सीरिया: इस ज़ुल्म से मर मरकर जी रहे हैं ढाई लाख लोग

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सीरिया

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अपनी बेटी के साथ अब्दुलकाफी

विद्रोहियों के क़ब्ज़े वाले पूर्वी एलेप्पो में रूसी हवाई हमले थमने के बाद नागरिकों और लड़ाकों को थोड़ी राहत मिली है. जुलाई महीने से लगातार सरकार समर्थित बलों से घिरे इस इलाक़े में कम से कम 250,000 लोग फंसे हुए हैं. यहां की स्थिति भयावह बताई जा रही है. यहां व्यापक पैमाने पर तबाही देखने को मिली है. पाठकों ने हमसे पूछा था कि ऐसी भयावह स्थिति में भी लोग वहां क्यों रह रहे हैं? इस सवाल का जवाब जानने के लिए हमने वहां के निवासियों से फेसबुक और व्हाट्सऐप के ज़रिए सवाल पूछा था.

एलेप्पो में कौन रह रहा है?

औपचारिक रूप से एलेप्पो सीरिया का इकनॉमिक हब रहा है. संघर्ष शुरू होने से पहले एक अनुमान के मुताबिक़ यहां की आबादी क़रीब 20 लाख थी. क़रीब 10 लाख आबादी तुलनात्मक रूप से सुरक्षित पश्चिम एलेप्पो में रह रही है. जो पूर्वी एलेप्पो में फंसे हैं वे भयावह हालात में रह रहे हैं. संयुक्त राष्ट्र के ह्यूमैनटेरीअन चीफ़ स्टीफ़न ओ'ब्रीएन का कहना है कि पूरे इलाक़े में रूह कंपाने वाले हालात हैं. ईंधन और खाद्य सामग्री ख़त्म हो चुके हैं. बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव है. विद्रोही बदले की भावना से पश्चिम में हमला कर रहे हैं. इसमें आम नागरिक मारे जा रहे हैं पर यह बहुत व्यापक पैमाने पर नहीं है.

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मोहम्मद

पूर्वी एलेप्पो से लोग भाग क्यों नहीं रहे?

लोगों का कहना है कि वे यहां बुरी तरह से फंस चुके हैं इसलिए भागने की स्थिति में नहीं हैं. एलेप्पो यूनिवर्सिटी में 31 साल के फोनेटिक्स टीचर मोहम्मद ने कहा कि इस इलाक़े की घेरेबंदी से पहले कुछ लोग भागने में कामयाब रहे थे पर अब यहां से किसी के लिए भी निकलना मुमकिन नहीं है. यहां हर दिन कुछ घंटे ही बिजली रहती है इसलिए लोग फोन की बैटरी का इस्तेमाल नहीं करते हैं. हालांकि बाहरी दुनिया से ये संदेश हासिल करने में अब भी सक्षम हैं. पूर्वी एलेप्पो में 250,000 आबादी का इलाज करने के लिए बचे महज़ 30 डॉक्टरों में 32 साल के डॉ ओसामा भी एक हैं.

वह यहां की ख़तरनाक स्थिति के बारे में कहते हैं कि पूरा इलाक़ा बुरी तरह से घिरा हुआ है. उन्होंने कहा, ''एलेप्पो में खाद्य सामग्री, बिजली, पीने लायक़ पानी और सड़क कुछ भी नहीं बचा है. यहां की स्थिति बेहद ख़तरनाक है. किसी भी क्षण आप बम और बंदूक़ के निशाने पर आ सकते हैं.''

26 साल की फ़ातिमा अध्यापक हैं. उन्होंने ऐसा कभी नहीं सोचा था कि पूरा इलाक़ा बुरी तरह से घिर जाएगा.

फ़ातिमा ने कहा, ''तीन साल पहले मेरे परिवार के सारे लोग मिस्र और तुर्की चले गए. मैं यहां रुक गई क्योंकि मुझे एलप्पो यूनिवर्सिटी में लॉ की पढ़ाई पूरी करनी थी. मैं कल्पना भी नहीं कर सकती थी कि ऐसी स्थिति हो जाएगी. हम लोगों ने कभी नहीं सोचा था कि हुकूमत की तरफ़ से ऐसी मुश्किलें झेलनी होंगी.''

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डॉ ओसामा

सीरियाई सरकार रूसी सहयोग से समय-समय पर नागरिकों को निकालने की व्यवस्था करती है. हालांकि यहां लोगों के मन सुरक्षा को लेकर संदेह बना रहता है. यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी पढ़ाने वाले अब्दुलकाफी का कहना है कि प्रशासन लोगों को निकालने के लिए जिस कॉरिडोर की बात कर रहा है वह झूठ है. उन्होंने कहा कि लुटेरे बच्चों को मार देते हैं. ऐसे में हम उन पर भरोसा कैसे कर सकते हैं? बशर अल-असद और रूस नागरिकों को मार रहे हैं और वे अब बाहर निकलने की अपील कर रहे हैं. यह कैसे संभव है? मैं यहां से भागने के मुक़ाबले पेड़ की पत्तियों को खाना पसंद करूंगा.''

अब्दुलकाफ़ी एलोप्पो में तीन सालों से रह रहे हैं. विद्रोह से पहले वह अलग-अलग शहरों में पढ़ाते थे. उन्होंने असद के ख़िलाफ़ प्रदर्शन में भी हिस्सा लिया है.

अब्दुलकाफ़ी ने कहा, "असद हम सभी को आतंकवादी समझते हैं. हम ख़ुद को बचाने में मर रहे हैं. हम फाइटर नहीं हैं लेकिन मरने तक लड़ते रहेंगे."

फातिमा ने कहा कि लोग यहां से इसलिए नहीं भाग रहे हैं क्योंकि लोग बेहद लाचार और ग़रीब हैं. इनके पास पैसे नहीं हैं. ये कहीं किराए पर कमरे या खाने के लिए कुछ ख़रीदने की स्थिति में नहीं हैं. यहां तक कि इनके पास सीरिया से तुर्की जाने भर भी पैसे नहीं हैं.

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बुरी तरह से फंस चुके हैं एलेप्पो के लोग

फ़ातिमा ने कहा, ''हमलोग सभी से कहते हैं और आपसे भी कह रहे हैं कि एलेप्पो नहीं छोड़ेंगे क्योंकि यह हमारा घर है. एलेप्पो हमारी ज़िंदगी है, हमारा मुल्क है. हम कैसे इसे छोड़ दें?यहां के लोग फाइटर नहीं आम नागरिक हैं. ये इस सरकार से मुक्ति चाहते हैं.''

मोहम्मद ने कहा, "यह हमारी धरती है और हम इसे जुड़े हैं. बशर अल-असद हम सभी को निकाल फेंकना चाहते हैं. वो हमें विस्थापित करना चाहते हैं. लोग अपने घरों को छोड़ना नहीं चाहते. मेरी पत्नी सात महीने की गर्भवती है. वह अभी ख़तरनाक हालात में रह रही है. वह हर दिन डर के साये में जी रही है. वह अपने अजन्मे बच्चे के लिए ज़िंदा रहना चाहती है.''

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