63 साल की उम्र में स्कूल जा रही हैं बशीरन नेसा

  • शहनाज परवीन
  • बीबीसी बांग्ला, ढाका
बशीरन नेसा

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बशीरन नेसा

बांग्लादेश के मेहरपुर की बशीरन नेसा को पढ़ने-लिखने का मौका नहीं मिला. आठ साल की उम्र में ही उनकी शादी हो गई थी. बांग्लादेश की दूसरी औरतों की तरह वह भी बच्चों की देखभाल और दुनिया जहान के दूसरे कामों में मसरूफ हो गईं. अब उनका एक बेटा और दो बेटियां हैं और वे भी अपनी घर-गृहस्थी में व्यस्त हैं.

बशीरन नेसा के पास अब काफी वक्त रहता है. उन्होंने अचानक एक दिन फैसला किया कि अब वह निरक्षर नहीं रहेंगी. उन्होंने स्कूल में दाखिला ले लिया. मेहरपुर जिले के गांगनी ब्लॉक के होगलबड़िया गांव के स्कूल में उनसे मुलाकात हुई. दो कक्षाओं के बीच के खाली वक्त में उन्होंने हमसे बात की.

बशीर ने सीधे सादे शब्दों में कहा, "मैं पढ़ाई कर रही हूँ. और कुछ भी नहीं. मेरा लड़का बड़ा हो गया है. मैं भी अब थोड़ी आज़ादी चाहती हूं." बशीरन साल 2010 में पहली होगलबड़िया के स्कूल में दाखिले के लिए गई थीं. लेकिन स्कूल के अधिकारियों ने उन्हें दाखिला देने से मना कर दिया.

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वह अगले बरस दाखिले के लिए दोबारा स्कूल गईं. लेकिन इस बार स्कूल के अफसर बशीरन की लगन को देखते हुए उन्हें वापस लौटा नहीं सके. बशीरन को स्कूल में दाखिला मिल ही गया. बशीरन के दो पोते भी उनके साथ इसी स्कूल में पढ़ने आते थे.

वह बताती हैं, "मैं अब बूढ़ी हो गई हूं. उनकी पढ़ाई पूरी हो गई और आगे की पढ़ाई के लिए चले गए. बशीरन को इस्लाम का विषय सबसे अच्छा लगता है. जब उनसे पूछा गया कि छोटे बच्चों के साथ स्कूल में पढ़ना कैसा लगता है, उन्होंने बताया, "सबसे दोस्ती हो गईं है. उनके साथ मन लगता है. वे मेरी अच्छी सहेलियां हैं."

होगलबड़िया के इस स्कूल की हालत कोई बहुत अच्छी नहीं है. मिट्टी का फर्श, टिन की छत और बांस से बनी दीवार से काफी कुछ अंदाजा लगाया जा सकता है. बशीरन को 2011 में पहली क्लास में दाखिला मिला था.

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स्कूल में साथ पढ़ने वाले बच्चों के साथ बशीरन

आहिस्ता-आहिस्ता सीढ़ी दर सीढ़ी तय करती हुईं वह एक क्लास से दूसरे क्लास का सफर तय कर रही हैं. नवबंर की 20 तारीख को उनके प्राइमरी बोर्ड की परीक्षा है.

स्कूल के हेडमास्टर हेलालुद्दीन बताते हैं, "जब वह पहली बार आई थीं तो हमें लगा कि उनकी काफी उम्र हो गई है. यह सब वह कैसे कर पाएंगी. लेकिन वह सुबह और दोपहर में दोनों ही पालियों में स्कूल आती हैं. वह स्कूल सुबह के नौ बजे पहुंच जाती हैं और शाम के चार बजे उनकी छुट्टी होती है."

बशीरन संभवतः बांग्लादेश के प्राइमरी बोर्ड की सबसे उम्रदराज छात्रा हैं. हेलालुद्दीन का कहना है, "वह एक औसत स्टूडेंट हैं. इस उम्र में गणित और अंग्रेजी सीखना उनके लिए मुश्किल है लेकिन बंगाली सीखने में वह अच्छा कर रही हैं."

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स्कूल की तरफ से भी उन पर अतिरिक्त ध्यान दिया जा रहा है ताकि वह जल्दी से अपनी प्राइमरी बोर्ड परीक्षा पास कर लें.

हमने बशीरन से उनकी परीक्षा की तैयारी के बारे में पूछा. उनका जवाब था, "अभी बात करने से कैसे काम चलेगा. मुझे पढ़ाई करनी है."

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