वो 'पीस कमेटी' जिसके दम पर आग उगलता है उत्तर कोरिया

  • 16 सितंबर 2017
किम जोंग उन इमेज कॉपीरइट Reuters
Image caption इसी साल सितंबर में हाइड्रोजन बम के सफल परीक्षण के बाद वैज्ञानियों और कमेटी फॉर पीस इन एशिया एंड द पेसिफिक के साथ उत्तर कोरिया के सुप्रीम लीडर किम जोंग उन

इस कमेटी का नाम ही अपने आप में विरोधाभास भरा है- क्योंकि इस कमेटी का नाम है कमिटी फॉर पीस इन एशिया एंड द पेसिफ़िक लेकिन इसका काम इसके नाम से मेल नहीं खाता.

इस कमेटी का काम है प्रोपोगैंडा फैलाना. उत्तर कोरिया के बड़े प्रशासनिक ढांचे की बात तो पश्चिमी मीडिया में होती रही है.

इसमें वहां की संसद, मंत्रालय, दफ्तर, बोर्ड, कमीशन और ट्रेड यूनियन की बात शामिल रही हैं लेकिन हाल फ़िलहाल तक ये कमेटी पश्चिमी दुनिया की नज़रों से दूर ही रही थी.

लेकिन युद्ध और प्रतिशोध के बढ़ती आवाज़ों के साथ इस हफ्ते के बीच में इसका नाम भी सामने आया है.

हाल में संयुक्त राष्ट्र ने उत्तरी कोरिया के परमाणु परीक्षणों के ख़िलाफ़ नए प्रतिबंधों की घोषणा की तो पीस कमेटी ने अपील की कि 'जिस तरह रेबीज़ से प्रभावित किसी कुत्ते को मार दिया जाता है' उसी तरह जापान और अमेरिका को ख़त्म कर दिया जाना चाहिए.

अमरीका को देंगे 'असहनीय दर्द': उत्तर कोरिया

300 शब्दों में उ. कोरिया का मिसाइल कार्यक्रम

इमेज कॉपीरइट Getty Images

उत्तर कोरिया की सरकारी एजेंसी केसीएनए ने एक बयान जारी कर कहा कि उत्तर कोरिया के पड़ोस में जापान के अस्तित्व की कोई ज़रूरत नहीं है. उत्तर कोरिया ने कहा कि जापान के चारों द्वीपों को जूचे वाले परमाणु बम के उपयोग से वापस समंदर के भीतर धकेल दिया जाना चाहिए.

"जूचे" आधिकारिक तौर पर उत्तर कोरिया की विचारधारा है जिसका मतलब है आत्मनिर्भरता. इस विचारधारा के जनक थे मौजूदा शासक किम जोंग उन के दादा किम इल सुंग जिन्होंने साल 1950 में ने देश की विचारधारा बताने के लिए यह शब्द दिया था.

उत्तर कोरिया ने "साम्राज्यवादी हमलावर अमरीका" के लिए भी ऐसे ही भविष्य की बात की जिसे मिटा देने का "समय आ गया है" जिसे "राख में तब्दील कर अंधेरे में धकेल दिया जाना चाहिए".

अमरीका पर गिरा सकते हैं हाइड्रोजन बमः उत्तर कोरिया

उत्तर कोरिया नहीं जा सकेंगे अमरीकी नागरि

इस कमेटी ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में शामिल देशों पर भी तंज कसा और उन्हें "धोख़ेबाज़", "घूस लेने वाले" और "अमरीका के पाले कुत्ते" कहा.

और इसे साथ ही उत्तर कोरिया से ख़तरा फिर से एक बार चर्चा में आ गया.

इमेज कॉपीरइट AFP
Image caption साल 2006 के बाद से ये नौवीं बार है जब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने उत्तर कोरिया पर एक मत से प्रतिबंध लगाए हैं

इसी कारण जब एक बार फिर उत्तर कोरिया अपने बैलिस्टिक मिसाइल का परीक्षण किया तो जापान के पास अपने नागरिकों से शरण लेने के लिए कहने के सिवा कोई और उपाय बचा ही नहीं था.

इसी सप्ताह शुक्रवार को उत्तर कोरिया ने एक बार फिर जापान की ओर मिसाइल परीक्षण किया. ये मिसाइल जापान के होकाइडो द्वीप के ऊपर से गुज़री.

उ. कोरिया ने जापान की ओर फिर दागी मिसाइल

पिछले महीने भी उत्तर कोरिया ने जापान के ऊपर से एक मिसाइल छोड़ी थी, जिसे जापान ने अपने लिए 'अभूतपूर्व ख़तरा' बताया था.

