#100Women: माहवारी के दौरान छुट्टी क्यों?

  • 4 दिसंबर 2016
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Image caption चूरन झेंग की कंपनी महिलाओं को माहवारी के दौरान एक दिन की छुट्टी वेतन समेत देती है

चीन के कई प्रांतों में ऐसा क़ानून है, जिसमें यह तहत यह तय किया गया है कि कामकाजी महिलाओं को माहवारी के दौरान ज़रूरत पड़ने पर दफ़्तर से एक-दो दिन की छुट्टी मिल जाए.

कार्यक्रम आयोजित करने के व्यवसाय में लगी शू रैन झेंग नियमित रूप से ऐसी छुट्टियां लेती हैं और कहती हैं कि महिलाओं के लिए यह ज़रूरी है.

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Image caption शू रैन सोशल मीडिया पर तस्वीर पोस्ट करती हूं, जिसमें यह दिखाया जाता है कि एक महिला एक अदृश्य क्रॉस से बंधी हुई है और उसके पेट में कई तीर धंसे हुए हैं

माहवारी के दौरान हर बार मुझे बहुत तेज़ दर्द होता है.

मैं उस दौरान सोशल मीडिया पर एक तस्वीर पोस्ट करती हूं, जिसमें यह दिखाया जाता है कि एक महिला एक अदृश्य क्रॉस से बंधी हुई है और उसके पेट में कई तीर धंसे हुए हैं. यह बहुत साफ़ रूप से दिखाता है कि किसी महिला के साथ माहवारी के दौरान क्या होता है. इस तस्वीर को बहुत ज़्यादा 'लाइक्स' मिले.

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माहवारी शुरू होने के एक दिन पहले ही रात को पहले मेरा मन भारी हो जाता है और पेट मे ऐंठन होने लगती है. अगले दिन जब मैं नींद से उठती हूं और माहवारी शुरू होता है, मेरे पेट में ज़बरदस्त दर्द शुरू हो जाता है.

मुझे ऐसा लगता है कि मैं अपनी अंतड़ियों को कस कर पकड़ लूं और उन्हें शरीर से बाहर निकाल कर फेंक दूं. या फिर मुझे लगता है कि मैं कैंची से उसे काट दूं. मेरा जी मिचलाने लगता है.

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Image caption 'ऐसा लगता है कि मैं अपनी अंतड़ियों को कस कर पकड़ लूं और उन्हें शरीर से बाहर निकाल कर फेंक दूं'

मैं जब से विश्वविद्यालय जाने लगी, माहवारी के दौरान दर्द दूर करने वाली गोलियां खाने लगी. पर इस दवा का असर यह होता है कि थकान लगने लगती है और नींद आती है. मैं दर्द दूर करने के लिए गर्म पानी की बोतलों का भी इस्तेमाल करती हूं.

इस दौरान काम पर ध्यान केंद्रित करना मुश्किल हो जाता है और ऐसे में मैं औरत होने के लिए खुद को कोसने लगती हूं.

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मैं 'प्राइड प्लानिंग' नाम की कंपनी में काम करती हूं, जो महिला अधिकारों के प्रचार अभियान चलाने का काम करती है.

सौभाग्य से यह कंपनी महिला कर्मचारियों को हर महीने एक दिन की छुट्टी वेतन समेत देती है. इसके लिए इन महिलाओं को डॉक्टरी सर्टिफ़िकेट जमा करने की ज़रूरत नहीं होती है न ही उन्हें यह चिंता सताती रहती है कि उनका एक दिन का वेतन काट लिया जाएगा.

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Image caption यौन प्रताड़ना के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन करने के लिए शू रैन झेंग को पिछले साल हिरासत में ले लिया गया था

काम के सिलसिले में बाहर न जाना हो तो मैं अमूमन आधे दिन या एक दिन की छुट्टी ले लेती हूं. मैं दर्द दूर करने वाली गोली खा कर बिस्तर पर लेटी रहती हूं और वहीं से कुछ न कुछ काम करती रहती हूं.

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कुछ लोगों का मानना है कि माहवारी के दौरान छुट्टियां देने से कंपनी को व्यावसायिक नुक़सान होता है. नतीजतन, इस पर बहस होने लगी है कि इससे कंपनियां महिलाओं को नौकरी देने से बचने की कोशिश करने लगेंगी.

मेरी कंपनी में महिला कर्मचारियों की तादाद पुरुषों से ज़्यादा है. जहां तक मैं जानती हूं, उसे इस वजह से किसी तरह का आर्थिक नुक़सान नहीं हुआ है, हालांकि तमाम महिलाएं हर महीने या हर दूसरे महीने माहवारी के दौरान छुट्टियां लेती हैं.

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ज़्यादातर महिलाओं को माहवारी के दौरान दर्द होता है. अमूमन दर्द पेट में शुरू होता है और फैलता हुआ पीठ या जांघों तक पंहुच जाता है. इस दौरान हल्का दर्द हो सकता है या बहुत तेज़ दर्द भी हो सकता है. महिलाओं को उल्टी, दस्त या सिर दर्द भी हो सकता है.

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इस दर्द को विज्ञान की भाषा में डिसमेनोरीआ कहते हैं. गर्भाशय की दीवार पर लगी कोशिकाएं प्रॉस्टैग्लैंडिन हार्मोन के असर में सिकुड़ने लगती हैं. इस हार्मोन का स्तर जितना ज़्यादा होगा, गर्भाशय में सिकुड़न उतनी ज़्यादा होगी और दर्द भी उतना ही तेज़ होगा.

हम छुट्टियां लेने से पहले ही उसकी योजना बना लेते हैं और छुट्टी के बाद काम की भरपाई तेज़ी से करने की कोशिश करते हैं.

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पुरुष सहकर्मियों को ऐसा नहीं लगता है कि उनके साथ भेद भाव किया जा रहा है. दरअसल, माहवारी की छुटिट्यां देना शुरू करने के बाद काम काज का वातावरण बेहतर और अधिक दोस्ताना हो गया है.

कुछ लोगों को ऐसा लग सकता है कि इस नीति से महिलाओं को अधिक सुरक्षा दी जाती है और वे इससे अधिक आलसी या कमज़ोर हो सकती हैं.

जहां तक मुझे पता है, जिन महिलाओं को माहवारी के दौरान दर्द नहीं होता है, वे छुट्टी नहीं लेती हैं. इसके अलावा, जहां कर्मचारियों के बीच कारपोरेट प्रतिस्पर्द्धा मची रहती है, कुछ महिलाएं 'कमज़ोर' या 'नखरे वाली' दिखना नहीं चाहती हैं.

यह अजीब है कि आज के समय में भी वेतन समेत एक दिन की छुट्टी की इतनी आलोचना हो सकती है या इस पर इतनी गर्मागर्म बहस होती है.

मुनाफ़े और कार्यकुशलता को सबसे ऊपर माना जाता है.

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क़ुदरत औरतों को माहवारी के तक़लीफ़ से निजात नहीं दिला सकती. पर क्या समाज महिलाओं के लिए कुछ नहीं कर सकता?

मैं यह सोचने को मजबूर हूं कि यदि पुरुषों को माहवारी होती तो तमाम देशों के संविधान में इस दौरान छुट्टी देना शुरू से ही अनिवार्य कर दिया गया होता.

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