'चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले'

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संजय लीला भंसाली मेरे पसंदीदा डायरेक्टर्स में हैं, उनके साथ जो हुआ सुनकर दुख हुआ.

बल्कि पिछले दो वर्ष से तो ऐसी इतनी ख़बरें आ रही हैं कि अब तो शायद दुख भी पुराना हो चला है.

हम लोग तो ख़ैर पहले ही से पक्के हो चुके हैं, आपका क्या होगा जनाबे आली, ये चिंता है.

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भारत का तो मुझे ज़्यादा मालूम नहीं, लेकिन पाकिस्तान में मुर्गी का गोश्त बेचने वाले हर कसाई की दुकान पर एक बड़ा सा लोहे का पिंजड़ा पड़ा रहता है.

ये पिंजड़ा इतना भारी होता है कि चुराना भी मुश्किल होता है.

कुछ को विरोध करना पसंद नहीं

सुबह-सुबह मुर्गियों से भरा एक ट्रक आता है और खाली पिंजड़ा ऊपर तक भर जाता है. और फिर कसाई का हाथ इस पिंजड़े में आता है जाता है, जाता है आता है.

वो अपनी मर्ज़ी की मुर्गी नंगे हाथ से पकड़कर बाहर निकालता है.

एक भी मुर्गी उसके हाथ पर चोंच नहीं मारती, बस डरकर सहम जाती हैं और फिर शायद ये सोचकर नॉर्मल हो जाती है कि हो सकता है हमारी बारी न आए.

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लेकिन फिर हर शाम को पिंजड़ा खाली होता और सुबह फिर भर जाता है.

कुछ लोग बंदी बनने के बावजूद भी विरोध करना पसंद नहीं करते, बल्कि कई को तो बंदी बनाने वाले से प्यार हो जाता है.

पढ़े-लिखे लोग इसे स्टॉकहोम सिंड्रोम कहते हैं. पर मुझे लगता है कि ये सिंड्रोम सबसे ज़्यादा हमारे देशों में ही पाया जाता है.

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ बहुत ठंडे आदमी थे लेकिन एक दिन उनसे भी सब्र का दामन छूट गया.

हम तो 70 वर्ष से फ़ैज़ साहब की शायरी के असर में जी रहे हैं अब वक्त आ गया है कि पड़ोस में बसने वाले लेखक, बुद्धिजीवी, पेंटर्स, नेता, अभिनेता, नेत्रियां और डायरेक्टर, प्रोड्यूसर, संगीतकार, खिलाड़ी वगैरह भी फ़ैज़ साहब का स्वाद चखें और रोज़ किसी न किसी शक्ल में शायद चख ही रहे हैं.

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Image caption फ़ैज़ अपनी बेटी सलीमा हाशमी के साथ.

निसार मैं तेरी गलियों पे ऐ वतन के जहां,

चली है रस्म कि कोई न सिर उठा के चले.

जो कोई चाहने वाला तवाफ़ को निकले

नज़र चुरा के चले, जिस्म-ओ-जां बचाके चले

है अहले दिल के लिए अब ये नज़्मे बस्त-ओ-कुशाद

कि संग-ओ-ख़िश्त मुक़य्यद हैं और सग आज़ाद.

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