रीथ लेक्चर 2: 'चिकित्सा में क्रांतिकारी बदलाव संभव'

  • 5 जनवरी 2015
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जमे हुए तालाब की बर्फ़ में धंसकर डूबी तीन साल की एक बच्ची के दिल की धड़कन दो घंट तक बंद रही. उसे बचाने की जद्दोजहद से कई सबक मिले.

इनसे मशहूर सर्जन और लेखक अतुल गवांडे ने दूसरे रीथ लेक्चर में दुनिया की स्वास्थ्य व्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव लाने के तरीके बताए हैं.

वे बताते हैं कि इलाज में गलतियां क्यों होती हैं और कैसे वो बेहतर सिस्टम बनाए जाएँ जिनसे चिकित्सा के क्षेत्र में ग़लितियों की संभावना न्यूनतम हो जाए.

कौन हैं अतुल गवांडे?

अतुल गवांडे हार्वर्ड मेडिकल स्कूल में मेडिसिन के प्रोफ़ेसर हैं. एक सर्जन होने के साथ-साथ वो एक लेखक, विचारक और राजनीतिक विश्लेषक भी हैं. सार्वजनिक स्वास्थ्य के मुद्दे पर वह दुनिया के नामचीन विचारकों में से हैं. बीबीसी रीथ लेक्चर्स के तहत 2014 में उन्होंने “चिकित्सा का भविष्य” (फ़्यूचर ऑफ मेडिसिन) पर चार भाषण दिए.

भारतीय मूल के अतुल गवांडे के पिता महाराष्ट्र के एक गांव से हैं और उनकी मां इलाहाबाद में पली-बढ़ी हैं. दोनों अमरीका में डॉक्टर हैं. जब अतुल गवांडे मात्र 26 साल के थे, तब उन्होंने बिल क्लिंटन की टीम में काम किया. वे बिल क्लिंटन के स्वास्थ्य और सामाजिक नीति के सलाहकार भी रहे. पहला बीबीसी रीथ लेक्चर- वाई डू डॉक्टर्स फ़ेल (डॉक्टर फ़ेल क्यों होते हैं) यहाँ पढ़ें.

अतुल गवांडे का दूसरा लेक्चर: द सेंचुरी ऑफ़ द सिस्टम यानी चिकित्सा व्यवस्था की शताब्दी पर था. ये लेक्चर लंदन स्थित वेलकम ट्रस्ट में हुआ. इसमें उन्होंने बताया कि यदि चिकित्सा के सिस्टम को ठीक से डिज़ाइन किया जाए तो दुनिया भर में स्वास्थ्य सेवा (हेल्थकेयर) की पूरी तरह काया पलट हो सकती है.

अतुल गवांडे का दूसरा रीथ लेक्चर पढ़ें

हर देश अपने लोगों को प्रभावी मेडिकल सुविधा उपलब्ध कराने के लिए संघर्ष कर रहा है. इसके कई कारण हैं. हम कभी तो पैसा, कभी इस क्षेत्र में जरूरत से ज्यादा रेगुलेशन और कभी हेल्थकेयर में जरूरत से ज़्यादा बिज़नेस को दोषी ठहराते हैं. हम ऐसे तमाम मुद्दों से जूझते हैं. हर जगह ये राजनीतिक मुद्दा बन जाता है – अमीर, गरीब, मध्यम वर्ग का मसला और ऐसा पूरी दुनिया में होता है.

मेरी समझ से हेल्थकेयर को बेहतर बनाने के संघर्ष की मुख्य चुनौती इसकी जटिलता है. और मैं शुरुआत करुँगा एक मेडिकल रिपोर्ट से जिसे मैं आपको पढ़कर सुनाता हूँ. मैने इससे सीखा कि यदि कोई व्यक्ति डूब जाए तो क्या करना चाहिए.

