'इस समाज में असल सज़ा तो औरत को ही मिलती है'

  • 6 नवंबर 2016
Image caption सफ़िया मनोरोगी इमदाद अली की पत्नी हैं.

पाकिस्तान के लाहौर में फांसी की सज़ा पाने वाले मनोरोगी इमदाद अली की पत्नी सफ़िया की हालत एक ऐसे इंसान की है, जो मानो 15 साल से ख़ुद सूली पर लटक रही हो.

लेकिन सुप्रीम कोर्ट की ओर से इमदाद अली की फांसी रुकने के आदेश के बाद उन्होंने चैन की सांस ली है.

हाल ही में अदालत ने फ़ैसला दिया था कि स्कित्ज़ोफ़्रेनिया कोई परमानेंट बीमारी नहीं है और इस आधार पर इमदाद अली की मौत की सज़ा रोकी नहीं जा सकती, लेकिन सोमवार को अदालत ने सफ़िया की गुज़ारिश पर इस सज़ा को रोक दिया.

इमदाद अली को हाफ़िज़ अब्दुल्ला के कत्ल का दोषी पाया गया है जो उनके शिक्षक थे. सफ़िया बताती हैं कि मरहूम हाफ़िज अब्दुल्ला ने ही इमदाद अली को क़ुरान भी पढ़ाया था.

सोफ़िया के मुताबिक दोनों में कोई दुश्मनी नहीं थी. इमदाद सऊदी में काम करते थे. देश आते तो यही जुनून रहता कि सिद्धी प्राप्त करना चाहता हूँ, जादू-टोने में महारत हासिल करना चाहता हूँ. इसीलिए वो हाफ़िज़ अब्दुल्ला के पास जाते थे.

वो बताती हैं कि इमदाद अली के इसी प्रकार के शौक़ थे और इसी वजह से वो आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करना चाहते थे.

इमदाद अली की पत्नी ज़िला वहाड़ी के तहसील बोरेवाला में रहती हैं. 1993 में उनकी शादी हुई थी. उनकी अपनी कोई संतान नहीं और घर में ही मोहल्ले की लड़कियों को सिलाई कढ़ाई सिखा कर गुज़ारा करती हैं.

उनका कहना है, "असल सज़ा इस समाज में तो औरत को मिलती है. अपराध अगर मर्द भी करे तो सज़ा औरत को ही मिलती है. हत्या के बाद शुरू में मुझ पर आरोप लगे कि मेरी वजह से हत्या हुई है. फिर मैं बाहर काम नहीं कर सकती थी क्योंकि लोगों की नज़रें मानो कह रही हो- यह एक हत्यारे की पत्नी है."

वह बताती हैं कि अदालतों और जेल के चक्कर काटने के समय वो ख़ुद को अकेला महसूस करती थीं, इसीलिए एक आठ साल के बच्चे को साथ ले जाने लगीं जिसे बाद में उन्होंने ही पाला पोसा और अब वो ही उनका सहारा है.

Image caption सफ़िया इमदाद अली की तस्वीर के साथ.

सफ़िया के अनुसार इमदाद अली की मानसिक हालत शादी के कुछ साल बाद ही बिगड़नी शुरू हो गई थी.

लाहौर के एक मनोवैज्ञानिक के अनुसार इमदाद अली के करीब जो भी होगा उसे ख़तरा है. वो ख़ुद से बातें करता, सारा-सारा दिन धूप में बैठकर सूरज से बातें करता, भयंकर ठंड में सारी-सारी रात बैठकर बातें करता और कई-कई दिन भूखा रहता.

सफ़िया ने कुछ दिन पहले ही जेल में इमदाद अली से मुलाक़ात की थी. उनका कहना है कि इस मुलाक़ात में वो बेतुकी बातचीत ही करते रहे थे.

सफ़िया के अनुसार उन्होंने कई बार हाफ़िज अब्दुल्ला के परिवार से क़िसास क़ानून के तहत माफी के लिए संपर्क किया लेकिन उनका रवैया बहुत सख़्त था.

क़िसास के तहत अगर क़त्ल हुए व्यक्ति के वारिस हत्यारे को माफ़ करते हैं तो सज़ा भी माफ़ हो सकती है.

हाफ़िज़ अब्दुल्ला के बच्चे कहते हैं- 'हमारे पिता, बच्चों को क़ुरान पढ़ा रहे थे, तालीम दे रहे थे मस्जिद में. उनको मारने का काम कोई मुसलमान नहीं कर सकता.'

इमदाद अली के दिमाग का इलाज 2004 से चल रहा है. साल 2012 में वहाड़ी जेल के सुपरिटेंडेंट के कहने पर उनकी नियमित मनोवैज्ञानिक जांच की गई और जांच के बाद उन्हें स्कित्ज़ोफ़्रेनिया का मरीज़ घोषित कर दिया गया.

इससे पहले मनोविशेषज्ञों के अलावा इमदाद अली के परिवार और पड़ोसियों की गवाही और सरकारी कागजात भी व्यर्थ साबित हुए. मानवीय और मेडिकल आधार पर की गई दया याचिकाएं भी ख़ारिज की जाती रहीं.

जेल में इमदाद की मनोवैज्ञानिक जांच करने वाले डॉक्टर ताहिर फिरोज कहते हैं, "2012 में मैंने पहली बार उनकी जांच की और उनकी रिपोर्ट लिखी. मैं उन्हें समय समय पर देखता रहा लेकिन मुझे यह कभी भी नहीं पता था कि उन्हें फांसी हो जाएगी क्योंकि मैं यह जानता था कि उन्हें आधिकारिक तौर पर अपंग घोषित किया जा चुका है, इसलिए मेरे लिए तो इस सज़ा पर यकीन करना मुश्किल है."

Image caption डॉक्टर ताहिर फिरोज़

मनोवैज्ञानिक विशेषज्ञों का कहना है कि जब वह किसी व्यक्ति को मनोरोगी करार देते हैं तो आमतौर पर अदालतें उनकी बात सुनती हैं लेकिन यह मामला कुछ अलग है.

हत्या 2001 में हुई और 2012 में उन्हें पहली बार मानसिक रूप से बीमार घोषित किया गया.

अदालतें यह जानना चाहती हैं कि हत्या के समय रोगी की मानसिक स्थिति क्या थी, लेकिन ज़ाहिर है कि उस वक़्त इमदाद अली की मानसिक स्थिति को लेकर कोई रिपोर्ट नहीं है.

डॉक्टर ताहिर फिरोज़ बताते हैं, "सफ़िया बेग़म ने 2001 में हत्या होने के बाद सत्र न्यायाधीश की अदालत में लाहौर के एक मनोचिकित्सक की रिपोर्ट पेश की थी, जिसमें इस बीमारी का ज़िक्र था. डॉक्टर ने रिपोर्ट में सुझाव दिया कि उन्हें मेंटल हॉस्पिटल लाहौर भेजा जाए. लेकिन इसी डॉक्टर ने बाद में हाई कोर्ट में अपने इस रिपोर्ट को मानने से इनकार कर दिया. ऐसे में जज साहब को चाहिए था कि वे उस समय जांच करवाते."

उच्च न्यायालय और राष्ट्रपति की ओर से एक बार दया याचिका ख़ारिज होने के बावजूद सफ़िया को उम्मीद है कि उनकी मौजूदा अपील पर इमदाद की जान बच जाएगी.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए