कोई रोल मॉडल है पाकिस्तान में

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रोल मॉडल वह लंगर है जो किसी भी संगठन, राष्ट्र या देश को थामे रहता है. जीवन में नाकामियों को चीरते हुए कामयाबी के उजाले तक ले जाने के लिए नई पीढ़ी को बिना थके ताक़त और साहस देता है.

क्या आज पाकिस्तान में कोई इंसान, संस्था या संगठन को रोल मॉडल की परिभाषा पर खरा उतरता है?

आपके संबंध किसी भी वर्ग से हों, जरा अपनी और आसपास वालों की रोज़मर्रा की बातचीत पर महज़ पांच मिनट ग़ौर कर के देखें. 90 फ़ीसद बातचीत अतीत की धुरी पर घूम रही है...

हमारे दादा, अल्लाह बख़्शे कभी अकेले खाना नहीं खाते थे.

हमारे पिता ने कभी ज़रूरत से एक पैसा भी ज़्यादा अपने पास नहीं रखा.

जिन्ना साहब जल्दी मर गए वरना ये हालत नहीं होती.

अय्यूब सैनिक थे मगर तरक्की की बुनियाद भी उन्होंने ही रखी.

भुट्टो साहब फांसी चढ़ गए, मगर किसी तानाशाह से दया नहीं मांगी.

बेनज़ीर को पता था कि मौत उनके पीछे है, फिर भी पाकिस्तान आईं.

सन 65 की लड़ाई में पाकिस्तानी सेना के जवान सीने पर बम बांध के टैंकों के सामने लेट गए.

क्या पीआईए था. बाकमाल लोग और लाजवाब उड़ान. सुभान अल्लाह.

और जब यह पूछा जाए कि कोई जीवित रोल मॉडल भी है तो आमतौर पर इस तरह के जवाब मिलते हैं...

अजी छोड़िए, कितने अरमानों से मुल्क बनाया था. क्या हालत कर दी 70 बरसों में.

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नवाज़ शरीफ़ तो ऐसा दिखावा कर रहे हैं जैसे पनामा गेट हुआ ही नहीं. इस भोली सूरत के पीछे एक महाबली बैठा है, जिसके सिवाय जिल्ले इलाही का इक़बाल बुलंद रहे. कुछ भी सुनाई नहीं देता. भाई जितनी ऊंची दुकान उतने फ़ीके पकवान.

और इमरान खान?...शुरू में कुछ उम्मीदें थीं, लेकिन अब तो लगता है कि उसका विज़न भी गैंडे जैसा है. इधर उधर देखे बिना, खुरों से चिंगारी निकालते हुए नाक की सीध में भाग पड़ना. सामने भले दीवार ही क्यों न हो. ख़ान साहब को कोई कान में कह दे कि आपका कान कौआ ले गया, तो वो कान देखे बिना कौए के पीछे दौड़ पड़ते हैं. वैसे बहुत अच्छे इंसान हैं.

और बिलावल?... अरे साहब क्या बताएं. यह बच्चा तो नाना और अम्मा की राजनीतिक दुकान पर बैठा है. इस ठेले को तो पिता और बुआ खींचे फिर रहे हैं. भुट्टो के नाम पर बाबा, जो दे उसका भी भला, न दे उसका भी भला. कोई नया आइडिया नहीं, नारा नहीं, एजेंडा नहीं. बस गप्पें लगवा लो और वह भी किसी और की रटाई हुई.

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और सेना? सेना हालांकि इस देश का एकमात्र संगठित राजनीतिक दल है. मगर रोल मॉडल को यह शोभा नहीं देता कि उसका नाम डिफेंस हाउसिंग अथॉरिटी, ज़बरन ग़ुमशुदगियों और कठपुतली तमाशे की डोरियां हिलाने वालों से जुड़ जाए. सारा ध्यान अगर प्रोफ़ेशनलिज़्म पर ही हो तो बहुत अच्छा रोल मॉडल है. हर कुछ साल बाद इसलिए भी अच्छी लगने लगती है कि बाक़ी संस्थान तो बिल्कुल चौपट हैं.

हां न्यायपालिका भी बहुत अच्छा रोल मॉडल बन सकती थी. इफ़्तिख़ार चौधरी को मौक़ा भी मिला लेकिन उन्होंने ज़्यादातर ताक़त मीडिया का दूल्हा बने रहने और दो कॉलमों, आठ कॉलमों के चक्कर में बर्बाद कर दिया. आम इंसान आज भी इंसाफ़ के लिए पहले की तरह जूतियां घिस रहा है.

तो फिर जीवित रोल मॉडल कहाँ खोजा जाए? क्या आप अपने बच्चों के लिए रोल मॉडल हैं?

यदि नहीं, तो बुकराती बंद कीजिए और ख़ुद आदर्श बनने की कोशिश कीजिए. आपके होते आपके बच्चों को किसी रोल मॉडल की ओर देखने की ज़रूरत ही क्यों आए?

रोल मॉडल आपके आस पड़ोस में ही कहीं न कहीं मौजूद है. इसे नवाज़ शरीफ़, राहील शरीफ़, सुप्रीम कोर्ट या इमरान ख़ान में मत ढ़ंढिए.

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और यह महज़ आपकी ही समस्या नहीं. इसकी तलाश हर तरफ है. भारत में 56 इंच का सीना तो मौजूद है, लेकिन रोल मॉडल कहां है?

अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प के राजनीति में कूदने की वजह से यह सवाल और तेज़ी से चर्चा में है कि रोल मॉडल जाए भाड़ में. यहाँ तो बुनियादी शराफ़त के भी लाले पड़े हैं.

और जब ये सारे संस्थान और व्यक्तित्व दबंग अंदाज में दिल लुभावनी मुस्कान सजाए, बार बार ठगी जनता का दिल जीतने के लिए ख़ुद को बतौर रोल मॉडल पेश करने की कोशिश करते हैं तो जनता भी उसके बगल में क्या सोचे? थप्पड़ से नहीं, प्यार से डर लगता है साहब…

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