डूबी बच्ची की कहानी

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यह रिपोर्ट 1999 में आई. यह ऑस्ट्रिया के एक छोटे से शहर की 3 साल की बच्ची के इलाज की है. उसके मां-बाप जाड़े की एक सुबह उसके साथ सैर कर रहे थे. दुर्भाग्य से मां-बाप की नज़र क्षण भर के लिए बच्ची से हट गई. दोबारा देखा तो बच्ची एक जमे हुई तालाब पर खड़ी थी कि अचानक बर्फ नरम पड़ी, और बच्ची बर्फ के बीच धंसने लगी और फिर बर्फ के नीचे गायब हो गई. मां-बाप भागे और जमे हुए तालाब में कूद गए. तालाब में लड़की को नामोनिशान नहीं था.

आधे घंटे के बाद तालाब की तलहटी में बच्ची के शरीर का एक अंग उनके हाथ लगा. खींच कर बच्ची को बाहर निकाला गया, किनारे लाया गया...ज़ाहिर है उसकी सांस नहीं चल रही थी. मां-बाप ने स्थानीय इमरजेंसी सेवा से मोबाइल पर संपर्क किया और फ़ोन ऑपरेटर ने बच्ची की छाती बार-बार दबाने का तरीका (कार्डियो पल्मोनरी रीससीटेशन) बताया ताकि बच्ची के दिल की धड़कन लौट आए.

मां-बाप ने बच्ची की छाती दबाना शुरू ही किया था कि 8 मिनट में बचाव टीम पहुँची और उसने लड़की के शरीर का तापमान लिया. ये मात्र 66 डिग्री फ़ेरेनहाइट था जो शरीर के सामान्य तापमान से 30 डिग्री से भी ज़्यादा नीचे था. नब्ज बंद थी और बच्ची की साँसें भी नहीं चल रही थीं. सबसे बुरी बात यह थी कि लड़की के आँखों की पुतलियाँ फैल गई थीं और लाइट डालने से उनमें कोई हलचल नहीं थी. मतलब यह - उसके दिमाग ने काम करना बंद कर दिया था.

दो घंटे बाद दिल की धड़कन लौटी

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पर इतने छोटे बच्चे को कौन जाने देना चाहता है? सो बच्ची की छाती को दबाना जारी रखा गया. एक हेलिकॉप्टर से पास के अस्पताल पहुंचाया गया. वहाँ डॉक्टर उसे इमरजेंसी में नहीं सीधे ऑपरेशन रूम में ले गए और बच्ची के शरीर को गरम करना शुरू किया. ऐसी स्थिति में जब किसी व्यक्ति की न तो सांस चल रही हो और न ही दिल धड़क रहा हो, तो उसे हृदय-फेफड़े बाइपास मशीन पर डाल देते हैं. पर यह आसान नहीं होता है. ऐसा करने के लिए आपको उसके पेट और जांघ के बीच कट लगाकर उसके इनफ़्लो और आउटफ़्लो लाइनों को खोल उन्हें कार्डियो पल्मोनरी बाइपास मशीन से जोड़ना होता है. इसके बाद धीरे-धीरे मशीन उसकी सांस और उसके रक्त संचार को चालू करने का ज़िम्मा उठा लेती है.

इस समय तक, बच्ची की सांस को रुके हुए डेढ़ घंटा बीत चुका था. उसके खून और शरीर को गर्म करने की प्रक्रिया जारी थी. शरीर को बहुत जल्दी उष्ण भी नहीं कर सकते क्योंकि ऐसा करने से रक्त कोशिका के फटने का डर रहता है. इस तरह डॉक्टर दो घंटे में उसके शरीर का ताप मात्र 10 डिग्री बढ़ा सके. लेकिन तब बच्ची का हृदय सामान्य गति से धड़कने लगा और वो समझ गए कि कम से कम एक अंग बच्ची को वापस मिल गया है.

अगले 6 घंटे में उन्होंने उसके शरीर के तापमान को धीरे-धीरे बढ़ाना जारी रखा और वह 98.6 के सामान्य तापमान तक पहुँच गया. तब जाकर उन्होंने उसको वेंटिलेटर पर रखने का विचार किया. इससे उसके शरीर में उसकी सांस की नली से होकर आक्सीजन जाती. पर उसने काम नहीं किया. उसके शरीर में आक्सीजन नहीं जा रही थी क्योंकि उसके फेफड़े में पानी और कचरा भरा था जिसके कारण आक्सीजन उसके खून तक नहीं पहुँच रही थी.

