अमरीका चुनावः मुसलमानों का कितना असर?

  • ब्रजेश उपाध्याय
  • बीबीसी संवाददाता, वॉशिंगटन
रिपबल्किन उम्मीदवार डोनल्ड ट्रंप

अमरीकी चुनाव में रिपबल्किन पार्टी की ओर से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार डोनल्ड ट्रंप ने अपनी रैलियों में मुसलमानों के अमरीका में घुसने पर रोक लगाने की बात कही और उन पर चरमपंथ को बढ़ावा देने का आरोप लगाया तो ये कोई नई बात नहीं है.

पेरिस हो या फ़्लोरिडा, पहले भी चरमपंथी हमले के बाद यहां इस तरह की बातें सुनाई देती थीं. मुसलमानों पर उंगलियां उठती थीं, लगता था जैसे सभी आंखें उन्हीं को देख रही हों.

इस बार फ़र्क ये था कि ट्रंप ने उस सोच को मुख्यधारा की सोच बना दी. जो बातें दबी ज़ुबान में कही जाती थीं वो खुलकर कही जाने लगी.

ट्रंप ने मुसलमानों पर पैनी नज़र रखने की बात की, बगैर वारंट मस्जिदों की तलाशी की बात की. उन्होंने एक ऐसे टेस्ट की बात की जिसके ज़रिए इस बात की जांच हो सके कि अमरीका में आने वाला मुसलमान कहीं शरिया क़ानून में यकीन तो नहीं रखता.

इस्लामिक स्टेट और दूसरे चरमपंथी गुटों से निपटने का एक ही तरीका उन्होंने सामने रखा और वो ये कि उन पर बमबारी की जाए और उन्हें मटियामेट कर दिया जाए.

और उनकी बढ़ती लोकप्रियता से साफ़ था कि उनके समर्थक इन बातों से सहमत थे.

ओहायो के यंग्सटाउन शहर में रहने वाले मार्क जिलेट से जब मैंने बंद पड़ी स्टील मिलों के बारे में पूछा तो बातों ही बातों में वो ट्रंप और मुसलमानों के बारे में बात करने लगे.

उनका कहना था कि ट्रंप ने वो बात कही है जो कहने की कोई हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था.

कहते हैं, "इस्लाम में तो कहा गया है कि दूसरे धर्म को मानने वालों के बीच रहकर उन्हें अपने मज़हब की तरफ़ लाओ और न मानें तो डराओ, धमकाओ और फिर भी न मानें तो मार डालो."

मैने पूछा आपको ये बातें कहां से पता चलीं? उन्होंने बताया कि उनकी दूसरी शादी एक मुसलमान महिला से हुई है. उन्हें क़ुरान की पूरी जानकारी है और उसी में ये बातें लिखी हुई हैं.

मार्क जिलेट ने ये भी बताया कि उनकी पत्नी अब अपना धर्म परिवर्तन कर चुकी हैं. उनके अनुसार ट्रंप अगर मुसलमानों पर रोक लगा देंगे तो आतंकवाद खुद ही खत्म हो जाएगा.

इस तरह की बातें मुझे और भी कई जगहों पर सुनने को मिलीं और ये सब ट्रंप के कट्टर समर्थक हैं.

लेकिन दूसरी तरफ़ ट्रंप की इन बातों ने पहली बार अमरीका में रहनेवाले मुसलमानों को भी मुख्यधारा में शामिल होने पर मजबूर किया है.

मंसूर कुरेशी वर्जीनिया में रहते हैं और उन्होंने "साउथ एशियंस फ़ॉर हिलेरी क्लिंटन" के नाम से एक मुहिम की शुरूआत की है.

उनका कहना है लगभग 33 लाख मुसलमान अमरीका में रहते तो हैं लेकिन वो मेनस्ट्रीम या मुख्यधारा का हिस्सा नहीं बनते और बहुत कम हैं जो वोट डालने निकलते हैं.

कहते हैं, "हमने वीडियो और टेलीफ़ोन कैंपेन के ज़रिए उन्हें उनके वोट की अहमियत बताने की कोशिश की है."

लेकिन क्या मुसलमानों के वोट इतने हैं कि वो सही मायने में चुनाव के नतीजे पर कोई असर डाल सकें?

कुरेशी कहते हैं कि मुसलमान कुल आबादी के दो फ़ीसदी हैं और इस बार के चुनावों में ये वोट जीत और हार का फ़ैसला कर सकते हैं.

स्विंग स्टेट कहे जानेवाले कई राज्यों में इस्लामिक सेंटर्स और मस्जिदों ने मुसलमानों को एकजुट किया है और अमरीकी मुसलमानों के लिए काम करने वाली एक संस्था के अनुसार 86 प्रतिशत मुसलमान इस बार वोट डालने का इरादा रखते हैं.

अमरीका में मुसलमान फ़ौज में हैं, पुलिस में हैं और कई अहम ओहदों पर हैं. लेकिन ट्रंप ने जिस तरह से मेक्सिको से आए सभी लोगों को अपराधी और बलात्कारी का नाम दिया, उसी तरह सभी मुसलमानों को भी आतंकवाद के रंग में रंग दिया.

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इराक की जंग में मारे गए पाकिस्तानी-मूल के फ़ौजी कैप्टन के पिता खिज़्र ख़ान

इराक की जंग में मारे गए पाकिस्तानी-मूल के फ़ौजी कैप्टन हुमायूं ख़ान के पिता खिज़्र ख़ान ने डेमोक्रेटिक कन्वेशन में इस बात को उठाकर ट्रंप से कहा था कि शायद उन्हें अमरीका का संविधान पढ़ने की ज़रूरत है.

अमरीका में काफ़ी लोगों ने खिज़्र ख़ान की सराहना की थी और ट्रंप उनपर भी हमला करने से नहीं चूके.

चुनाव के आख़िरी दिनों में हिलेरी क्लिटंन की टीम ख़िज़्र ख़ान को भी इश्तहारों में इस्तेमाल कर रही है और वो ख़ुद भी मुसलमानों से वोट डालने की अपील कर रहे हैं.

पिउ रिसर्च के अनुसार अमरीकी वोटरों के लिए इस बार अर्थव्यवस्था के बाद आतंकवाद सबसे अहम मुद्दा है. 80 प्रतिशत ने आतंकवाद को सबसे बड़ा मुद्दा करार दिया.

ट्रंप के समर्थकों में से 89 प्रतिशत का ये कहना था कि आतंकवाद उनके लिए अर्थव्यवस्था जितनी ही अहमियत रखता है. वहीं हिलेरी क्लिंटन के समर्थकों में 74 प्रतिशत के लिए आतंकवाद अहम मुद्दा है.

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हिलेरी ने ट्रंप के मुसलमानों के ख़िलाफ़ बयान की आलोचना की.

लेकिन कुल मिलाकर देखा जाए तो इस चुनावी बहस में अमरीकी मुसलमानों को या तो चरमपंथ के चेहरे की तरह पेश किया गया है या फिर आतंकवाद के ख़िलाफ़ सरकार के आंख और कान की तरह.

मुसलमानों के अपने मुद्दे क्या हैं उनकी बात कोई नहीं कर रहा है.

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