रीथ लेक्चर 3: गरिमा से मरने का हक़

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जब कैंसर सर्जन और लेखक अतुल गवांडे की बेटी की पियानो टीचर का कैंसर बिगड़ गया और उसने गवांडे से मदद की गुहार लगाई तो उन्हें समझ नहीं आया कि वे क्या सलाह दें. बहुत सोच-विचार के बाद उन्होंने इसका एक रास्ता निकाला.

सर्जन-लेखक अतुल गवांडे कहते हैं कि डॉक्टर और हेल्थकेयर बुढ़ापे और मौत को मात्र चिकित्सा से जोड़ कर नहीं देख सकते हैं.

पियानो टीचर की अद्भुत कहानी के ज़रिए, एडिनबरा में तीसरे बीबीसी रीथ लेक्चर में अतुल गवांडे ने बताया कि कई बार अंतिम क्षण तक मरीज़ की सांसों को चलाए रखने के संघर्ष से ज़्यादा, मरीज़ की अंतिम समय की प्राथमिकताओं को जानना और उन्हें पूरा करना ज़रूरी होता है.

कौन हैं अतुल गवांडे?

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अतुल गवांडे हार्वर्ड मेडिकल स्कूल में मेडिसिन के प्रोफ़ेसर हैं. एक सर्जन होने के साथ-साथ वो एक लेखक, विचारक और राजनीतिक विश्लेषक भी हैं. सार्वजनिक स्वास्थ्य के मुद्दे पर वह दुनिया के नामचीन विचारकों में से हैं. बीबीसी रीथ लेक्चर्स के तहत 2014 में उन्होंने “चिकित्सा का भविष्य” (फ्यूचर ऑफ मेडिसिन) पर चार भाषण दिए.

भारतीय मूल के अतुल गवांडे के पिता महाराष्ट्र के एक गांव के रहने वाले थे और उनकी मां इलाहाबाद में पली-बढ़ी हैं. दोनों अमरीका में डॉक्टर रहे. जब अतुल गवांडे मात्र 26 साल के थे, तब उन्होंने राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की टीम में काम किया. वे बिल क्लिंटन के स्वास्थ्य और सामाजिक नीति के सलाहकार भी रहे.

पहला बीबीसी रीथ लेक्चर - वाई डू डॉक्टर्स फ़ेल (डॉक्टर फ़ेल क्यों होते हैं) यहाँ पढ़ें ; दूसरा बीबीसी रीथा लेक्चर: द सेंचुरी ऑफ द सिस्टम (व्यवस्था की शताब्दी) यहाँ पढ़ें.

तीसरे बीबीसी रीथ लेक्चर का विषय है - द प्रॉब्लम ऑफ़ ह्यूब्रिस (अहंकार की समस्या)

अतुल गवांडे का तीसरा रीथ लेक्चर पढ़ें

मैंने मेडिकल स्कूल में काफ़ी कुछ सीखा पर मोर्टेलिटी (नश्वरता) के बारे में नहीं पढ़ा था जो कि थोड़ा अजीब लगता है. हम कुछ अर्थों में मेडिकल स्कूल आते हैं हीरो बनने के लिए.

हम यह जानना चाहते हैं कि हमारे शरीर में क्या गड़बड़ियाँ होती हैं और इन्हें कैसे ठीक किया जा सकता है. हम इस बात को समझने के लिए कतई उत्सुक नहीं होते कि भविष्य में हमारे काम का एक बड़ा हिस्सा इस बात से जूझने में जाएगा कि हमारे ज्ञान की सीमा है और हम अपने काम में चूक भी कर सकते हैं.

