ब्लॉग: 'कम से कम अपने बच्चों को तो बख़्श दो'

  • 8 मई 2017
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ये जो 50 पाकिस्तानी बच्चे, जिनकी उम्र 10 से 15 साल के बीच थी, अगर ये पांच दिन भारत में रह जाते तो अपनी उम्र के भारतीय बच्चों से मिल लेते जिनमें यक़ीनन हिंदू भी होते और मुसलमान भी और सिख भी.

ये थोड़ी सी दिल्ली घूम लेते, जिसमें लालकिला भी है जहां की मुंढ़ेर से हर प्रधानमंत्री ने 15 अगस्त, 1947 से आजतक हर अहम दिवस पर यही कहा कि हम अच्छे हमसायों की तरह रहना चाहते हैं.

और ये बच्चे थोड़ा सा आगरा भी घूम लेते. जहां की ताजमहल को उन्होंने अपने सिलिबेस की किताबों में देखा है या बॉलीवुड की फ़िल्मों में.

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और फिर ये बच्चे ख़ुश ख़ुश लाहौर वापस लौटते और अपने दोस्तों को मजे लेकर क़िस्से सुनाते कि भारत कैसा देश है और हमने दिल्ली में क्या-क्या मजे किए.

मैंने तो तीनों वक्त केवल राज कचौड़ी खाई. ताजमहल तो मेरे सिलेबस वाली तस्वीर से बढ़कर निकला. और श्याम, श्याम से तो मेरी पक्की दोस्ती हो गई है. अगले वर्ष उसका स्कूल भी लाहौर आएगा.

गरम तो बहुत ही मज़ाकिया बच्चा है. हमेशा अपना पूरा नाम बताता है- सरदार गरम सिंह सन ऑफ़ सुजान सिंह ऑफ़ नोएडा. और वो बस ड्राइवर जो हमें हर जगह लेकर गया, क्या नाम था उसका. हां हरमन डिसूजा. उसके चेहरे पर हम पाकिस्तानी बच्चों को देखकर मुस्कान सी फैली रहती थी.

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उसे तो मैं बहुत मिस करूंगा और उसके लिए तोहफ़ा भी भेजूंगा. पाकिस्तानी क्रिकेटर हों या पहलवान हों कि ओरे पिया वाले राहत फ़तेह अली ख़ान हों कि चुपके चुपके रात दिन वाले ग़ुलाम अली हों या ये दिल है मुश्किल वाले फ़वाद ख़ान, रईस वाली मायरा ख़ान या ख़ुर्शीद महमूद कसूरी जिनकी किताब का टाइटिल ही ये है- नाइदर ए हॉक नॉर ए डव.

ये लोग तो बड़ी उम्र वाले और समझदार हैं. ख़ुद को तसल्ली दे सकते हैं कि भारत और पाकिस्तान में एक दूसरे के लिए दिल तंग क्यों हो रहे हैं?

मगर ये 10 से 15 साल के बच्चे, इन्हें कौन समझएगा कि दिल्ली में पहली रात ही डिनर की मेज पर क्यों कहा गया- सब कैंसिल, सुबह अटारी की ओर वापसी का मार्च. क्योंकि एक नॉन स्टेट एक्टर ने धमकी दी है और स्टेट एक्टर ने इस धमकी को आराम से मान लिया है.

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मैं ये सोच रहा हूं कि इनमें से कुछ बच्चे अब से दस साल बाद सरकारी या फौज़ी अफ़सर भी बनेंगे और जब जब वे नॉन स्टेट एक्टर्स या फिर भारत के बारे में सोचेंगे तो क्या सोचेंगे.

भारत और पाकिस्तान की सरकारों से हाथ जोड़कर विनती है कि एक दूसरे के साथ जो चाहें करें लेकिन अपने बच्चों के साथ ये सब ना होने दें.

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क्योंकि जो आज आप इनके साथ करेंगे वही ये बच्चे अगले 50-60 साल तक एक दूसरे के साथ करेंगे. हम तो कामयाब नहीं हो सके, क्या हम अपने बच्चों को भी नाकाम करना चाहते हैं?

क्या हम उन्हें ये सिखाना चाहते हैं कि सुख, शांति तो केवल कहने के शब्द हैं. एक दूसरे से नफ़रत करोगे तो ज़िंदा रहोगे.

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