'कला-खेल के रिश्ते टूटे तो बढ़ेगी खटास'

  • 8 अक्तूबर 2016
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भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव का असर दोनों देशों के सांस्कृतिक संबंधों पर भी हुआ है.

अब पाकिस्तान से आवाज़ें उठ रही हैं कि फ़िल्मों और खेल-संबंधों को राजनीतिक और सैन्य गतिरोधों से दूर रखा जाना चाहिए.

पाकिस्तान के कई मीडिया समूहों का मानना है कि मनोरंजन और खेल के रिश्ते तोड़ने से खटास और अधिक बढ़ेगी.

पाकिस्तान के नरमपंथी लोग लगातार मांग कर रहे हैं कि सांस्कृतिक संबंधों पर छाए तनाव को कम किया जाना चाहिए.

पाकिस्तान टुडे अख़बार ने कहा है, "जब कभी भारत के साथ हमारे रिश्ते ख़राब होते हैं, पहला हादसा ये होता है कि दोनों देशों के बीच कला और संस्कृति के आदान- प्रदान पर प्रतिबंध लग जाता है. इसका पालन करना आसान है. नतीजा ये होता है कि इससे सीमा के दोनों तरफ के ऐसे अतिवादियों की जीत होती है जो हर वक्त युद्ध चाहते हैं... ऐसे में ये दोनों देशों के हित में होगा कि पूरे मुद्दे के शांतिपूर्ण समाधान के लिए वो सांस्कृतिक मोर्चे पर तनाव घटाएं और मुद्दों को सुलझाएं."

http://www.pakistantoday.com.pk/2016/10/01/comment/culture-war/Link

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उदारवादी अख़बार 'द एक्सप्रेस ट्रिब्यून' का कहना है कि समझदारी की बातों को बढ़ावा मिलना चाहिए.

अख़बार का कहना है, " ये (पाकिस्तान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया रेगुलेटरी अथॉरिटी का फ़ैसला) एक तरह से बदला लेने के संकेत की तरह है, अगर भारतीय सरकार और मीडिया ने पाकिस्तानी कलाकारों को कीचड़ में न खींचा होता और पाकिस्तान की सामग्री पर रोक नहीं लगाई होती तो इससे बचा जा सकता था. इससे और कुछ नहीं होगा बल्कि दोनों तरफ कटुता और बढ़ेगी. भारत की ओर से पाकिस्तान की सामग्री पर रोक लगाने जाने के जवाब में पाकिस्तान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया रेगुलेटरी अथॉरिटी का फ़ैसला एक तरह से सही है. भविष्य में दोनों देशों के लोगों को तनाव बढ़ने की स्थिति में ज्यादा संतुलित और प्रभावी तरीके से जवाब देने के बारे में सोचना चाहिए. "

http://tribune.com.pk/story/1194119/ban-indian-content/

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Image caption सीमा पर तनाव के बाद जम्मू के पलूरा गांव से सुरक्षित स्थानों पर जाते ग्रामीण.

रावलपिंडी के ब्लॉगर हारून रियाज़ बहिष्कार के ही बहिष्कार की बात करते हैं.

उन्होंने 'द नेशन' में लिखा है, "सीमा के आरपार निजी संस्थाओं की ओर से कला पर प्रतिबंध जनता की राय के प्रति उदासीनता जाहिर करता है. हम अच्छी तरह से जानते हैं कि वो सरकारी अधिकारियों और प्रचार के जरिए बनाई गई लोगों की राय के दबाव में हैं. दोनों तरफ के नियामक संस्थानों और फिल्म व्यापार से जुड़ी संस्थाओं ने सिर्फ ये दिखाया है कि वो दर्शकों का कितना सम्मान करती हैं."

http://nation.com.pk/blogs/05-Oct-2016/india-pakistan-conflict-boycott-the-boycott

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'द डेली टाइम्स' अख़बार की स्तंभकार मारिया सरताज कहती हैं, " उनके (फवाद खान) और भारत में काम कर रहे दूसरे लोगों की ओर से उड़ी हमले के पीड़ितों के परिजन के लिए मानवीय आधार पर तसल्ली के कुछ शब्द एक अच्छा संकेत होते लेकिन ऐसा नहीं हुआ. हालांकि एक कलाकार, खिलाड़ी और रचनाशील सामग्री पर प्रतिबंध बांह मरोड़ने की तरह है."

http://dailytimes.com.pk/opinion/06-Oct-16/the-pakistan-india-toxic-waste

इस बीच भारत के ज़ी समूह के 'ज़िंदगी' एंटरटेनमेंट चैनल ने इस हफ्ते से पाकिस्तान के टीवी सीरियल दिखाना बंद कर दिया है और 'खुद को बदल लिया' है. अब ये सिर्फ भारतीय और तुर्की की सामग्री दिखा रहा है.

साल 2014 में पाकिस्तान की लोकप्रिय सामग्री दिखाते हुए इस चैनल ने प्रसिद्धि हासिल की थी. इसने फवाद खान और माहिरा खान जैसे कलाकारों को भारत में घर-घर में लोकप्रिय बना दिया था.

कश्मीर के सर्जिकल स्ट्राइक के बाद पाकिस्तान के अहम सिनेमा घरों ने देश में भारतीय फिल्में दिखाने पर खुद ही पाबंदी लगाने का एलान कर दिया. ऐसा भारत की दक्षिणपंथी एमएनएस पार्टी की ओर से पाकिस्तानी कलाकारों के बॉलीवुड में काम करने पर पाबंदी लगाए जाने की मांग के बाद हुआ.

इसकी प्रतिक्रिया में पाकिस्तान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया रेगुलेटरी अथॉरिटी ने सरकार से लोकल केबल टीवी नेटवर्क पर भारतीय सामग्री पर रोक लगाने को कहा. अथॉरिटी 15 अक्टूबर से अवैध भारतीय डीटीएच के खिलाफ भी कार्रवाई शुरु करेगी.

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राजनीतिक तनाव की छाया खेल संबंधों पर भी नज़र आती है. भारतीय क्रिकेट बोर्ड ने पड़ोसी देश के साथ दोतरफा सिरीज़ की संभावना को खारिज कर दिया है.

भारत में खेले जा रहे कब्बड़ी वर्ल्ड कप से पाकिस्तान को अलग रखा गया है.

सरकार के साथ 'एकजुटता' दिखाने के लिए बैडमिंटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने इस महीने इस्लामाबाद में होने वाले आयोजन का बहिष्कार करने का फ़ैसला किया है.

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