अति आत्मविश्वास

हमारे साथ 'ह्यूब्रिस' या अहंकार की समस्या है, अति आत्मविश्वास है. लेकिन हम धीरे-धीरे यह समझने लगते हैं की जो ठीक हो ही नहीं हो सकता, उसको हम ठीक नहीं कर सकते. जब मैंने प्रैक्टिस शुरू की मेरे पास बहुत से लोग ऐसी समस्याएं लेकर आते थे, जिनको मैं ठीक नहीं कर सकता था. बढ़ती उम्र और मृत्यु ऐसी दो बातें हैं जिनका इलाज हमारे पास नहीं है. और सच्चाई यह थी कि मैं इस बात के लिए तैयार ही नहीं था कि मैं इनकी मदद कैसे करूँ.

लेकिन फिर भी पिछले 50 साल में हम “मेडिकलाइज्ड मोर्टलिटी” की स्थिति में पहुचे गए हैं, मरण को मेरे जैसे लोगों के हाथ में यह कहते हुए सौंप दिया गया है कि इन्हें पता होगा कि जीवन के इस हिस्से में क्या करें. और इसकी हद काफ़ी आश्चर्यजनक है. स्कॉटलैंड से जापान तक, अनुमान यह है कि हमारी 60 फ़ीसदी आबादी का अंत अस्पतालों में होगा. यह एक आश्चर्यजनक बदलाव है, क्योंकि 1950 के दशक में अधिकतर लोग अपने घरों में मरते थे. अब 80 फ़ीसदी से अधिक लोग किसी न किसी तरह के संस्थान में दम तोड़ते हैं. हम में से जो लोग उन संस्थानों में काम करते हैं वो ये सवाल पूछने पर मजबूर हैं: इनके जीवन में आने वाले इन क्षणों के साथ हमें क्या करना चाहिए?

कैंसर पीड़िता की कहानी

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मेरी 13 साल की बेटी को पियानो सिखाने वाली पेग बैचेल्डर के पति ने मुझे फ़ोन किया और उन्होंने सीधे कहा, “पेग अस्पताल में हैं.” उनका फ़ोन करने का मक़सद यही था कि हम अब क्या करें? पेग को असाधारण कैंसर था. ये सॉफ्ट टिशू कैंसर होता है जो कि उनके पेडू (पेल्विस) में था. कुछ साल पहले ऑपरेशन से उनके पेल्विस का एक-तिहाई हिस्सा निकाला गया था और उसके बाद कीमोथेरेपी हुई और उन्हें रेडिएशन से गुज़रना पड़ा.

उन्हें कई तरह की दिक्कतें आईं और वह कई सप्ताह अस्पताल में रहीं. उन्होंने इसे “नरक में गुज़रा वक़्त” बताया. पर वह इन सबसे विजयी होकर निकली थीं. इलाज के बाद उनमें अब बीमारी के लक्षण नहीं थे. उनका अच्छा इलाज हुआ था. ठीक होकर वह फिर पियानो सिखाने लगी थीं. वह एक बहुत ही लोकप्रिय और सदा खुश रहने वाली शिक्षक थीं.

वह केनेडियन बैसाखी से ही चल पाती थीं. चलने के दौरान यह आपकी कलाइयों पर बंधी होती है. वह काफ़ी हद तक ठीक हो चुकी थीं.

बीमारी ने फिर घेरा

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और मैं यह भी जानता हूँ कि कुछ वर्ष पहले उन्हें कैंसर के इलाज के कारण कुछ परेशानियाँ पैदा हुई थीं. उनको ल्यूकेमिया की तरह की मेलिग्नेंसी हो गई थी जो कि कीमोथेरेपी के कारण हुई थी. इसके कारण उनको दूसरे तरह की कीमोथेरेपी कराने की ज़रूरत थी. पर पेग ने इस बात पर ज़ोर दिया कि वह पढ़ाना जारी रखेंगी.

पेग को कीमोथेरेपी के लिए जाना पड़ता था, इसलिए मेरी बेटी को कई बार यह बताया जाता था कि उसकी पियानो की क्लास अभी कुछ दिन नहीं होगी क्योंकि टीचर पेग डॉक्टर के पास गई हैं. एक बार उन्हें पूरे साल अधिकांश समय के लिए अस्पताल जाना पड़ा. फिर हमें बताया गया कि पियानो क्लास कब शुरू होगी, इसके बारे में हमें बाद में बताया जाएगा.

