ानून का विरोध किया है.

लेकिन रूस के दूरसंचार मंत्री ने इन आशंकाओं को ख़ारिज करते हुए कहा कि इंटरनेट हमेशा से स्वतंत्र रहा है.

Image caption सिब्बल ने सोशल मीडिया पर पाबंदी संबंधी बयान देकर काफ़ी विवाद पैदा कर दिया था.

उनका कहना था, ''सेंसरशिप लागू करने का सरकार की कोई मंशा नहीं है. यूटयूब और फ़ेसबुक सामाजिक रूप से ज़िम्मेदार कंपनियां हैं. इसका मतलब ये तो नहीं कि अगर वो रूसी क़ानून का पालन नहीं करतीं तो उन्हें बंद कर दिया जाएगा.''

भारत

भारत में भी समय-समय पर सोशल मीडिया या इंटरनेट पर पाबंदी लगाने की बातें होती रही हैं.

पिछले साल दिसंबर में केंद्रीय दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल ने सोशल मीडिया पर कथित आपत्तिजनक सामग्री अपलोड किए जाने के कारण उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करने और उन पर पाबंदी लगाने की बात कहकर एक नई बहस छेड़ दी थी.

सिब्बल के इस बयान का कई लोगों ने विरोध किया था और फिर बाद में उन्हें सफ़ाई देनी पड़ी थी कि सरकार का सोशल मीडिया को नियंत्रित करने का कोई इरादा नहीं है.

इस साल जूलाई में असम में फैली हिंसा के बाद कुछ लोगों ने फेसबुक, ट्विटर और एसएमएस के ज़रिए देश के दूसरे इलाक़ों में रह रहे पूर्वोत्तर के छात्रों को डराने वाले संदेश भेजे थे जिसके बाद अफ़वाह फैल गई और पूर्वोत्तर के छात्रों का पलायन शुरू हो गया था.

उस समय भी सोशल मीडिया और मोबाइल फ़ोन पर पाबंदी लगाने की बात उठी थी. सरकार ने कुछ समय के लिए भारी संख्या में एसएमएस भेजने पर पाबंदी भी लगा दी थी. बाद में सरकार ने अपना फ़ैसला वापस ले लिया था.

रूस ने सोशल मीडिया के कथित ग़लत प्रयोग को रोकने के लिए क़ानून बना दिया है. अब देखना है कि क्या भारत पर इसका कोई असर होगा या नहीं.

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