सिंगापुर में अभी भी होता है बच्चियों का ख़तना

  • येट तान
  • बीबीसी संवाददाता

ज़रीफ़ा अनवर को 23 साल की उम्र तक यह पता ही नहीं था कि बचपन में ही उनका ख़तना कर दिया गया था. वे महज दो हफ़्ते की थीं जब उनकी मां ने उन्हें एक दाई मां के हवाले कर दिया, ताकि उनके जननांग के ऊपरी हिस्से को काट कर निकाला जा सके.

कई साल बाद एक सहकर्मी ने उनसे पूछा कि क्या वे इससे गुजर चुकी हैं.

ज़रीफ़ा ने बीबीसी से कहा, "मैंने पूरे आत्मविश्वास से कहा कि जब ऐसा होगा, मुझे मालूम हो जाएगा."

पर उस सहकर्मी ने कहा, "तुम्हें अपनी मां से पूछना चाहिए."

ज़रीफ़ा उसे याद कर कहती हैं, "मेरा खुशनुमा मूड यकायक ही खराब हो गया."

13 साल की लड़की की मौत के बाद ख़तना पर विवाद. यहां पढ़ें

वे कहती हैं, "मैंने अपनी मां से पूछा, क्या मैं रोई, क्या मैं नींद में थी या जगी हुई थी?

पूरी दुनिया में 20 करोड़ से ज़्यादा औरतों का ख़तना किया गया है.

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20 करोड़ से अधिक महिलाओं का ख़तना किया जा चुका है

विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि इन महिलाओं के साथ जननांग के ऊपरी हिस्से के थोड़े से भाग को काटने से लेकर पूरे हिस्से को ही काट कर अलग कर देने की घटना हुई है.

सिंगापुर के अधिकतर निवासियों को इसका एहसास ही नहीं है कि उनके देश में ऐसा होता भी है. पर मलय मुस्लिमों में यह रिवाज है और उनकी तादाद देश की जनसंख्या का 13 फ़ीसद है.

मलय में इसे सुनत परम्पुअन कहते हैं. अमूमन लड़कियों का खतना उनके दो साल की होने के पहले ही कर दिया जाता है.

फ़िलजाह सुमरनतोनो को पता चला कि उनका ख़तना तब किया गया जब वे किशोरी थीं. वे कहती हैं, "मेरी कई भारतीय सहेलियों के साथ ऐसा नहीं हुआ था और वे यह जान कर वे चौंक गईं कि मलय समुदाय में आज भी ऐसा होता है."

ख़तना की शिकार महिलाओं की मदद करता एक डॉक्टर. यहां पढ़ें

सिंगापुर में महिलाओं के ख़तना (फ़ीमेल जेनिटल म्यूटिलेशन यानी एफ़जीएम) से जुड़ा कोई क़ानूनी आदेश नहीं है. पर कई मुस्लिम सिंगापुर इस्लामी धार्मिक परिषद से मजहब के मुद्दों पर सलाह लेते हैं.

परिषद के इब्राहिम सविफ़ी का कहना है कि उनका संगठन ऐसी किसी प्रक्रिया का समर्थन नहीं करता, जिससे किसी इंसान को शारीरिक नुक़सान पंहुचे. उनके मुताबिक परिषद का हमेशा ही यह मानना रहा है कि महिलाओं के ख़तने से बचना चाहिए.

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कुछ लोगों का मानना है कि सुनत परम्पुअन इस्लामी क़ानून में अनिवार्य है

लेकिन कुछ लोगों का मानना है कि सुनत परम्पुअन इस्लामी क़ानूनी में अनिवार्य है.

कुछ मलय मुसलमानों, ख़ास कर पुरानी पीढ़ी के लोगों का, मानना है कि इस प्रक्रिया से महिलाओं में कामुकता कम हो जाती है और इससे विवाहेतर यौन संबंध का जोखिम भी कम हो जाता है. लेकिन कुछ लोगों का मानना है कि हालांकि क़ुरान में इसे अनिवार्य नहीं माना गया है, पर इस्लामी क़ानून के मुताबिक़ यह ज़रूरी है.

एक 45 साल की मलय मुसलमान महिला ने बीबीसी से कहा, "मेरे साथ ऐसा हुआ, मेरी बेटी के साथ भी हुआ और यह निश्चित तौर पर चाहूंगी कि मेरी पोती के साथ भी ऐसा ही किया जाए. यह हमारे लिए ज़रूरी है."

नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ़ सिंगापुर के मलय अध्ययन विभाग के मज़ना मोहम्मद ने कहा, "कोई ऐसा करवाती है तो यह अतिरिक्त खूबी है, किसी ने नहीं करवाया तो उसे पाप या इस्लाम की अवधारणा के ख़िलाफ़ भी नहीं माना जाएगा."

वे आगे जोड़ते हैं, "लेकिन लोगों को इसका डर लगता है कि यदि उन्होंने अपनी बेटी के साथ ऐसा नहीं किया तो वह इस्लाम के ख़िलाफ़ होगा."

लेकिन महत्वपूर्ण बात प्रक्रिया नहीं, बल्कि उससे पहले उस लड़की की सहमति लेने का मामला है.

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ज़रीफ़ा अनवर कहती हैं, मुझे पता है कि मेरा ही जिस्म मेरा नहीं है.

फ़िलज़ाह कहती हैं, "हम बचपन से ही महिलाओं की जिस्म पर नियंत्रण कसना शुरू कर देते हैं. बच्ची के लिए यह पहला संकेत होता है कि उसका शरीर उसका नहीं, समुदाय का है."

ज़रीफ़ा पूछती हैं, "दो हफ़्ते की बच्ची को इसका कुछ भी पता नहीं चल सकता. वह भला किस तरह इसकी सहमति दे सकती है?"

उनके मुताबिक़, सिंगापुर की हर मलय मुस्लिम लड़की जानती है कि उसका ख़तना किया गया है. वे इससे तब तक अनजान थी जब उन्होंने अपने माता पिता से इसके बारे में नहीं पूछा.

वे कहती हैं, "अब मुझे पता है कि किस तरह मेरी ही देह मेरी नहीं है."

28 साल की सरकारी अफ़सर सिती कहती हैं, "बच्चों के प्रति प्रेम और उनकी भलाई के लिए ऐसे कई काम हैं जो माता पिता बच्चों की सहमति के बग़ैर ही करते हैं. कोई माता पिता होगा जो अपनी बच्ची को जानबूझ कर ख़तरे में डाल देगा?"

सिती का भी खतना हुआ था.

जहां होता है सामूहिक ख़तना. यहां देखें.

वे कहती हैं, "मुझे नहीं पता कि ख़तना करवाने और इसके बिना चीजें किस तरह अलग होती हैं. इससे मैं कम महिला नहीं हूं."

तमाम महिलाएं इस पर राजी हैं कि जागरूकता बढ़ाने की ज़रूरत है.

सिती का मानना है कि इस मुद्दे पर समाज बंटा हुआ है.

ज़रीफ़ा कहती हैं, "मलय मुस्लिम समाज को इस मुद्दे पर बात करनी चाहिए और यह मानना चाहिए कि यह लड़कियों के मानवाधिकार के ख़िलाफ़ है. मैं यह नहीं मानती कि इस पर बहस पूरी हो चुकी है."

(रिपोर्ट में कई नाम बदल दिए गए हैं.)

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