यही वो समय था जब मार्टिन का फ़ोन मेरे पास आया. वह अस्पताल से बोल रहे थे और उन्होंने पेग को स्पीकरफ़ोनपर डाल दिया जिससे मैं उन्हें उनकी कहानी सुनाते हुए सुन सकता था. उनकी आवाज कमज़ोर हो गई थी, काफ़ी रुक-रुक कर बोलती थीं और उन्होंने कहा कि ल्यूकेमिया जैसी मैलीग्नेंसी को ठीक करने के लिए हो रहा इलाज कारगर नहीं है. इस इलाज के कारण उनकी रक्त कोशिकाओं का काउंट गिर गया था.

इनमें से कुछ रक्त कोशिकाएँ संक्रमण से लड़ती हैं और इसके कारण उन्हें बार-बार बुखार होता था. डॉक्टर जानते थे कि उन्हें कहीं संक्रमण हो गया है और इसलिए उन्होंने उनकी स्कैनिंग की. और तब उन्हें यह भी पता चला कि उनका पुराना कैंसर भी वापस आ गया है – इस बार हिप के दूसरे हिस्से में और ये लीवर तक फैल चुका था.

मरीज़़ की बेबसी

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अगले कुछ हफ्तों में उनके पुराने कैंसर का ट्यूमर बड़ा हो गया और उनको भयंकर दर्द रहने लगा. वह बिस्तर से उठ भी नहीं पा रहीं थीं. ऐसी स्थिति हो जाने के बाद वह अस्पताल में आईं. और फिर उन्होंने फ़ोन किया कि अब उन्हें क्या करना चाहिए?

मैंने उनसे पूछा, “डॉक्टर क्या कहते हैं?” और उन्होंने कहा, “ज़्यादा कुछ नहीं. वो मुझे खून चढ़ा रहे हैं ताकि मेरे ब्लड सेल्स की गिरती संख्या पर काबू पाया जा सके. वो दर्द कम करने वाली दवाइयाँ दे रहे हैं और स्टेरॉयड भी. पर इससे आगे क्या? डॉक्टरों ने कहा कि ऐसी कोई मान्य कीमोथेरेपी नहीं है जो दी जा सके."

मुझे लगता है की यही वो क्षण है जिसके बारे में दुनिया भर में हम चर्चा करते हैं: हम क्या सोचते हैं, आगे क्या होगा? यह एक बहुत ही कठिन समय होता है, परीक्षा की घड़ी होती है. मन में विचार आया कि क्या उन्हें किसी नई थेरेपी को आज़माने की सलाह दूँ. पेग और उनके पति ने मुझसे कहा कि वे लोग बोन मैरो (अस्थि मज्जा) प्रत्यारोपण के बारे में सोच रहे हैं – यह एक ऐसा विकल्प है जिसको आज़माने को लेकर डॉक्टरों में भी सहमति नहीं थी.

पेग ने पूछा कि क्या उसे अब सारी उम्मीदें छोड़ देनी चाहिए? उसके डॉक्टर कहते हैं कि वे उसे दर्दनिवारक दवा देकर “आरामदायक” स्थिति में रख सकते हैं.

मैं जानता हूँ की दोनों में से कोई विकल्प सही नहीं है – सारी उम्मीद छोड़ देना या फिर हर कीमत पर सभी कुछ आज़माना. दस साल से अधिक समय प्रैक्टिस करने के बाद मैं आश्वस्त नहीं था कि मैं अन्य विकल्पों के बारे में बता सकूँ. इस स्थिति से निपटने में मैं सक्षम नहीं था.

