छह मुस्लिम बहुल देशों ने क़तर से तोड़े संबंध

संयुक्त अरब अमीरात

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संयुक्त अरब अमीरात ने क़तर के राजनयिकों को 48 घंटे में देश छोड़ने को कहा

सऊदी अरब, मिस्र, बहरीन, यमन, लीबिया और संयुक्त अरब अमीरात ने क़तर के साथ अपने राजनयिक संबंध तोड़ दिए हैं.

इन छह देशों ने क़तर पर कथित इस्लामिक स्टेट और अल-क़ायदा का समर्थन करने का आरोप लगाया है. क़तर ने इन सभी आरोपों से इनकार किया है.

इस मामले में अब तक क्या हुआ?

  • सयुंक्त अरब अमीरात ने कतर के राजनयिकों को 48 घंटों के भीतर देश छोड़ने का आदेश दिया
  • सयुंक्त अरब अमीरात की एयरलाइसों ने क़तर जाने वाली फ्लाइट्स को स्थगित किया
  • यमन में सऊदी अरब के नेतृत्व में हूती विद्रोहियों से लड़ रहे गठबंधन ने क़तर को अलग किया

सऊदी अरब ने क़तर के साथ तोड़े राजनयिक संबंध

सऊदी अरब की सरकारी समाचार एजेंसी एसपीए के मुताबिक रियाद ने क़तर के साथ अपनी ज़मीनी, हवाई और समुद्री सीमा को बंद कर दिया है.

क़तर ने इस क़दम को आधारहीन और अनुचित बताया है.

मिस्र और पांच खाड़ी देशों के क़तर से संबंध काटने के इन ताज़ा क़दम को खाड़ी देशों में दरार के तौर पर देखा जा रहा है.

मिस्र के विदेश मंत्रालय ने भी क़तर के जहाज़ों और पोतों के लिए हवाई क्षेत्र और बंदरगाहों को बंद की जानकारी दी है.

संयुक्त अरब अमीरात ने क़तर के राजनयिकों को वापस जाने के लिए 48 घंटों का समय दिया है.

बहरीन की सरकार संचालित समाचार एजेंसी ने बताया है कि क़तर पर बहरीन के अंदरूनी मामलों में दखल देने का आरोप लगाया गया है.

'राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा'

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मिस्र के राष्ट्रपति अब्दुल फ़तह अल-सिसी और अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप

मिस्र के विदेश मंत्रालय के बयान में आरोप लगाया गया है कि क़तर मिस्र के खिलाफ़ शत्रुतापूर्ण रुख़ अख़्तियार करता है.

इसके अलावा क़तर पर मुस्लिम ब्रदरहुड समेत चरमपंथी संगठनों का समर्थन करने और मिस्र की सुरक्षा को निशाना बनाने वाले चरमपंथी ऑपरेशन को प्रश्रय देने का आरोप भी लगाया गया है.

इस बयान में क़तर पर मिस्र के आंतरिक मामलों में दखल देने और अरब देशों की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा पैदा करने का आरोप भी लगाया गया है.

'गंभीर उल्लंघन'

सऊदी अरब ने पिछले कुछ सालों के दौरान दोहा पर सार्वजनिक और गुप्त तरीके से सऊदी अरब की संप्रभुता को ख़तरे में डालने और देश को तोड़ने के इरादे से गंभीर उल्लंघन का आरोप लगाया है.

सऊदी अरब का आरोप है कि क़तर बहरीन और सउदी के क़तिफ़ प्रांत में मुस्लिम ब्रदरहुड, तथाकथित इस्लामिक स्टेट और ईरानी समर्थित चरमपंथी संगठन समेत अलगाववादियों को मदद कर रहा है.

वहीं क़तर ईरान का सहयोगी होने के आरोप को ख़ारिज करता रहा है.

क़तर के अमीर के 'बयान' पर विवाद

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शेख तमीम बिन हमद अल थानी

इससे पहले इन चारों देशों ने क़तर के अमीर शेख तमीम बिन हमद अल थानी की विवादास्पद टिप्पणी प्रसारित करने वाली समाचार वेबसाइट पर रोक लगा दी थी.

क़तर के अल जज़ीरा नेटवर्क की एक प्रभावशाली वेबसाइट समेत कई वेबसाइट पर सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, मिस्र और बहरीन में रोक लगी है.

जबकि क़तर का कहना है कि शेख तमीम के हवाले से चलाई गई टिप्पणी फ़र्ज़ी थी और समाचार एजेंसी को हैक करने के बाद ये इंटरनेट पर आई थी.