सभी ऑर्गन लौटे - दिमाग नहीं

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कार्डियो पल्मोनरी बाइपास मशीन हृदय के ऑपरेशन के लिए बनी थी. यह ऐसा उपकरण नहीं था जिस पर किसी व्यक्ति को ज्यादा समय तक रखा जा सके. इसलिए अलग तरह की मशीन मंगवानी जरूरी था. यह एक कृत्रिम फेफड़ा होता है जिसे एक्स्ट्राकोर्पोरियल मेम्ब्रेन ओक्सिजिनरेटर या ईसीएमओ कहा जाता है.

अब इस मशीन को एकदम ही अलग तरीके से जोड़ा जाना था. इसके लिए उन्हें नन्ही बच्ची की छाती में चीरा लगाकर खोलना पड़ा. उन्हें इन-फ़्लो और आउट-फ़्लो लाइनों को सीधे महा धमनी और हृदय के दाहिने अलिंद (एट्रियम) में प्लग-इन करना था. उन्हें उसके ग्रोइन से पंप को हटाना था और उन वेसेल्स की मरम्मत करनी थी. अब इस मशीन के चालू हो जाने से उसको कृत्रिम फेफड़े का सहारा मिला जिससे उसके हृदय में आक्सीजनयुक्त रक्त का प्रवाह शुरू हो गया.

इस मशीन से उसको जोड़ने के लिए उनको उसकी खुली छाती को विसंक्रमित कपड़े से ढकना पड़ा और उसे मशीन के साथ ऑपरेटिंग रूम से निकालकर गहन चिकित्सा कक्ष (आईसीयू) में ले जाया गया. अगले दिन हर एक घंटे बाद ब्रोंकोस्कोप के ज़रिए उन्होंने उसके फेफड़े में जमे पानी और कचरे को निकालना शुरु किया. उन्होंने उसमें जमे पूरे कचरे को निकालने की कोशिश की. और 24 घंटे बाद जब उन्होंने उसको एक वेंटिलेटर पर रखने का प्रयास किया तो उन्होंने पाया कि अब आक्सीजन उसके रक्त तक पहुँच पा रही थी.

इस तरह बच्ची को उसका दूसरा अंग भी वापस मिल गया. अब उसकी स्थिति में सुधार आने लगा. उन्होंने उसके शरीर के हरेक हिस्से पर काम किया – कैसे गुर्दे को बहाल किया जाए, कैसे लीवर को काम में लाया जाए और कैसे उसकी भोजन नली को सक्षम बनाया जाए. और दो दिन के बाद उन्होंने पाया कि उसके सारे अंग काम करने लगे थे, सिवाए एक अंग के - दिमाग.

बच्ची घर वापस जाने लायक हुई

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उसकी हालत इतनी स्टेबल थी कि डॉक्टर उसे आईसीयू के बाहर रेडिओलोजी स्वीट में सीटी स्कैन के लिए ले गए ताकि उसके दिमाग का स्कैन कर यह देखा जा सके कि कहीं उसके दिमाग को कोई क्षति तो नहीं पहुंची है. और स्कैन से पता चला कि उसका दिमाग उसकी खोपड़ी की सीमा की हद तक सूज गया था. पर ऐसा कोई 'डेड जोन' नहीं था.

उन्होंने न्यूरोसर्जरी की टीम को बुलाया. चूंकि बच्ची के दिमाग में प्रेशर बहुत अधिक था, इसलिए टीम ने उसकी खोपड़ी में एक छेद किया और उसके दिमाग पर दबाव को मापा. अंततः वे उसके दिमाग पर पड़ रहे दबाव को धीरे-धीरे घटाने में सफल रहे. वह एक सप्ताह तक मूर्छित रही और उसमें कोई हरकत नहीं हुई. पर उसके बाद उसकी पुतली रोशनी डालने पर हरकत दिखाने लगी और उसकी सांस स्वतः चलने लगी. फिर एक दिन वो अचानक जागी.