काश, मैं कह पाता

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मैं सक्षम महसूस करता यदि मैं कह पाता, “हाँ, हम ऑपरेशन कर सकते हैं और ऐसी कुछ चीजें हैं जो मैं कर सकता हूँ.” पर इस स्थिति में मैं निस्सहाय हूँ. मुझे यह स्थिति परेशान करती है. एक सर्जन के रूप में मुझे यह परेशान करता है और मैंने इस तरह के कई मरीज़़ों को देखा है. मैं एक कैंसर सर्जन हूँ और सोचता हूं कि अपने मरीज़़ों का ऐसा इलाज करूँ जो उनकी आयु बढ़ा दे – हालांकि अमूमन इलाज़ के बाद भी उनकी स्थिति और बिगड़ जाती है.

एक बेटे के रूप में भी मैं ज्यादा परेशान हुआ क्योंकि मेरे पिताजी को कुछ साल पहले ब्रेन स्टेम और स्पाइनल कॉर्ड (मेरूदण्ड) में ट्यूमर होने का पता चला जो ठीक नहीं हो सकता. वे खुद एक सर्जन थे और हम सोचते रहे कि इस स्थिति में क्या किया जाए?

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इसलिए मैं इस तरह के सवालों को यूं समझता हूँ - मैं एक लेखक के रूप में इससे निपटता हूँ. मैंने बहुत सारे लोगों से बात की और 200 परिवारों के सदस्यों से बात करने के बाद तो मैंने गिनना ही छोड़ दिया.

मैंने 200 से ज्यादा परिवारों, परिवार के सदस्यों और मरीज़़ों से बढ़ती उम्र से जुड़ी गंभीर बीमारियों के दौरान उनके अनुभव पूछे और उनसे बात की. मैंने मरीज़़ों को आराम पहुंचाने वाले अनेक डॉक्टरों, अग्रिम पंक्ति के नर्सिंगहोम्स के कार्यकर्ताओं, बूढ़े लोगों के साथ काम करने वालों एवं अन्य लोगों से बातचीत की.

सोच का फर्क

इसके बाद ऐसे लोगों का ग्रुप सामने आया जिन्हें मिलकर लगा कि वे जानते थे कि इन परिस्थितियों में क्या किया जाए. सोचने का उनका अपना तरीका था और ठीक नहीं होने वाली बीमारियों से ग्रस्त होने की स्थिति में वे क्या कर सकते हैं इस बारे में उनकी अपनी राय थी.

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जो दो बातें मैंने उनसे सीखी वो सबसे ज्यादा अहम थीं. पहला, चिकित्सा और जीवन में हम एक बात समझने में विफल रहे हैं कि लंबे समय तक जीवित रहने के अतिरिक्त भी लोगों की प्राथमिकताएँ होती हैं.

हम एक ऐसे व्यक्ति के रूप में जीवित नहीं रहना चाहते जिसकी सिर्फ सांसें चल रही हैं और वह बिस्तर पर पड़ा हुआ है – कुछ नहीं कर रहा है. पर ऐसे लोगों की प्राथमिकताएँ क्या हैं? उसमें बहुत सारी बातें शामिल हैं, जैसे - वे चाहते हैं कि उनके संज्ञानग्राही अंग काम करते रहें, या हम इलाज ऐसे करें कि वो अपना ज़्यादा समय घर में बिता सकें न कि अस्पताल में, या वो अपने कुत्ते के साथ समय गुज़ार सकें.

दूसरा, मैंने सीखा कि कोई बात सीखने का सबसे विश्वसनीय तरीका है कि आप पूछें. और हम पूछते नहीं हैं. बहुत ही एडवांस्ड स्तर के कैंसर मरीज़ के संबंधित एक अध्ययन में मरीज़़ों के एक समूह से बात की गई जो कि औसतन मात्र चार महीने तक ही जीवित रह सकते थे.

इस समूह के एक तिहाई से भी कम मरीज़़ों की उनके डॉक्टरों से जीवन के अंतिम दिनों में उनकी प्राथमिकताओं और लक्ष्यों के बारे में बात हुई थी.

