नॉर्वे में भारतीय माँ-बाप से कैसे छिना बच्चा

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नॉर्वे में रह रहे भारतीय मूल के एक दंपत्ति पर उनके साढ़े पांच साल के बेटे के साथ हिंसक बर्ताव करने की शिकायत हुई और उनके बच्चे को उनसे अलग कर दिया गया.

'चाइल्ड वेल्फेयर सर्विसिस' ने अनिल कुमार शर्मा और गुरविंदरजीत कौर के बेटे आर्यन को उनसे अलग कर बच्चों की एक संस्था में डाल दिया है.

आर्यन के मामले से पहले भी साल 2012 में भारतीय मूल के दंपत्ति अनुरूप और सागरिका भट्टाचार्य के बच्चों को शिकायत होने के बाद मां-बाप से अलग कर दिया गया था.

भारत से अलग नॉर्वे में बच्चों के पालन-पोषण से जुड़ा क़ानून सख़्त हैं. बच्चों के साथ किसी भी तरह की हिंसा के सबूत मिलने पर मां-बाप को जेल तक हो सकती.

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नॉर्वे के क़ायदे

नॉर्वे ने बाल-अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र के सहमति-पत्र, 'कनवेनशन ऑन द राइट्स ऑफ़ द चाइल्ड', को अपने देश के क़ानून का हिस्सा बना लिया है.

नॉर्वे का 'चाइल्ड वेल्फेयर ऐक्ट' वहां रह रहे हर बच्चे और बड़े पर लागू होता है चाहे उसका धर्म और नागरिकता कोई भी हो.

हर नगर पालिका में बाल कल्याण सेवा, 'चाइल्ड वेल्फेयर सर्विसेज़', बनाई गई हैं और नॉर्वे दूतावास के मुताबिक ये सालाना 53,000 बच्चों को किसी तरह की मदद मुहैया कराते हैं. नॉर्वे की कुल आबादी क़रीब 53 लाख है.

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शिकायत

अगर कोई व्यक्ति किसी बच्चे की मानसिक या शारीरिक सेहत के लिए चिंतित है और उसे लगता है कि बच्चे को मदद चाहिए, वो 'चाइल्ड वेल्फेयर सर्विसिस' को संदेश भेज सकते हैं जिसके बाद सर्विसिस उसकी पड़ताल करने के लिए बाध्यकारी हैं.

'चाइल्ड वेल्फेयर सर्विसिस' की अध्यक्ष राग्निल्ड ऊवरबोटन ने बीबीसी को बताया कि ये शिकायतें हिंसा, मानसिक प्रताड़ना, मां-बाप के बीच झगड़े और विकलांग बच्चों की विशेष ज़रूरतों के बारे में होती हैं.

ऊवरबोटन के मुताबिक 80 फ़ीसदी मामलों में बातचीत, आर्थिक मदद और काउंसलिंग के ज़रिए रास्ता निकालकर मां-बाप और बच्चों को साथ रखने की कोशिश की जाती है.

कई मामलों में मां-बाप को चेतावनी देकर कुछ समय निगरानी के तहत भी रखा जाता है.

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कार्रवाई

आर्यन के ताज़ा मामले में भी जून में पहली शिकायत के बाद उसके मां-बाप पिछले छह महीने से निगरानी में थे और दिसंबर में दूसरी शिकायत के बाद ही आर्यन को उनसे अलग किया गया.

अगर जांच में ये साबित हो कि बच्चे के पालन-पोषण में गंभीर लापरवाही की जा रही है या बुरा बर्ताव और प्रताड़ना के सबूत मिलते हैं तो 'केयर ऑर्डर' जारी किया जा सकता है.

आखिरी विकल्प की तरह इस्तेमाल किए जाने वाले 'केयर ऑर्डर' के तहत बच्चे को मां-बाप के घर से हटाकर परिवार, दोस्तों या किसी और वयस्क की देखरेख में या बच्चों की संस्था में रखा जाता है.

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प्रवासी

ऊवरबोटन के मुताबिक किसी भी अल्पसंख़्यक समुदाय के बच्चों के साथ अलग बर्ताव नहीं किया जाता. पर अगर उसे मां-बाप से अलग करने की नौबत आए तो उसका ख़ास ख़याल ज़रूर रखा जाता है.

ऐसी स्थिति में मां-बाप को मुफ़्त क़ानूनी सेवाएं मिलती हैं और वो ज़िला अदालत में फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील करते हैं.

पर ऊवरबोटन ये मानती हैं कि विदेश से आए लोगों को ये समझने में समय लगता है कि नॉर्वे के क़ानून के तहत 'चाइल्ड वेल्फेयर सर्विसेज़' बच्चों के संदर्भ में परिवार के निजी मामले में दख़ल दे सकती है.

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