उत्तर कोरिया पर चीन का रुख़ अब क्या रहेगा?

  • 12 सितंबर 2017
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संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने उत्तर कोरिया पर नए प्रतिबंध लगा दिए हैं. चीन ने भी इन प्रतिबंधों पर सहमति जताई है.

अब यह देखना दिलचस्प हो गया है कि चीन उत्तर कोरिया और अमरीका के बीच अपनी नीति में किस तरह का बदलाव लाता है.

चीनी विशेषज्ञों और लोगों के बीच यह चर्चा का विषय बना हुआ है कि चीन अपनी पूर्व निर्धारित कसौटियों पर किस तरह चलता है और उसके पास अब कितने विकल्प बचे हैं.

संयुक्त राष्ट्र ने उत्तर कोरिया पर लगाए नए प्रतिबंध

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चीन ने अमरीका की तसल्ली के लिए और उत्तर कोरिया की तरफ़ अपना कड़ा रुख दिखाने के लिए सुरक्षा परिषद के लगाए गए नए प्रतिबंधों पर अपनी सहमति जताई है.

हालांकि चीन शुरू से ही मानता रहा है कि प्रतिबंधों के ज़रिए उत्तर कोरिया को परमाणु हथियार कार्यक्रम छोड़ने पर मजबूर नहीं किया जा सकता.

वो उत्तर कोरिया और अमरीका के बीच बातचीत का हिमायती रहा है और चाहता है कि उत्तर कोरिया अपने परमाणु कार्यक्रम और मिसाइल परीक्षण पर रोक लगाए.

लेकिन इन दोनों में से कोई भी देश चीन की बात सुनने के लिए तैयार नहीं है. उत्तर कोरिया अपना परमाणु कार्यक्रम तेज़ी से बढ़ा रहा है और इसके साथ ही दोनों देशों के बीच बयानबाजी भी बढ़ रही है.

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कोरियाई प्रायद्वीप पर हुए आखिरी युद्ध में अमरीका चीन के ख़िलाफ़ खड़ा था. इस युद्ध में लाखों लोगों की जानें गई थीं. अमरीका की तरफ से एकतरफ़ा सैन्य कार्रवाई से चीन के साथ दोबारा तनाव का ख़तरा पैदा हो सकता है.

उत्तर कोरिया के सुप्रीम लीडर किम जोंग उन से गहरी निराशा के बावजूद चीन के लिए उत्तर कोरिया बेहद महत्वपूर्ण पड़ोसी है. दोनों का साझा इतिहास रहा है और दोनों ही उत्तर पूर्वी एशिया से अमरीका की उपस्थिति हटाना चाहते हैं.

चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का मुख्य उद्देश्य सरकार पर अपनी पकड़ बनाए रखना और अपने देश में स्थिरता कायम रखना है. अपने ताजा मूल्यांकन में उन्होंने पाया कि किम जोंग उन के ज़रिए वे अपने उद्देश्यों को प्राप्त कर सकते हैं.

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ऐसे में चीन उत्तर कोरिया को परमाणु शक्ति के रूप में नहीं देखना चाहता, लेकिन वह उत्तर कोरिया को तबाह होते भी नहीं देखना चाहता. वो उस पर सभी तरह के प्रतिबंधों के ख़िलाफ़ है.

इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि चीन उत्तर कोरिया के साथ सहानुभूति रखता है और वह भी यह देखते हुए कि अमरीका चीन में कम्युनिस्ट पार्टी को हटाने के लिए दशकों से प्रयासरत रहा है.

इसलिए उत्तर कोरिया पर लगाए गए नए प्रतिबंधों पर चीन की सहमति यह दर्शाती है कि वह भी लापरवाही से बढ़ते उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम से परेशान है. साथ ही अमरीका के साथ सहभागिता न करने जैसे आरोपों से भी वो ख़ुद को बचाना चाहता है.