जिस ग्रुप के मरीज़़ों की इस बारे में बात हुई उन्होंने अंतिम दिनों में कम पीड़ा महसूस की, उनकी ऐसी तीमारदारी हुई जैसा वो चाहते थे, अस्पतालों या आईसीयू में दम तोड़ने की जगह उनकी अपने घर में अंतिम सांसें लेने की संभावना ज़्यादा थी. उनके मरने के छह महीने बाद उनके परिवार के सदस्यों में अवसाद या पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर से ग्रस्त होने की संभावना कम थी पर ऐसा सिर्फ उन एक तिहाई मरीज़़ों के साथ ही हो सकता था जिनकी डॉक्टरों से बातचीत हुई.

मरीज़़ों को ताक़त

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एक और दिलचस्प बात मैंने सीखी. जब आप उनसे उनकी प्राथमिकताओं के बारे में पूछते हैं तो इसमें एक विशेष तरह की ताक़त होती है. हम लोग मरीज़़ की अपनी चिंताओं को समझने में मदद करते हैं - उन्हें क्या हो रहा है, उनके शरीर के साथ क्या हो रहा है. और, इसके लिए हम उन्हें कई तरह के तथ्यों और आंकड़ों की जानकारी देते हैं.

लोग इन तथ्यों को सुनकर अपनी चिंताओं से पार नहीं पाते. बल्कि वे अपने ही शब्दों में खुद को इस सत्य से अवगत कराते हैं. इसलिए लोगों से बातचीत के क्रम में मैंने उनसे पूछा, “तो अगली बार जब मैं ऑफिस जाऊँ और मुझे एक मरीज़ का ऑपरेशन करना हो या इलाज के महत्वपूर्ण क्षण के दौरान मुझे कोई फ़ैसला करना हो तो मेरी चेकलिस्ट में आप क्या देखना चाहेंगे?"

उन्होंने कहा कि रूम में अपनी मौजूदगी के कुल समय का 50 फ़ीसदी समय ही मुझे बात करनी चाहिए. इस तरह मैंने सोचा अगली बार मैं जब जाऊंगा तो इसका ख़्याल रखूँगा और मैंने पाया की अपनी उपस्थिति का 90 फीसदी हिस्सा मैं बात करने में खर्च करता था. मेरे पास बहुत सारे तथ्य थे, आंकड़े थे और ये नहीं करना वो नहीं करना और फिर मैं पूछता था - अब बताएँ मैं क्या करूं? और मैं देखता था कि मेरे सामने बैठा व्यक्ति पूरी तरह बौखलाया हुआ था.

कम बोलने का नुस्खा

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उन्होंने यह भी कहा की अगर आप कम बोलेंगे तो प्रश्न पूछने के लिए आपके पास समय होगा. और मैंने देखा कि ऐसे कई प्रश्न थे जो लोग पूछ रहे थे जिनसे लोगों की प्राथमिकताओं का पता चल रहा था.

ऐसे कुछ सवाल थे, “आपकी बीमारी किस हालत में है और क्या आपको इस बारे में जानकारी है? भविष्य की किस बात को लेकर आप डरे हुए हैं और किस बात की चिंता है? अगर आपके पास समय कम है तो जीवन में आपके लक्ष्य क्या हैं? किस तरह के नतीजे आपको स्वीकार्य नहीं होंगे?

और ये प्रश्न ऐसे हैं जिनसे उनकी प्राथमिकताएँ, उनकी इच्छाएं और उनको क्या अच्छा लगता है, इस बारे में हम जान पाते हैं. ये हमें बताता है कि निराशाओं के बीच आशाओं की चमकती किरण कहाँ है जिसे पाना हमारा लक्ष्य हो सकता है.

जवाब बदला

अब हर व्यक्ति इस तरह के प्रश्न का उत्तर नहीं दे सकता और समय के साथ उनका उत्तर भी बदलेगा इसलिए हमें स्थितियों के अनुरूप अपने प्रश्न पूछने चाहिए.

मैंने पेग से भी ये प्रश्न पूछे. मैंने उससे पूछा कि उसको क्या लगता है कि उसकी बीमारी किस स्टेज में है और उसने सीधे जवाब दिया “मैं मरने जा रही हूँ”.