उसने अपनी आँखें खोली और वो वहाँ थी. दो सप्ताह बाद वह अपने घर वापस आ गई. पर अब भी उसके इम्तिहान के दिन खत्म नहीं हुए थे. उसकी दांयी बांह और पैर पैरेलाइज़ हो गए थी, उसकी आवाज़ भी प्रभावित हुई थी. उसको बहुत ही गहन फ़िज़ियो थेरेपी, शैक्षणिक थेरेपी की जरूरत थी ताकि वह जो भी सीख सकती थी, सीख ले और जितना तक संभव हो, उसकी आवाज वापस लायी जा सके.

और फिर दो साल बाद उसे अस्पताल वापस लाया गया ताकि उसकी न्यूरो-साइकोलोजिकल और शारीरिक जांच की जा सके.

उन्होंने पाया कि उसकी शारीरिक ताकत पूरी तरह से लौट आई थी. सबसे बड़ी बात यह थी कि पाँच साल की लड़की में जिस स्तर की मनोवैज्ञानिक क्षमता होनी चाहिए वह उसमें थी. दूसरे शब्दों में, इतना सब कुछ होने के बाद पाँच साल की एक लड़की को जिस तरह होना चाहिए वह बिलकुल वैसी ही थी.

मैं इस केस रिपोर्ट को आपको पढ़कर सुना रहा हूँ ताकि हम जान सकें कि कैसे हम किसी को डूबने से बचा सकते हैं. इसमें मुझे दो बातें बहुत ही प्रमुख लगीं. पहला, कि हमने किस हद तक की क्षमता हासिल कर ली है – बच्ची जो 30 मिनट तक बिना सांस लिए पानी में डूबी रही, फिर एक घंटे तक जिसपर सीपीआर चला और इतना सब होने के बाद भी हम उसको जीवित रख पाए. दूसरा है, हम कैसे यह सब कर पाए? यह एक असंभव सा काम था.

हर व्यक्ति को अपना हर कार्य बिलकुल सही तरीके से करना था. और उसकी तीमारदारी में दर्जनों, शायद सैकड़ों लोग लगे थे और इनमें से कोई भी व्यक्ति एक गलती करता तो सब ख़त्म हो सकता था. एक भी नर्स ने अगर उसकी चीरी गई खुली छाती को ढकने वाले ड्रेप को ही बिना हाथ धोए छुआ होता और उस घाव तक बैक्टीरिया पहुँच जाता तो सब कुछ बिगड़ जाता.

पेनिसिलिन ने मूर्ख बनाया

मैं सोचता हूँ कि जब हम पिछली शताब्दी में हुई प्रगति की मदद लेकर लोगों तक उसका लाभ पहुंचाने की बात करते हैं तो लगता है कि पेनिसिलिन ने हमें मूर्ख बनाया.

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जिस सेंट मेरी अस्पताल में 1929 में अलेक्ज़ांडर फ्लेमिंग ने पेनिसिलिन की खोज की वह जगह यहाँ से ज्यादा दूर नहीं है. इसका बड़े पैमाने पर उत्पादन और समुदायों द्वारा इसको उपयोग में लाने में 20 साल लग गए. अब यह पेनिसिलीन एंटीबायोटिक के रूप में हमारे सामने आया जो बीमारी को रोक सकता था. और जब पेनिसिलिन हमारे समुदायों में आया तो यह एक चमत्कार की तरह था. ऐसा चमत्कार जिससे हम बीमारी का खात्मा कर सकते थे – जबकि वास्तव में, बैक्टीरिया से होने वाले अनेक संक्रमणों के बारे में हम पहले कुछ भी नहीं कर सकते थे.

ये चमत्कार इसलिए था कि यह बहुत आसान था. सिर्फ एक इंजेक्शन भर देना होता है. हमें यह कल्पना करने पर मजबूर कर दिया गया कि यह चिकित्सा और आम तौर पर हेल्थकेयर का भविष्य है. हमें लगा कि कैंसर, हृदय रोग और पैरेलिसिस के इलाज के लिए भी एक इंजेक्शन ही काफ़ी होगा.

