‘तलाक़, तलाक़….....अब और नहीं’

  • 9 अक्तूबर 2016
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भारत-पाकिस्तान से छपने वाले उर्दू अख़बारों की बात की जाए तो भारत-पाकिस्तान नियंत्रण रेखा यानी एलओसी पर भारत के सर्जिकल स्ट्राइक के दावे और उसके बाद पैदा होने वाले हालात से जुड़ी ख़बरें हीं छाईं रहीं.

पहले बात करते हैं पाकिस्तान से छपने वाले उर्दू अख़बारों की.

रोज़नामा 'जंग' ने लिखा है कि पाकिस्तानी संसद ने मांग की है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश मामलों की देख रेख संसद की निगरानी में हो.

अख़बार लिखता है कि 22 बिंदुओं पर आधारित पॉलिसी गाइडलाइंस या प्रस्ताव को संसद ने सर्वसम्मति से पारित किया.

इस गाइडलाइंस में कहा गया है कि दुनिया को ये संदेश दिया जाना चाहिए कि पाकिस्तान में नॉन स्टेट एक्टर्स यानी कि ऐसे समूह जिन्हें राज्य का समर्थन हासिल नहीं है उनके लिए कोई जगह नहीं हैं.

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अख़बार के अनुसार इस गाइडलाइंस में ये भी कहा गया है कि 'पाकिस्तान सरकार को भारत में ऐसी पार्टियों, नागरिक समूहों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं से संपर्क करना चाहिए जो भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कथित अतिवादी विचारधारा के विरोधी हैं.'

अख़बार लिखता है कि गाइडलाइंस के अनुसार मोदी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिंदुत्व की विचारधारा को निशाना बनाया जाए.

रोज़नामा 'दुनिया' ने भी इसी गाइडलाइंस का ज़िक्र किया है. लेकिन उसने शीर्षक लगाया है, ''संसद में प्रस्ताव पारित: भारत कश्मीर में ज़ुल्म बंद करे''

अख़बार लिखता है कि प्रस्ताव में भारत के सर्जिकल स्ट्राइक के दावे को खुला झूठ क़रार दिया गया है.

इसी प्रस्ताव में ये बात भी कही गई है कि पाकिस्तान की क़ैद में रह रहे भारत के कथित जासूस कुलभूषण यादव के मामले को संयुक्त राष्ट्र और दूसरे अंतरराष्ट्रीय फ़ोरम पर उठाया जाना चाहिए.

रोज़नामा 'ख़बरें' ने सुर्ख़ी लगाई है, ''भारत को भरपूर जवाब देने के लिए योजना तैयार''.

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अख़बार पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता जनरल आसिम बाजवा के हवाले से लिखता है कि एलओसी पर भारत की कार्रवाई बढ़ती जा रही है लेकिन अब पाकिस्तान ने भी भारत को भरपूर जवाब देने के लिए पूरी तैयारी कर ली है.

जनरल बाजवा ने भारत पर आरोप लगाते हुए कहा कि भारत की ओर से आने वाले बयानात से दोनों देशों के बीच जारी तनाव में और इज़ाफ़ा होता है.

'नवा-ए-वक़्त' भी संसद में पारित प्रस्ताव के हवाले से लिखता है कि 'पाकिस्तान सरकार कश्मीर में भारत की कथित ज़्यादतियों को रोकने के लिए हर संभव प्रयास करे'.

नवा-ए-वक़्त ने संपादकीय लिखा है, ''नॉन स्टेट एक्टर्स के ख़िलाफ़ कार्रवाई न करना पाकिस्तान के अलग-थलग पड़ने की सबसे बड़ी वजह''

अख़बार लिखता है कि अंतरराष्ट्रीय जगत में पाकिस्तान को अलग-थलग करने के लिए भारत साज़िश रच रहा है.

अख़बार आगे लिखता है, ''संयुक्त राष्ट्र की बैठक में तो भारत कामयाब नहीं हो सका लेकिन पाकिस्तान में होने वाले सार्क सम्मेलन को स्थगित कराके वो दुनिया को हमारे अकेले होने का सुबूत देने में कामयाब नज़र आ रहा है''.

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अख़बार लिखता है कि दहशतगर्दी के ख़िलाफ़ जंग में हमें अपनी भूमिका की हर हालत में समीक्षा करनी होगी.

संपादकीय में आगे लिखा गया है, ''अगर भारत के अलावा दूसरे देश भी हमारे बारे में यही नज़रिया रखते हैं तो हमें चरमपंथी संगठनों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई करके उनके नज़रिए को बदलना होगा''.

अख़बार लिखता है, ''भारत तो हम पर हर तरह के बेबुनियाद इलज़ाम लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा लेकिन अगर दूसरे मुल्क भी हम पर चरमपंथी संगठनों को संरक्षण देने के आरोप लगा रहे हैं तो हमें उनकी इस चिंता को दूर करना होगा''.

रुख़ भारत का करें तो यहां से छपने वाले उर्दू अख़बारों में भी भारत-पाकिस्तान के बीच जारी तनाव की ख़बरें ही सुर्ख़ियों में रहीं.

राष्ट्रीय सहारा ने लिखा है ''सर्जिकल स्ट्राइक पर सियासी सर्जरी शुरु.''

'हिंदुस्तान एक्सप्रेस' ने दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के एक बयान को सुर्ख़ी बनाते हुए लिखा है, ''सर्जिकल स्ट्राइक पर सियासत का सिलसिला जारी.''

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अख़बार ने मनीष सिसोदिया के एक ट्वीट के हवाले से लिखा है कि 'सियासत के नाम पर काला धब्बा हैं बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह.'

सिसोदिया ने ट्वीट किया था कि 'अमित शाह का केजरीवाल का नाम लेने की भी हैसियत नहीं है.'

भारत-पाकिस्तान और सर्जिकल स्ट्राइक पर राजनीति के अलावा मुसलमानों के ट्रिपल तलाक़ का मामला भी सुर्ख़ियों में बना रहा.

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफ़नामा दायर कर कहा है कि वो एक साथ दिए जाने वाले तीन तलाक़ का समर्थन नहीं करती है.

रोज़नामा जदीद ख़बर लिखता है कि केंद्र सरकार ने ट्रिपल तलाक़ को महिलाओं का अपमान क़रार दिया है.

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वहीं राष्ट्रीय सहारा ने सुर्ख़ी लगाई है, 'तलाक़, तलाक़….....अब और नहीं.'

अख़बार लिखता है कि सुप्रीम कोर्ट में दायर हलफ़नामे में केंद्र सरकार ने साफ़ कर दिया है कि पर्सनल लॉ के आधार पर किसी को उसके संवैधानिक अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है.

हलफ़नामे में कहा गया है कि महिलाओं के सम्मान के साथ किसी तरह का समझौता नहीं किया जा सकता है.

इंक़लाब ने आरक्षण की मांग के लिए महाराष्ट्र में मुसलमानों की रैली को प्रमुखता से छापा है.

मालेगांव और मुंबई के मुंब्रा में मुसलमानों ने शुक्रवार को एक बड़ी रैली निकाली थी.

उसका ज़िक्र करते हुए अख़बार लिखता है, ''गुजरात में पटेल आंदोलन और महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण आंदोलन के बाद अब मुसलमान भी अपने अधिकारों के लिए सक्रिय हो गए हैं''.

अख़बार लिखता है कि मुसलमान ये संदेश देना चाहते हैं कि वो अपने अधिकारों को लेकर न केवल सजग हैं बल्कि उन्हें हासिल करने के लिए हर संवैधानिक तरीक़ा अपनाने के लिए भी तैयार हैं.

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