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बाद में उनके पति मार्टिन ने मुझे कहा कि उन्होंने पहली बार पेग को इस तरह से यह कहते हुए सुना. पेग ने आगे कहा, “डॉक्टर कुछ नहीं कर सकते”, और उन्होंने यह बात गुस्से में कही थी.

तब मैंने उनसे पूछा, “अब जब तुम्हारा समय कम होता जा रहा है, तुम्हारे लक्ष्य क्या हैं?" और उन्होंने कहा, “मैं नहीं जानती. मेरा कोई लक्ष्य नहीं है. मैं नहीं जानती कि क्या संभव है.

मैंने उनसे ये पूछा, "भविष्य के लिए किस बात का डर है, तुम्हारी चिंताएँ क्या हैं?" और तब उसने प्रार्थना की. उसने कहा कि उसको ज़्यादा दर्द का सामना करने से डर लगता है. वह पहले ही अपने बिस्तर तक सीमित हो गई थी और और उसे डर था मामला और बिगड़ रहा है.

वह अपने शरीर पर अपना नियंत्रण खोने के अपमान से डरी हुई थी. वह अस्पताल में अंतिम सांसें लेने से डरती थी. उसने कहा कि वह इतने दिनों से अस्पताल में है और उसकी हालत बिगड़ ही रही है और उसे नहीं लगता कि स्थिति बदल सकती है.

उसके जैसी स्थिति में अगर किसी को गरिमामय मौत का विकल्प दिया जाए, 'एसिस्टिड डेथ' यानी मृत्यु की ओर बढ़ने में मदद की जाए, तो हो सकता है कि वो बिना किसी अन्य विकल्प के इसे चुन लें.

जब कोई असहनीय पीड़ा सह रहा हो और उसे टालना मुमकिन न हो, तो मेरे विचार में ऐसे व्यक्ति को ये विकल्प न देना बेरहमी है.

विकल्प

हालांकि मैंने पेग से इस मुद्दे पर बात नहीं की. मैंने उन्हें दूसरा विकल्प सुझाया. वह था कि वे घर वापस चली जाएँ और हॉस्पाइस केयर यानी दर्द घटाने के साथ-साथ भावनात्मक और आध्यात्मिक ज़रूरतों को पूरा करने वाली देखरेख में रहें.

और मैंने हॉस्पाइस में काम करने वाली नर्सों और व अन्य लोगों का काम देखा था.

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ख़ुद देखने से पहले हॉस्पाइस के बारे में मेरे ख़्याल अलग थे. जब नर्सों से बात की तो उन्होंने मुझे अपने काम के बारे में बताया. उनका मानना था कि ऐसी स्थिति में कुछ और दिनों की ज़िंदगी पाने के चक्कर में चिकित्सा से आपका बचा हुआ समय बर्बाद होता है, जीवन की गुणवत्ता समाप्त होती है.

जैसे-जैसे ये समय समाप्त होता जाता है, गुणवत्तापूर्ण जीवन पाने की लागत बढ़ती जाती है, और हमें रास्ता बदलना चाहिए.

हॉस्पाइस का चयन करने वाले वाले लोग दूसरे लोगों की तुलना में छोटा जीवन नहीं जीते. कई बार तो वो उनसे ज़्यादा समय जीवित रहते हैं. जब आप इस बात पर अधिक ध्यान केंद्रित करते हैं कि सार्थक जीवन के लिए आपको क्या चाहिए और आप उसको बचाकर चलते हैं तो यह आपको बल देता है.

अब मैं पेग की ओर मुखातिब हुआ और कहा, “क्यों नहीं हम इसको अपना लक्ष्य बनाएँ? क्यों न हम यह लक्ष्य बनाएं कि हम हिम्मत नहीं हारेंगे, पर हमारा उद्देश्य तुम्हारे बचे हुए दिनों को तुम्हारे हिसाब से बेहतर बनाना है."

