जलवायु परिवर्तन पर दुनिया कितनी गंभीर?

जलवायु परिवर्तन

जलवायु परिवर्तन की काली छाया हमें दिन-ब-दिन लंबी होती दिखाई दे रही है. दुनिया के हर मंच पर यह अब बहस और चर्चा का अहम मुद्दा है.

कई विरोधी भी इस मुद्दे पर एक साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं. बात कार्बन उत्सर्जन को कम करने की है. बात जंगलों को बचाने की है, बात पिघलते ग्लेशियरों, सूखती नदियों, बढ़ते समुद्री स्तर, बिगड़ते मौसम और चढ़ते तापमान की है.

अमरीका से लेकर चीन और अब भारत भी इस दिशा कोशिश करने का वादा कर रहे हैं. बाकी दुनिया भी सुर में सुर मिला रही है.

कोपनहेगन में इस पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन हो रहा है जहाँ विश्व स्तर पर कोई कारगर सहमति बनाने की कोशिश की जानी है. लेकिन रोज़मर्रा की ज़िंदगी में संसाधन बढ़ते ही जा रहे हैं. शहरों, उद्योगों का विस्तार रुक नहीं रहा. नई गाड़ियां हज़ारों-लाखों की तादाद में प्रतिदिन सड़कों पर आ रही हैं. जंगल सिमट रहे हैं.

चिंता दिखती तो है पर अमल में आती नहीं, बातों में जगह खोजती हुई.

लगता है कि बात तो सब कह रहे हैं, पर क्या वाकई कोई कुछ कर भी रहा है, या करेगा भी. क्या हम खुद या हमारी सरकार या दुनिया के बाकी देश, विश्व समुदाय इसपर वाकई गंभीर हैं.

तो इस बार बीबीसी इंडिया बोल में बहस इसी विषय पर. विषय है कि क्या जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर भारत या बाकी दुनिया वाकई गंभीर है...?

ऑनलाइन पर यह बहस अब आपके बीच है. आप hindi.letters@bbc.co.uk पर अपने संदेश भेज सकते हैं. भारत से बाहर के लोग इस कार्यक्रम में शामिल होना चाहते हैं, तो हमें इसी पते यानी hindi.letters@bbc.co.uk पर संपर्क करें.

अगली कड़ी में यानी आठ दिसंबर, मंगलवार, भारतीय समयानुसार रात आठ बजे हम आपके बीच फिर होंगे रेडियो की इस विशेष प्रस्तुति के साथ.

रेडियो कार्यक्रम में शामिल होने के लिए टोल फ्री नंबर 1800-11-7000 पर फोन करके कार्यक्रम में लाइव शामिल हों.

आप टोल फ्री पर पहले से भी अपना संदेश रिकॉर्ड करा सकते हैं. इन्हें कार्यक्रम में शामिल किया जाएगा. ऑनलाइन की प्रतिक्रियाएं भी होंगी रेडियो कार्यक्रम का हिस्सा.

तो इंतज़ार किस बात का. बोल, बीबीसी इंडिया बोल.

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