पर पिछली सदी के इस खोज से जो सच बाहर आया है वह कहीं से भी यह नहीं सुझाता कि चिकित्सा का भविष्य या हेल्थकेयर पेनिसिलिन की खोज की तरह है. अपनी खोजों को आधार बनाकर जब हम उसका लाभ लोगों तक पहुंचाने की कोशिश करते हैं तो हमें काफ़ी जटिलताओं का सामना करना पड़ता है. जैसा उस टीम ने डूबी हुई उस छोटी बच्ची को बचाने के लिए किया...शायद आप जानते होंगें कि इतना खर्च करने के बावजूद पूरे अमेरिका और यूरोप में कोरोनरी आर्टरी डिज़ीज़ या दिल की बीमारी से ग्रस्त लोगों में से 40 फ़ीसदी लोगों को अपर्याप्त और अनुचित इलाज मिलता है.

दमा से ग्रस्त लोगों में से 60 फ़ीसदी और उच्च रक्त चाप जिससे कि दुनिया में सबसे ज़्यादा लोग मरते हैं, से ग्रस्त 60 फ़ीसदी लोगों को अपर्याप्त और अनुचित इलाज मिलता है. कुछ मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित गड़बड़ियों में तो यह प्रतिशत 90 तक है. अब ज़रा इस तथ्य पर गौर करें कि हमारे अस्पतालों में 60 लाख लोग इसलिए संक्रमित होते हैं क्योंकि किसी ने संक्रमण रोकने के लिए सुझाए गए मूल एहतियात नहीं बरते, जिनके बारे में हम दशकों से जानते हैं. तो सवाल उठता है कि यह सब क्या है इसको कैसे समझें?

आप इसकी तह तक जाइए और पता चलेगा कि ये समस्या केवल चिकित्सा के क्षेत्र में ही नहीं है. हमने बड़ी-बड़ी खोज की हैं पर उनको लोगों तक पहुंचाने के क्रम में पाते हैं कि ऐसा करना काफ़ी जटिल है. उदाहरण के लिए, हत्या की जांच सही नहीं होती है, हमारे सॉफ़्टवेयर के डिज़ाइन में खामियां रह जाती हैं, हमारी गुप्तचर व्यवस्था विफल रहती है, पिछले समय में हमारे बैंक लड़खड़ाते दिखे हैं.

हम बार-बार देख रहे हैं कि पिछली सदी में हमने जितने बड़े पैमाने पर जानकारियाँ और स्किल्स जुटाई हैं, उन सब को 21वीं सदी में किसी एक व्यक्ति को अपने दिमाग में रख पाना संभव नहीं. और इन सभी पर काम कर पाना भी किसी एक व्यक्ति के बूते से बाहर की बात है. ज्ञान और स्किल्स का भंडार हमारी व्यक्तिगत क्षमताओं से कहीं अधिक है.

'आपको ये करना ही है'

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ऐसी स्थिति में इसका समाधान कैसे किया जाए? चिकित्सा और अन्य क्षेत्रों में हम अपनी परफ़ॉर्मेंस को बेहतर कैसे बनाएँ? आप जानते हैं कि हमारे पास एक 'कोर आइडिया' हुआ करता था और मैं इसे 'प्रिमिटिव' आइडिया कहता हूँ और वो यह है कि हमें लोगों को सिर्फ यह कहने की जरूरत है – 'आपको यह इसी तरीके से करना है.' आपको यही करना है और हम आपको यह करने के लिए कह रहे हैं.

यह हाथ धोने के लिए कहना हो सकता है, किसी डूबती बच्ची को बचाने के लिए हो सकता है या किसी जनसंहार की उचित तरीके से जांच करने के लिए कहना हो सकता है.

और आपको करना क्या है? हम आपको ये क्लास में पढ़ाते हैं, काम के दौरान प्रशिक्षित करते समय बताते हैं, और तब फिर पता चलता है कि आप शायद बाद में उसे नहीं करते हैं. और तब हमने मध्यकालीन रवैया अपनाया – 'अमुक काम आपको अवश्य करना है.'

हमने नियम और दिशानिर्देश जारी किए हैं. अगर आप इसका पालन नहीं करेंगे तो हम आपका लाइसेन्स छीन लेंगें. या थोड़ा अच्छा बनने की कोशिश करते हुए हम कह सकते हैं कि अगर आप इसे करेंगें तो हम आपको ज़्यादा भुगतान करेंगें और इन्सेंटिव देंगे. इससे हालात में सुधार तो हुआ पर मामूली सा. इससे हमें वो नहीं मिला जो हम पाना चाहते थे.