मैंने कहा, "मुझे लगता है कि अच्छे दिन बिताए तुम्हें काफ़ी समय हो गया है?” और उन्होंने कहा, “हाँ-हाँ, ऐसा ही है. काफ़ी दिन हो गए हैं.” तो मैंने कहा, “तो क्या एक अच्छे दिन के लिए प्रयास करना उचित होगा?" और 48 घंटे बाद मार्टिन उन्हें यह समझाने में सफल रहे कि अस्पताल से लौटना सबसे उचित विकल्प होगा.

भावुक पल

मुझे यह ख़बर अपनी बेटी हंटर को देनी थी. मुझे उसे बताना था की पेग उसे अब पियानो नहीं सिखा पाएंगी और मैंने उसे सच-सच बता दिया. हंटर को बड़ा सदमा लगा. उसने पूछा कि क्या वह पेग से मिल सकती है और मैंने कहा कि मुझे नहीं लगता कि यह संभव है.

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जब एक-दो दिन के बाद पेग ने खुद ही फ़ोन किया और कहा कि अगर मैं और मेरी पत्नी राजी हों तो वो हंटर को दोबारा पढ़ाना शुरू करना चाहती हैं, मुझे विश्वास नहीं हुआ. पेग ने कहा कि उन्हें नहीं पता कि कितने दिन तक वह उसे पढ़ा पाएँगी, पर वह पढ़ाना चाहती हैं. और यह ऐसी बात थी जिसकी उम्मीद न तो मुझे थी और न उनको.

हॉस्पाइस की नर्स पेग के घर लौटने के पहले दिन घर पर आई और उनसे पूछा कि ज़िंदगी में उनके लिए क्या सबसे महत्वपूर्ण है. फिर उसने कहा, “मैं आपके लिए इसे संभव बनाऊँगी.” शुरुआत के कुछ दिनों तक तो उन्होंने पेग को होने वाली मुश्किलों और तकलीफ़ों पर फोकस किया. पेग के लिए अस्पताल से एक बेड लाया गया था जिसे घर के पहले माले पर रखा गया ताकि उन्हें सीढ़ियाँ न चढ़नी पड़ें.

उनके बेड के पास उन्होंने एक सचल कोमोड लगा दिया, उनके नहाने और साफ करने और ड्रेसिंग का प्लान बनाया था और उन्होंने दर्द रोकने के लिए उसे दी जाने वाली दवा में थोड़ा बहुत बदलाव किया. उन्होंने दर्द की दवा की खुराक काफ़ी बढ़ा दी, वह जितना ले रही थीं उससे काफ़ी अधिक.

आखिरी क्षण

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दवाओं से उनका दर्द नियंत्रण में आ गया. उन्होंने उसमें मिथाइलफिनिडेट मिला दिया जो दर्द की दवा के कारण होने वाली बेहोशी को समाप्त करता है. मार्टिन ने बाद में मुझे बताया, “अपने बचे हुए दिन वह कैसे बिताना चाहती हैं इस बारे में वे स्पष्ट हैं. वे घर पर रहेंगी और अब वह पढ़ाएँगी.”

स्पष्ट है कि प्लानिंग और मेडिकल विशेषज्ञता के कारण ही यह सब संभव हो पाया. यह जानना ज़रूरी था की उनको मोरफ़ीन की कितनी डोज़ दी जाए कि वह पियानो सिखा सकें और ऐसा न हो कि वह सिखाते हुए ऊँघे या उनकी आवाज़ स्पष्ट न हो. मार्टिन ने कहा कि काफ़ी दिनों में पहली बार उन्होंने पेग को अपनी क्लास को पढ़ाने के लिए इतना उत्साहित देखा."

उनके अपने बच्चे नहीं थे. उनके छात्रों ने उनकी यह कमी पूरी कर दी थी. वह अब भी जीते जी अपने छात्रों को कुछ महत्वपूर्ण बातें सिखाना चाहती थीं. वह उन्हें अलविदा कहना चाहती थीं और जाते-जाते कुछ अच्छी सलाह देना चाहती थीं. मुझे लगता है कि चिकित्सा क्षेत्र में हम इस बात को भूल चुके हैं कि जीवन के अंतिम दिनों में ये बातें कितनी महत्वपूर्ण हो जाती हैं.