'ईरान की तारीफ़'

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क़तर के शेख की विवादित टिप्पणी ने कई संवेदनशील क्षेत्रीय मुद्दों को छेड़ा था लेकिन सबसे ज़्यादा नाराज़गी इसमें सऊदी अरब के धुर विरोध ईरान की तारीफ़ और सउदी अरब की निंदा से थी.

रिपोर्टों के मुताबिक शेख तमीम ने कहा था, " ईरान से अरबों की दुश्मनी का कोई कारण नहीं है और इसरायल से हमारे रिश्ते अच्छे हैं. "

इस बयान में ईरान के समर्थक लेबनान आधारित शिया आंदोलन हिज्बुल्लाह गुट के पक्ष में भी टिप्पणी की गई थी.

क़तर की तरफ़ से इस टिप्पणी को फ़र्ज़ी बताए जाने के बाद भी सऊदी मीडिया में इस पर रिपोर्टें आती रहीं.

क़तर के विदेश मंत्री मोहम्मद बिन अब्दुलरहमान अल थानी ने कहा था कि हैकिंग के दोषियों पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी.

उन्होंने इसे क़तर के ख़िलाफ़ मीडिया में चलाया जा रहा अभियान बताया था.

'क्षेत्रीय तनाव'

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पिछले महीने अपनी पहली विदेश यात्रा में अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने रियाद में अरब-इस्लामिक-अमरीका सम्मेलन में हिस्सा लिया था , इस सम्मेलन में ईरान को जमकर कोसा गया था और ईरान पर चमरपंथ को बढ़ावा देने और क्षेत्रीय मसलों में हस्तक्षेप के आरोप लगाए गए थे.

अब क़तर के खिलाफ़ सऊदी अरब, मिस्र, बहरीन और संयुक्त अरब अमीरात का ये क़दम ईरान के साथ बढ़े तनाव के बीच आया है.

क़तर, मिस्र के अपदस्थ राष्ट्रपति मोहम्मद मोर्सी का भी पुरज़ोर समर्थक और सीरिया में इस्लामी विद्रोही समूहों का समर्थक माना जाता रहा है.

क़तर और अन्य खाड़ी देशों के बीच तनाव की शुरुआत तब हुई जब मिस्र के इस्लामिक राष्ट्रपति मोहम्मद मोर्सी को सेना ने 2013 में पद से हटा दिया था.

सऊदी सरकार संचालित मीडिया में कई बार मिस्र के मुस्लिम ब्रदरहुड के लिए क़तर के कथित समर्थन को लेकर असंतोष की ख़बरें आती रही हैं.

मोहम्मद मोर्सी हिज्बुल्ला के सदस्य थे जिसे कई अरब देश चरमपंथी संगठन मानते हैं.

मार्च 2014 में भी सऊदी अरब, बहरीन और संयुक्त अरब अमीरात ने क़तर पर उनके आंतरिक मामलों में दखल देने का आरोप लगाते हुए अपने राजदूत वापस बुला लिए थे.

मिस्र ने इससे पहले अल जज़ीरा पर चरमपंथ भड़काने और फर्ज़ी ख़बरें बनाने का आरोप लगाया था.

'क़तर का औज़ार'

तेल और गैस के मामले में क़तर काफ़ी समृद्ध है जिसकी राजनयिक मामलों में भूमिका मुखर होती रही है.

प्रभावशाली अलजज़ीरा न्यूज़ नेटवर्क भी क़तर में स्थित है जो सारी दुनिया में प्रसारण करता है और जिसके प्रति सऊदी अरब और खाड़ी के अन्य देशों का रवैया आलोचना भरा रहा है.

सऊदी अरब ऐतिहासिक तौर पर छह देशों को गल्फ़ को-ऑपरेशन काउन्सिल का नेतृत्व करता रहा है और क़तर की सरकार से मीडिया के पर क़तरने के लिए कई समझौते कर चुका है.

अल जज़ीरा का झुकाव मिस्र के इस्लामिक ताकतों की तरफ़ रहा है और मिस्र के अपदस्थ पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद मोर्सी को हटाए जाने को सेना का तख्तापलट कहता रहा है.

मिस्र में अल जज़ीरा के पत्रकारों पर कार्रवाई भी जा चुकी है.

अल जज़ीरा काफ़ी लोकप्रिय है लेकिन आलोचक इसे क़तर की विदेश नीति का एक औज़ार मानते हैं जो शायद ही कभी क़तर की सरकार के हितों को चुनौती दे.

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