अब आधुनिक युग में इसका एक ही रास्ता है कि इस नियम को मानक बना दिया जाए. और ये मानक ही वो सिस्टम हो जो एक चेकलिस्ट की तरह साधारण हो. यह डिफ़ाल्ट्स हो सकते हैं, ये फ़ीडबैक लूप हो सकते हैं. महत्वपूर्ण बात यह है कि हमें दिशानिर्देशों और मानकों के अनुरूप काम करने पर ध्यान केंद्रित करना है ताकि हर व्यक्ति के लिए इनका पालन करना आसान हो जाए.

मेरे एक मित्र ने कहा कि ''हम मोलीक्यूल की सदी से सिस्टम की सेंचुरी'' की ओर बढ़ रहे हैं. और ऐसा कहने के पीछे उनका आशय यह था कि पिछली सदी में हमने जीन का पता लगाया जो बीमारियों के बारे में बताती है, हमने न्यूरोन के बारे में पता लगाया जो हमें मस्तिष्क के कार्य करने के तरीके की जानकारी देता है और इससे हमारे ज्ञान का भंडार काफ़ी बढ़ा. हमारे जीन्स आपस में जिस तरह कनेक्ट करते हैं उस पर निर्भर करता है की हमारी बीमारियाँ किधर जाएंगीं."

न्यूरोन्स आपस में जुड़कर एक ऐसे नेटवर्क का निर्माण करते हैं जो चेतना और आचरण (बिहेवियर) तय करता है, और वास्तव में यह वैसा ही है जैसा दवाओं, यंत्रों और विशेषज्ञों की टीम मिलकर एक ऐसी केयर बनाती है जैसी हम चाहते हैं. और जब ये सारी बातें एक साथ नहीं हो पाती हैं तो वही होता है जो हम सब देख रहे हैं – स्वास्थ्य सेवा का बुरा हाल ! हमें मूल बातों का पता ज़रूर है लेकिन इनका पालन नहीं होता है.

चेकलिस्ट बनाई

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इसलिए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कई साल पहले सर्जरी के दौरान होने वाली मृत्यु की दर में कमी लाने के एक प्रोजेक्ट के संबंध में हमसे संपर्क किया. मैंने सोचा इसे कैसे किया जा सकता है? हमने एयरलाइन उद्योग की एक टीम के साथ एक डिज़ाइन पर काम किया जो वास्तव में एक चेकलिस्ट के रूप में सामने आया. इस चेकलिस्ट को ऐसे तैयार किया गया था कि विशेषज्ञ तक की गलतियों को पकड़ा जा सके. इनमें से अधिकतर संवाद की विफलता से जुड़ी थीं. इस चेकलिस्ट में कई बातें बहुत ही बेवकूफ़ी भरी प्रतीत हो सकती हैं –

  • आपके पास सही रोगी है कि नहीं?
  • आप जिसका ऑपरेशन कर रहे हैं उसके शरीर के सही भाग में हैं कि नहीं?
  • क्या आपने ऐसा एंटीबायोटिक दिया या नहीं जो संक्रमण की संभावना को 50 फीसदी घटा दे?
  • मरीज को इसे उचित समय पर दिया है कि नहीं?
  • टीम के सभी सदस्य एक दूसरे का नाम और भूमिका जानते हैं कि नहीं?
  • एनेस्थेसिया की टीम ने रोगी के चिकित्सकीय हालातों की चर्चा की है कि नहीं?
  • सर्जन ने ऑपरेशन के लक्ष्यों के बारे में टीम को बताया या नहीं?
  • केस में कितना समय लगेगा और कितना खून देने के लिए तैयार रहना चाहिए?
  • क्या नर्स को पता है कि सर्जरी के लिए कौन से उपकरण तैयार रखने हैं?
  • क्या सभी प्रश्नों के उत्तर मिल गए हैं?

और तभी जाकर आप सर्जरी शुरू करते हैं. हमने इसे दुनिया के आठ शहरों में आज़माया जिनमें सेंट मेरी हॉस्पिटल लंदन, टोरंटो, सीएटल, दिल्ली, तंजानिया भी शामिल हैं. वो सभी अस्पताल जिनमें चेकलिस्ट का प्रयोग किया गया, वहाँ ''कोंप्लीकेशन्स'' की दर में गिरावट आई. कोंप्लीकेशन्स में औसतन कमी 35 फीसदी थी. मृत्यु कि दर में यह गिरावट 47 फीसदी पायी गई.