लोग अपनी यादें साझा करना चाहते हैं, कुछ अक्लमंदी की बातें बताना चाहते हैं, अपने प्रियजनों के साथ जुड़ना चाहते हैं और दुनिया में अपना अंतिम योगदान देना चाहते हैं. और कुछ लोग कहते हैं कि यह भूमिका जीवन की सबसे महत्वपूर्ण भूमिकाओं में से है. इस तरह वे अपने जीवन की कहानी को एक दिशा देते हैं.

जीवन सार्थक

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इन चीज़ों से आप अपने जीवन को सार्थक बनाते हैं. चिकित्सा क्षेत्र में हम इन लोगों को उनके इन अंतिम क्षणों से अलग कर देते हैं और उनको आईसीयू में निर्लज्ज होकर अनजान लोगों के हाथों में सौंप देते हैं.

हालाँकि पेग को अपनी अंतिम भूमिका निभाने का मौका मिला. वह पूरे छह सप्ताह तक जीवित रहीं और मेरी बेटी इनमें से चार सप्ताह तक उनसे पियानो सीखती रही. उसने दो अंतिम कंसर्ट किए. इनमें से एक एलिमेंट्री स्कूल के उन बच्चों का रिसाइटल था जिनको वह सिखा रही थीं और दूसरा उन बच्चों के साथ था जिनको उन्होंने पहले सिखाया था.

वे सब देशभर से इसमें शामिल होने के लिए आए थे - ये सब के सब अब परफॉर्मर बन चुके थे और उन्होंने पेग के लिए संगीत बजाया भी. प्रत्येक कंसर्ट के लिए वे उनके लिविंग रूम में जमा हुए, उन्होंने ब्राह्म्स, वोराक, शॉपेन और बीथोवेन का संगीत बजाया.

अंतिम कंसर्ट के एक सप्ताह बाद वह बेहोशी में चली गईं और इसके कुछ दिनों बाद वह शांतिपूर्वक मौत की नींद सो गईं.

'तुम स्पेशल हो'

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पेग के बारे में मेरी याद बच्चों की रिसाइटल के अंतिम क्षणों की है. बच्चों के संगीत बजाने के बाद भीड़ से अलग जाकर वह खड़ी हुईं और इनमें से प्रत्येक बच्चे को अपने पास बुलाया ताकि वह इनमें से प्रत्येक को गिफ़्ट दे सकें और उन्हें कुछ निजी बातें कह सकें.

मैंने उसे तब देखा जब अपनी बारी आने पर हंटर उसके पास गई. पेग ने उसे म्यूज़िक की एक किताब भेंट की और कहा कि वह उसे सीखे. और उसके बाद उसने उसे एक अंतिम गिफ़्ट दिया. उसने हंटर को अपनी बाहों में लेकर उसके कान में कहा, “तुम स्पेशल हो”. और वह ऐसा क्षण था जिसे वह चाहती थी कि कोई बच्चा नहीं भूले.

पिछले 50 साल से हम मोर्टेलिटी (नश्वरता) के साथ चिकित्सकीय प्रयोग कर रहे हैं और इसे किसी अन्य समस्या की ही तरह देख रहे हैं. मुझे लग रहा है कि अब यह प्रयोग फ़ेल हो रहा है. पर एक विकल्प उभर रहा है.

यह विकल्प है वह सीखने और जानने का जो लोगों के जीवन में सिर्फ जीने से ज्यादा अहमियत रखता है. और तब हम अपनी क्षमताओं का प्रयोग उसकी बलि चढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि उनकी प्राथमिकताओं को बचाने के लिए करें. और मैं समझता हूँ कि यही हमें मिला हुआ सबसे बड़ा अवसर है.

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