पाकिस्तान: पत्रकार कब-कब बने निशाना

  • 12 अक्तूबर 2016
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दुनिया भर में हुकूमतों ने उन पत्रकारों को दबाने और धमकाने की कोशिश की है जिनकी क़लम ने राज्य की नीतियों की आलोचना की है.

पाकिस्तान के इतिहास में भी ऐसे कई वाक़्यात हुए हैं. सबसे ताज़ा घटना में सरकार ने डॉन अख़बार के पत्रकार सिरिल अलमेडा के देश से बाहर जाने पर रोक लगा दी है.

अलमेडा ने ट्वीट करके कहा, "मुझसे कहा गया है और सूचित किया गया है और मुझे प्रमाण दिखाए गए हैं कि मैं एक्ज़िट कंट्रोल लिस्ट में हूं."

एक्ज़िट कंट्रोल लिस्ट एक अध्यादेश के ऐसी व्यवस्था है, जिसमें लिस्ट में शामिल लोगों को देश से बाहर जाने से रोका जा सकता है.

जानकार बताते हैं कि पाकिस्तान में हुकूमतों ने इस तरह के कई क़दम उठाए हैं जो सेंसरशिप की श्रेणी में आते हैं:

Image caption डॉ मलीहा लोधी

वर्ष 1992 में डॉ मलीहा लोधी द न्यूज़ अख़बार की संपादक थीं.

एक व्यंग्यगात्मक कविता के प्रकाशन के बाद अख़बार पर मुक़दमा दर्ज किया गया. कविता में में प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की हँसी उड़ाई गई थी.

पत्रकारों और मानवधिकार संस्थाओं के विरोध के बाद मलीहा लोधी पर से शांति भंग का मुक़दमा दर्ज वापिस ले लिया गया.

मलीहा लोधी फ़िलहाल संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान की स्थायी राजदूत हैं.

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Image caption नजम सेठी

मई 1999 में नवाज़ शरीफ़ के ही शासनकाल में ही संपादक नजम सेठी को गिरफ्तार करके उनके खिलाफ शांति भंग क़ानून लगाया गया था.

एक महीने तक हिरासत में रहने के बाद पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने उनके ख़िलाफ़ मामलों को निराधार बताते हुए उन्हें रिहा कर दिया था.

सन् 2014 में जब जियो न्यूज के पत्रकार हामिद मीर पर जानलेवा हमला हुआ तो जियो टीवी चैनल ने आईएसआई प्रमुख को दोषी ठहराया था.

इस समय भी आरोप लगाने को राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा मानते हुए हामिद मीर के भाई आमिर मीर और जियो न्यूज़ पर भी मुक़दमा करने का आदेश दिया गया था.

Image caption हामिद मीर पर हुए हमले के बाद पत्रकारों और नागरिक समाज का विरोध

पाकिस्तान में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की नियामक संस्था पेमरा ने जियो का लाइसेंस 15 दिन के लिए रद्द कर दिया और चैनल पर एक करोड़ का जुर्माना भी लगाया.

इनके अलावा और भी कई ऐसे विदेशी पत्रकार भी हैं जिनकी पत्रकारिता ने समय-समय पर पाकिस्तान को 'ख़तरे' में डाल दिया. पाकिस्तानी पत्रकारों को तो शांति भंग या तख्तापलट के मामलों से डर दिलाया जाता है मगर विदेशी पत्रकारों को ऐसी स्थिति में निर्वासित कर दिया जाता है.

वर्ष 2001 में ब्रिटिश पत्रकार क्रिस्टीना लैम्ब को पाकिस्तान से निकाल दिया गया.

लैम्ब के अनुसार, 'उनके पास कुछ ऐसी जानकारी थी कि पाकिस्तानी सेना के कुछ अधिकारी तालिबान कमांडरों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं और इसीलिए उन्हें निकाला गया.'

वर्ष 2003 में दो फ्रांसीसी पत्रकारों मार्क और जॉन और उनकी मदद करने वाले ख़ावर महदी रिज़वी को कराची में गिरफ्तार कर लिया गया. अधिकारियों का कहना था कि दोनों फ्रेंच पत्रकार बिना अनुमति के बलूचिस्तान गए थे.

अतीत में एक विदेशी पत्रकार को निर्वासित किए जाने की सबसे प्रसिद्ध घटना शायद न्यूयॉर्क टाइम्स के ब्यूरो चीफ़ डीकलन वॉल्श को निकाले जाने की थी.

मई 2013 में गृह मंत्रालय के अधिकारी डिकलन वॉल्श के घर देर रात आए और उन्हें एक पत्र दिया जिसमें कहा गया था कि 'अप्रिय' कार्यों के मद्देनजर उनका पाकिस्तान का वीज़ा रद्द कर दिया गया है.

डिकलन वॉल्श को उसी रात पुलिस के पहरे में एयरपोर्ट जाना पड़ा.

2014 में पाकिस्तान सरकार ने भारतीय अखबार 'द हिंदू' की संवाददाता मीना मेमन और 'प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया के प्रतिनिधि सनीश फिलिप्स को पाकितान से बाहर कर दिया.

दोनों का कहना था कि उन्हें यह नहीं बताया गया कि इस क़दम की वजह क्या थी.

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