इस तरीके को कई स्थानों में अपनाया गया है. स्कॉटलैंड ने इसे लागू किया है और पिछले चार साल में वहाँ 9000 लोगों की जान बचाई गई है.

विशेषज्ञ भी ग़लती कर सकता है

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अब जो हमें पता चला है उससे स्पष्ट है कि चेकलिस्ट ही सब कुछ नहीं है. ऐसा नहीं है कि आपने एक अभ्यास करने के लिए लोगों को चेकलिस्ट थमा दी और सब हो गया. हमने एक संगठन ''लाइफ़बॉक्स'' बनाया जिसने निम्न और मध्यम आय वर्ग के लोगों तक इसका फ़ायदा पहुँचाने की कोशिश की है. पर इसका सबसे कठिन काम था वो कल्चर बनाना जिसमें इतनी विनम्रता हो कि वो मान सके कि अनुभवी और विशेषज्ञ भी असफल हो सकते हैं. हम में इसे समझने की विनम्रता होनी चाहिए.

पर कई क्षेत्रों में हम देखते हैं कि जो भी डिज़ाइन मौजूद है वो व्यक्ति पर केंद्रित है, दवा या डिवाइस या स्पेशलिस्ट के इर्दगिर्द ही घूमता है, न कि एक सिस्टम के रूप में. यह दवा या डिवाइस या स्पेशलिस्ट के इर्दगिर्द ही घूमता है. हमें इस तरह के सिस्टम से डर लगता है. हमें डर लगता है कि इससे हीरोइज़म और साहसिक कदम उठाने की दिलेरी ख़त्म हो जाएगी.

इस सिस्टम को अपनाने के 3 महीने बाद हमने सर्जनों से पूछा, ''इस अप्रोच के बारे में आपका क्या कहना है''? हमने पाया कि इनमें से 20 फ़ीसदी सर्जनों को यह कतई पसंद नहीं था.

प्रतिक्रियाएँ कुछ इस तरह से थीं – ''इसने पेपर वर्क (कागज़ी कार्रवाई) बढ़ा दिया है, सिरदर्दी बढ़ी है, मैं इसे करना ही नहीं चाहता.'' और तब हमने उनसे पूछा, ''अगर आप कोई ऑपरेशन कर रहे हैं तो क्या आप चाहेंगें कि आपकी टीम चेकलिस्ट का प्रयोग करे?''

इन सर्जनों में से 94 फ़ीसदी ने इसे इस्तेमाल करने पर सहमति जताई. और इससे पता चला कि अनुशासन साहसिक कदम उठाने की दिलेरी को संभव बनाता है.

जब मैंने डूबने वाली उस लड़की के बारे में पढ़ा तो मेरे मन में यही सवाल उठा कि उन लोगों ने कैसे इसे संभव बनाया? आप जानते हैं कि ये सिस्टम हारवर्ड या लंदन में नहीं बना. इसे चिकित्सा का मक्का समझे जाने वाले किसी संस्थान में नहीं बनाया गया. ये आस्ट्रियाई एल्प्स पहाड़ों में मौजूद एक छोटे से सामुदायिक अस्पताल में संभव हुआ था. सो मैंने इस पूरे काम में मुख्य भूमिका निभाने वाले युवा कार्डियक सर्जन को आस्ट्रिया के क्लाजेन्फ़र्ट में फ़ोन लगाया.

'आपने कैसे किया यह सब?'

और फिर उसने मुझे पूरी कहानी बताई. उसने कहा- ''आपको पता है कि हमारे यहां हर साल दर्जनों लोग हिमस्खलन के शिकार होते हैं और वे बर्फ़ में जमे हुआ मिलते हैं, जो कि डूबने की ही तरह होता है और मुझे यकीन था कि उन्हें बचाया जा सकता है. और फिर इसके लिए हमने शुरुआत इस तरह से की – हमने तय किया कि ये-ये काम करने की जरूरत है, आओ हम इस काम को पूरा करें”. एक सर्जन यही तो करता है, ना- “इसे करना ही है, भाड़ में जाओ ! पर इससे बात नहीं बनी.''

