ख़तरनाक दुनिया बना रहे हैं नेताओं के भड़काऊ भाषण

जम्मू कश्मीर के श्रीनगर में प्रदर्शन करते लोग

इमेज स्रोत, EPA

मानवाधिकारों के लिए काम करने वाले अंतरराष्ट्रीय संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने अपनी सालाना रिपोर्ट जारी की है.

इसमें कहा गया है कि भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सरकारी नीतियों की आलोचना को रोकने के लिए दमनकारी क़ानूनों का इस्तेमाल किया गया.

संगठन का कहना है कि सरकार ने बहुत से ग़ैर सरकारी संगठनों के विदेश से चंदा लेने पर रोक लगा दी है. इसे इन संगठनों को परेशान करने के तौर पर देखा जा रहा है.

इमेज स्रोत, Facebook

रिपोर्ट के मुताबिक़ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को सरकार और नॉन स्टेट एक्टर्स की धमकियों और हमलों का सामना करना पड़ा. इसमें पत्रकार करुण मिश्र और राजदेव रंजन की हत्या का भी ज़िक्र किया गया है.

रिपोर्ट कहती है कि भारत प्रशासित जम्मू कश्मीर में सुरक्षा बलों ने प्रदर्शनकारियों पर अत्यधिक और ग़ैरज़रूरी बल प्रयोग किया.

पूरी घाटी में दो महीने से अधिक तक कर्फ्यू लगा दिया गया, निजी कंपनियों की संचार सेवाओं को ठप कर दिया गया. इससे लोगों को परेशानी हुई, यहां तक की उन्हें ज़रूरी मेडिकल सेवाओं के लिए भी परेशान होना पड़ा.

इसमें गुजरात में दलितों पर गोरक्षकों की ओर से किए गए हमले और उसके बाद हुए प्रदर्शनों का भी जिक्र किया गया है.

ट्रंप और भेदभाव की राजनीति

इमेज स्रोत, Getty Images

डोनाल्ड ड्रंप का जिक्र करते हुए एमनेस्टी ने कहा है कि बांटने वाला और अमानवीय भाषण देने वाले नेता एक बंटे हुए और ख़तरनाक़ दुनिया बना रहे हैं.

एमनेस्टी की सालाना रिपोर्ट में अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप को खीजा हुआ और अधिक भेदभाव वाली राजनीति करने वाला बताया गया है.

इसमें तुर्की, हंगरी और फ़िलीपींस के नेताओं की भी आलोचना की गई है. इन पर भी भय, आरोप-प्रत्यारोप और बंटवारे को बढ़ाव देने वाला भाषण देने का आरोप लगाया गया है.

संगठन का यह भी कहना है कि सरकारें राजनीतिक फ़ायदे के लिए शरणार्थियों का इस्तेमाल कर रही हैं.

इमेज स्रोत, AP

एमनेस्टी की इस रिपोर्ट में 159 देशों का हवाला देते हुए कहा गया है कि अमरीका और यूरोप में शरणार्थियों को निशाना बनाते हुए नफ़रत फैलाने वाली बातें बढ़ी हैं. रिपोर्ट कहती है कि इसे लोगों पर जाति, लिंग, राष्ट्रीयता और धर्म के नाम पर होने वाले हमलों में आई बढ़ोतरी के रूप में देखा जा सकता है.

इन देशों की रिपोर्ट में इस बात के लिए आलोचना की गई है कि ये दुनिया में ख़ुद को मानवाधिकारों का समर्थक बताते हैं. लेकिन अपने यहां ये उसे छीन रहे हैं.

इमेज स्रोत, Getty Images

एमनेस्टी इंटरनेशनल के सचिव सलिल शेट्टी ने एक बयान में कहा, ''लोगों के अधिकारों के लिए लड़ने की जगह बहुत से नेताओं ने अपने राजनीतिक फ़ायदे के लिए अमानवीय एजेंडा अपना लिया है.''

संगठन ने रिपोर्ट में पिछले महीने ट्रंप की ओर से दिए गए उस कार्यकारी आदेश का ख़ासतौर पर जिक्र किया है, जिसके ज़रिए सात मुस्लिम बहुल देशों के प्रवासियों और शरणार्थियों के अमरीका आने पर रोक लगाई गई है.

एमनेस्टी की इस रिपोर्ट के मुताबिक़ 36 देशों ने शरणार्थियों को उन देशों में वापस भेजकर, जहां उनके हित खतरे में था, अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों का उल्लंघन किया है.

इमेज स्रोत, EPA

रिपोर्ट में एमनेस्टी ने फ़िलिपिंस के राष्ट्रपति रॉड्रिगो डुटार्टे, तुर्की के राष्ट्रपति रेचैप तैयप अर्दोआन और हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ऑर्बन का इसलिए जिक्र है कि ये नेता भी हम बनाम वो की बात कह रहे हैं.

शेट्टी कहते हैं कि हम बनाम वो का इस्तेमाल 2016 में अधिक किया गया. ऐसा 1930 के बाद से नहीं देखा गया था, जब एडोल्फ हिटलर ने जर्मनी की सत्ता संभाली थी.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)