ब्रिटेन में 'शरिया कोर्ट' को लेकर बढ़ा विवाद
- मार्टिन बशीर
- धार्मिक मामलों के संवाददाता

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ब्रिटेन में शरिया पंचाट की जांच कर रही दो समितियों के ख़िलाफ़ सौ से ज़्यादा महिलाओं ने शिकायत की है.
पहली जांच समिति का गठन टेरीज़ा मे ने उस समय किया, जब वे गृह मंत्री थीं. दूसरी का गठन संसद के गृह मंत्रालय की प्रवर समिति ने की थी. टेरीज़ा मे फ़िलहाल ब्रिटेन की प्रधानमंत्री है.
कुछ महिलाओं ने एक खुले पत्र पर दस्तख़त किए हैं. इस चिट्ठी में कहा गया है कि जांच का मक़सद पंचाट में सुधार करना नहीं, इस पर प्रतिबंध लगाना है.
द मुस्लिम वीमन्स नेटवर्क यूके के मुताबिक़, इसकी आशंका है कि जांच समिति महिलाओं का इस्तेमाल "राजनीतिक फ़ुटबॉल" की तरह करें.
नेटवर्क की अध्यक्ष शाइस्ता गोहिर का मानना है कि जांच समितियां महिलाओं के हितों की रक्षा कर सकती हैं.
उन्होंने कहा, "मुस्लिम महिलाओं के भयावह अनुभवों को सुनना तो हर कोई चाहता है, पर जब उसके समाधान की बात आती है, हर कोई समझता है कि उस मामले को सबसे बेहतर वही समझता है."
शाइस्ता गोहिर का मानना है कि कुछ लोग शरिया परिषदों को ख़त्म कर देना चाहते है्ं
उन्होंने कहा, "मुझे ऐसा लगता है कि कुछ लोग धर्म विरोधी, ख़ास कर इस्लाम विरोधी हैं. वे महिलाओं के बहाने शरिया परिषद को ख़त्म कर देन चाहते हैं."
उन्होंने आगे कहा, "यदि कल या अगले साल शरिया परिषद बंद कर दिए जाएं तो मुस्लिम महिलाएं ऐसी शादियों से बाहर नहीं निकल पाएंगी, जिनमें उनके साथ दुर्व्यवहार होता है. ऐसे में शरिया से होने वाले तलाक़ गुपचुप तरीके से होने लगेंगे."
गोहिर के मुताबिक़, इससे पारदर्शिता कम हो जाएगी, तलाक़ ख़र्चीला हो जाएगा और भेद भाव बढ़ जाएगा.
शरिया परिषद वह पंचाट है, जहां अमूमन मुस्लिम समुदाय के विवादों का निपटारा किया जाता है.
वे हर मामले का निपटारा इस्लामी क़ानूनों से ही करना चाहते हैं. वित्तीय लेनदेन से लेकर शादी-ब्याह से जुड़े मामलों तक में शरिया के नियम ही लागू करने की कशिश की जाती है.
लेकिन, इन पंचाटों पर किसी का कोई नियंत्रण नहीं है और आम लोग इसके बारे में मोटे तौर पर नहीं जानते हैं.
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पूरे ब्रिटेन में शरिया परिषदों की निश्चित तादाद कोई नहीं जानता, हालांकि रीडिंग विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं का मानना है कि ऐसे पंचाटों की तादाद 30 है.
शरिया परिषदों की लंबे समय से आलोचक रही लेडी कॉक्स का कहना है कि यह प्रणाली महिलाओं के लिए काफ़ी "तक़लीफ़देह" है. उन्होंने इन परिषदों में सुधार के लिए संसद में विधेयक पारित करवाने कई कोशिशें की हैं.
उन्होंने बीबीसी से कहा, "मेरे पास कितनी सारी महिलाएं आई हैं और कहा है कि वे किस तरह परेशान हैं. मेरे पास एक औरत आई, शरिया परिषद के प्रावधानों की वजह से उसकी नौबत ख़ुदकुशी करने तक पंहुच गई थी."
उन्होंने आगे जोड़ा, "इसलिए, पूरी व्यवस्था और वह किस तरह काम करती है, हमें उस पर विचार करना चाहिए."
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लेडी कॉक्स ने इस बात को पूरी तरह ख़ारिज कर दिया कि आलोचक इस्लाम में महिलाओं की हालत के बहाने शरिया परिषद पर चोट करते हैं. उन्होंने इसे "निहायत ही बकवास" क़रार दिया.
उन्होंने कहा, "मेरा समर्थन करने वालों में ढेर सारी मुस्लिम महिलाएं हैं, जिनकी बात कोई नहीं सुनता. मैं जो कुछ कर रही हूं, उसे सबसे ज़बरदस्त समर्थन मुस्लिम महिलाओं से ही मिल रहा है."
लेबर सांसद और गृह मंत्रालय की समिति की सदस्य नाज़ शाह का मानना है कि शरिया परिषद कभी भी सिविल अदालतों की जगह नहीं ले सकता.
उन्होंने कहा, "मैं बिल्कुल मानती हूं कि भेदभाव होता है और मैं यह भी मानती हूं कि महिलाएं घाटे में रहती हैं."
वे आगे जोड़ती हैं, "भेदभाव होता है तो इसकी शिकार भी मोटे तौर पर महिलाएं ही होती हैं. हम इस मुद्दे पर सीधे मुस्लिम औरतों से बड़े पैमाने पर बातचीत करेंगे."
गृह मंत्रालय ने इस मुद्दे पर बीबीसी से बात करने से इनकार कर दिया.