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एक तरफ़ जहां चीन अपनी नीति पर कभी आगे तो कभी पीछे बढ़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ़ प्रायद्वीप की राजनीतिक पृष्ठभूमि भी बदलने लगी है. सवाल उठने लगा है कि परमाणु कार्यक्रम के लिए उत्तर कोरिया के नशे को देखते हुए दक्षिण कोरिया और जापान कब तक ख़ुद को ऐसे हथियारों से दूर रख पाएंगे.

दक्षिण कोरिया में अमरीका के लगाए एंटी मिसाइल सिस्टम 'थाड' (टर्मिनल हाई एल्टीट्यूड एरिया डिफ़ेंस) का विरोध कर चीन पहले ही दक्षिण कोरिया के साथ अपने रिश्तों को ख़तरे में डाल चुका है. यहां तक कि इसके चलते अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप और दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति मून जे-इन के बीच बढ़ते तकरार का फ़ायदा भी चीन नहीं उठा पा रहा है.

हथियारों की इस नई दौड़ के कारण उत्तर पश्चिम एशिया से अमरीका को दूर रखने और प्रायद्वीप में अपनी महत्वपूर्ण स्थिति बनाने की चीन की रणनीति भी खतरे में है. हो सकता है आने वाले वक्त में दक्षिण कोरिया या जापान भी परमाणु शक्ति से संपन्न हों.

भारत, रूस और पाकिस्तान पहले से ही परमाणु शक्ति से लैस देश हैं. यह बताने की जरूरत नहीं कि ऐसे में अमरीका और चीन वो दो देश बन जाएंगे जिनके पड़ोस में सबसे ज़्यादा परमाणु ताकत वाले देश मौजूद होंगे.

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चीनी जनता व वहां के विशेषज्ञों के बीच यह चर्चा लगातार गर्म है कि उत्तर कोरिया चीन के राष्ट्रीय हितों को ताक पर रख रहा है.

कोरिया की समस्या से निपटने के लिए चीन और अमरीका के बीच आपसी विश्वास बेहद ज़रूरी है. साथ ही वो सभी देश जो कोरियाई प्रायद्वीप में लंबे समय तक सुरक्षा कायम रखने के इच्छुक हैं उनके बीच भी आम सहमति होना ज़रूरी है.

इन सभी देशों को कोरियाई युद्ध को समाप्त करने के लिए शांति समझौते के प्रारूप, प्योंगयांग की कूटनीतिक मान्यता, सुरक्षा गारंटी, आर्थिक वचनबद्धता और लंबे समय में अमरीकी सेना के जाने जैसे मुद्दों पर चर्चा करनी होगी.

इन सभी प्रयासों में चीन की भूमिका बहुत अहम बन जाती है, वह भी तक जब अमरीका और उत्तर कोरिया की सरकारें आपस में किसी प्रकार के मेलजोल का प्रयास करते नहीं दिखतीं.

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एक तरफ़ जहां अमरीकी राष्ट्रपति रोज़ ट्वीट पर ट्वीट करने की नीति अपनाए हुए हैं, वहीं दूसरी तरफ़ उत्तर कोरिया की सत्ता पर एक ऐसा व्यक्ति बैठा है जिसने सत्ता हासिल करने के बाद एक बार भी चीन का दौरा नहीं किया. बल्कि चीन के साथ रिश्ता रखने वाले अपने परिजनों को मौत के घाट उतार दिया और चीन को चिंतित करने वाले मिसाइल परीक्षण में बढ़ोतरी करता रहा.

प्रायद्वीप के अन्य देशों से अलग रुख़ होने के बावजूद ये मुश्किल है कि चीन उत्तर कोरिया को लेकर जारी तनाव के कारण इलाके में पैदा हुए स्थिरता के सवाल पर कुछ करेगा.

मौजूदा हालातों में इस तनाव का फ़ायदा उठा कर अपनी नीति को नया रूप देने की बजाय चीन अपने राष्ट्रवादी एजेंडे के तहत 20वीं शताब्दी की सुरक्षा नीति को नज़र में रख कर ही आगे बढ़ना चाहेगा.

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