चीन और ताइवान के बीच तनाव की वजह क्या है?

ताइवान, चीन

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चीन ने ताइवान को हमेशा से ऐसे प्रांत के रूप में देखा है जो उससे अलग हो गया है. चीन मानता रहा है कि भविष्य में ताइवान चीन का हिस्सा बन जाएगा.

जबकि ताइवान की एक बड़ी आबादी अपने आपको एक अलग देश के रूप में देखना चाहती है.

और यही वजह रही है दोनों के बीच तनाव की.

वर्ष 1642 से 1661 तक ताइवान नीदरलैंड्स की कॉलोनी था. उसके बाद चीन का चिंग राजवंश वर्ष 1683 से 1895 तक ताइवान पर शासन करता रहा.

लेकिन साल 1895 में जापान के हाथों चीन की हार के बाद ताइवान, जापान के हिस्से में आ गया.

दूसरे विश्व युद्ध के बाद

दूसरे विश्व युद्ध में जापान की हार के बाद अमरीका और ब्रिटेन ने तय किया कि ताइवान को उसके सहयोगी और चीन के बड़े राजनेता और मिलिट्री कमांडर चैंग काई शेक को सौंप देना चाहिए.

चैंग की पार्टी का उस वक़्त चीन के बड़े हिस्से पर नियंत्रण था.

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लेकिन कुछ सालों बाद चैंग काई शेक की सेनाओं को कम्युनिस्ट सेना से हार का सामना करना पड़ा.

तब चैंग और उनके सहयोगी चीन से भागकर ताइवान चले आए और कई वर्षों तक 15 लाख की आबादी वाले ताइवान पर उनका प्रभुत्व रहा.

कई साल तक चीन और ताइवान के बीच बेहद कड़वे संबंध होने के बाद साल 1980 के दशक में दोनों के रिश्ते बेहतर होने शुरू हुए.

तब चीन ने 'वन कंट्री टू सिस्टम' के तहत ताइवान के सामने प्रस्ताव रखा कि अगर वो अपने आपको चीन का हिस्सा मान लेता है तो उसे स्वायत्ता प्रदान कर दी जाएगी.

ताइवान ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया.

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चेन श्वाय बियान ने खुलेआम ताइवान की स्वतंत्रता का समर्थन किया

साल 2000 में चेन श्वाय बियान ताइवान के राष्ट्रपति चुने गए जिन्होंने खुलेआम ताइवान की स्वतंत्रता का समर्थन किया. ये बात चीन को नागवार गुज़री.

तब से ताइवान और चीन के संबंध तनावपूर्ण ही रहे. बीच-बीच में ज़रूर ताइवान ने चीन के साथ व्यापारिक संबंध बेहतर बनाने की कोशिशें की.

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अमरीका के निर्वाचित राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप और ताइवान की राष्ट्रपति साइ इंग वेन

इसी महीने जब अमरीका के निर्वाचित राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने ताइवान की मौजूदा राष्ट्रपति साइ इंग वेन से फ़ोन पर बात की तो इसे अमरीका की ताइवान को लेकर चली आ रही नीति में बड़े बदलाव के संकेत के तौर पर देखा गया.

साल 1979 में अमरीका ने माना था कि वो ताइवान को चीन के हिस्से के रूप में देखेगा.

अमरीका की भूमिका

अमरीका ताइवान का सबसे अहम और एकमात्र दोस्त माना जाता रहा है.

दूसरे विश्व युद्ध से साल 1979 तक दोनों देशों के संबंध बेहद घनिष्ठ रहे. फिर वर्ष 1979 में तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने चीन से रिश्ते प्रगाढ़ करने की पहल करते हुए ताइवान के साथ अपने राजनयिक संबंध तोड़ लिए.

हालांकि तब अमरीकी कांग्रेस ने इसके जवाब में 'ताइवान रिलेशन एक्ट' पास किया जिसके तहत तय किया गया कि अमरीका, ताइवान को सैन्य हथियार सप्लाई करेगा और अगर चीन ताइवान पर किसी भी तरह का हमला करता है तो अमरीका उसे बेहद गंभीरता से लेगा.

उसके बाद से अमरीकी का ज़ोर चीन और ताइवान दोनों ही के साथ अपने रिश्तों का संतुलन बनाए रखने की नीति पर रहा.

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साइ इंग वेन, शी जिनपिंग

ताइवान को लेकर अमरीका और चीन के बीच सबसे ज़्यादा तनाव तब देखा गया जब साल 1996 में ताइवान के राष्ट्रपति चुनाव को अपने तरीके से प्रभावित करने के लिए चीन ने मिसाइल परीक्षण किए जिसके जवाब में तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने बड़े पैमाने पर अमरीकी सैन्य शक्ति का प्रदर्शन किया जिसे वियतनाम युद्ध के बाद एशिया में सबसे बड़ा अमरीकी सैन्य प्रदर्शन कहा गया.

अमरीका ने ताइवान की ओर बड़े युद्धक अमरीकी जहाज भेजे और चीन को संदेश देने की कोशिश की कि ताइवान की सुरक्षा से अमरीका कोई समझौता नहीं करेगा.

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