तब इस सर्जन ने विफलताओं पर ध्यान दिया और उसे एहसास हुआ कि समस्या स्पीड की है. मतलब जल्दी ही सभी कुछ तैयार रखने की बात थी - पंप उपलब्ध हो और काम करने के लिए चालू स्थिति में हो, इमरजेंसी रूम की टीम तैयार हो, ट्रौमा सर्जन, कार्डिएक सर्जन, कार्डिएक एनेस्थेटिस्ट और परफ्यूज़निस्ट तैयार हों. और होता ये था कि हमेशा इनमें से कुछ न कुछ तैयार नहीं होता था. आपको पता चला कि एनेस्थेटिस्ट कि जब जरूरत पड़ी तो वो घर पर था और उसे अस्पताल पहुँचने में 30 मिनट लग जाएँगे, या फिर कोई मशीन तैयार नहीं मिलेगी.

उन्होंने एक चेकलिस्ट बनाई और उसे उस व्यक्ति को थमाया जो इस सिस्टम का सबसे कम प्रभावशाली व्यक्ति था - टेलीफ़ोन ऑपरेटर.

फ़ोन कॉल आने पर टेलीफ़ोन ऑपरेटर पूरी चेकलिसल्ट को हरकत में लाने लगा. टेलीफ़ोन ऑपरेटर एनेस्थेसिओलोजिस्ट और कार्डिएक सर्जन तक को फ़ोन कर कह सकता था- ''आपकी ज़रूरत है और तत्काल घर से यहाँ पहुँचें.'' इंजीनियर मशीन को तैयार रखने लगा, और इसी सिस्टम के तहत जिसे पहला जीवनदान मिला – वो थी नन्ही बच्ची और उसके बाद कई अन्य लोगों की जान बचाई जा सकी.

फ़ोन कॉल के दौरान ही ऑस्ट्रिया के उस सर्जन ने मुझे हाल के एक मामले के बारे में बताया.

डूबने के आधे घंटे बाद बच्ची को बचाया

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ऑस्ट्रियाई सर्जन ने ताज़ा मामला एक मां-बेटी की कार दुर्घटना का बताया. मां-बेटी बर्फ़ीली पहाड़ी से होकर कार में जा रहे थे, कार बर्फ़ पर फिसली और सड़क के किनारे बचाव के लिए बनाई छोटी दीवार से टकराई जिससे मां की तत्काल मौत हो गई. इस दीवार को तोड़ती हुई कार पहाड़ी के ऊपर से नीचे नदी में गिर गई और फिर पानी के अंदर डूबने लगी. जब इमरजेंसी बचाव दल घटनास्थल पर पहुँचा तो उसने कार को पानी के अंदर जाते हुए देखा.

कार को पानी के अंदर ही खोलना बहुत ही मुश्किल काम था और पता नहीं उन्होंने इसे कैसे किया. वे लड़की को आधे घंटे बाद पानी से बाहर लाने में सफल रहे जब उसकी सांस नहीं चल रही थी.

पर इसके बाद से जो हुआ वह एकदम वैसे ही था जैसे होना चाहिए था. सिस्टम क्लॉकवर्क की तरह चला, यानी सब कुछ घड़ी के हिसाब से हुआ - अस्पताल को सूचना मिली, अस्पताल की टीम मिनटों में वहाँ पहुँची, इमर्जेंसी रूम को छोड़ते हुए बच्ची को सीधे ऑपरेशन रूम में ले जाया गया और उसे सीधे बाइपास मशीन पर डाल दिया गया. वे हृदयगति चालू करने में सफल रहे. फिर फेफड़े को दुरुस्त करने में जुटे और उन्होंने ये प्रक्रिया पहले से भी जल्द समय में पूरी कर ली.

परिणाम यह कि अगले ही दिन लड़की की सारी ट्यूब हटा दी गईं और उसके अगले दिन वह उठकर बिस्तर में बैठने लायक हो गई और उससे अगले दिन घर जाने के लिए तैयार थी.

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