उत्तर कोरिया की मिसाइल बीच में रोकेगा जापान?

इमेज कॉपीरइट KCNA

लेकिन इस तरह की बड़ी धमकियां देने वाली और अपमानजनक बातें करने वाली ये है कमेटी आख़िर है क्या? और उत्तर कोरिया की राजनीति में इसका कितना प्रभाव है?

उत्तर कोरिया की विदेश नीति और सामरिक विषयों के जानकार और अमरीका स्थित थिंक टैंक से जुड़े ओरियाना स्काएलार मेस्ट्रो बताते हैं, "1990 के दशक के बाद से पीस कमेटी राजनीतिक तौर पर उत्तर कोरिया के सबसे अधिक शक्तिशाली संस्थानों में से एक है. ये कमेटी मौजूदा नेता किम जोंग उन के पिता किम जोंग इल के वक्त भी अस्तित्व में थी."

ये 1961 में वर्कर्स राइट पार्टी के हिस्से के तौर पर बनाई गई थी और इसे किम जोंग इल की तरफ से स्पेशल प्रोटेक्शन भी मिला हुआ था.

इसे उत्तर कोरिया की राजनीति में ख़ास स्थान इसलिए भी मिल हुआ है क्योंकि ये सत्ता के "समानांतर" है. ये सीधे तौर पर वर्कर्स पार्टी का हिस्सा नहीं है जो कि फिलहाल उत्तर कोरिया में सर्वशक्तिमान है.

क्या उत्तर कोरिया युद्ध के लिए बेताब हो गया है?

इमेज कॉपीरइट Reuters
Image caption उत्तर कोरिया अब तक दो मिसाइलें छोड़ चुका है जो जापान के ऊपर से गुज़र कर समंदर में गिरी

मेस्ट्रो के अनुसार ये कमेटी उत्तर कोरिया की राजनीति में बड़ा दर्जा रखने वाले किम जोंग सुन ने बनाई थी. किम जोंग सुन सालों तक उत्तर कोरिया के ख़ुफ़िया तंत्र के प्रमुख रह चुके थे और किम जोंग इल की सुरक्षा में तैनात थे.

ओरियाना स्काएलार मेस्ट्रो बताते हैं, "मुझे लगता है ये जानना ज़रूरी है कि ये एक ऐसी संस्था है जिसे ख़ुफ़िया विभाग के प्रमुख ने बनाया है और इसका काम भी कई तरह का है, यानी आर्थिक मामलों से ले कर अंतररारष्ट्रीय मुद्दों पर और ख़ुफ़िया जानकारी पर नज़र रखना."

'उत्तर कोरिया एक अपराजेय परमाणु ताकत है'

इमेज कॉपीरइट AFP
Image caption देश के सरकारी टेलीविज़न पर 17 दिसंबर 2011 की सुबह किम जोंग इल की मौत की घोषणा हुई थी. वो 69 साल के थे.

किम जोंग सुन, जो लगभग तीन दशकों तक वर्कर्स पार्टी के सचिव भी रहे का जीवन भी लंबा न था.

साल 2003 में उत्तर कोरियाई की सरकारी एजेंसी ने बताया कि एक "कार दुर्घटना" में वो गंभीर रूप से घायल हो गए हैं. कुछ देर बाद उनकी मौत की घोषणा कर दी गई.

इस घटना के बाद से पीस कमेटी के काम में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया है.

उत्तर कोरिया पर चीन का रुख़ अब क्या रहेगा?

मेस्त्रो बताते हैं कि साल 1990 में दक्षिण कोरिया के साथ आर्थिक नीति के संबंध में बातचीत करने में पीस कमेटी की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी. लेकिन इस वक्त ये कमेटी विदेश नीति और प्रोपोगैंडा संबंधी मुद्दों पर पर काम नहीं करती थी.

और अगर वर्कर्स पार्टी का डिपार्टमेंट ऑफ़ एजिटेशन एंड प्रोपोगैंडा देश के भीतर सरकार के संदेश का प्रचार-प्रसार करता था तो देश की आधिकारिक विचारधारा को विदेश में किस तरह से प्रसारित किया जा रहा है इस काम का निरीक्षण पीस कमेटी के ज़िम्मे था

इमेज कॉपीरइट Reuters
Image caption उत्तर कोरिया की राजनीति में वर्कर्स पार्टी सबसे ताकतवर मानी जाती है

और इसलिए अपने शत्रुओं को डराने के अलावा इस सप्ताह के पीस कमेटी के संदेश का मुख्य बिंदू था अपने परमाणु कार्यक्रम का बचाव करना.

पीस कमेटी ने कहा था, "वक्त आ गया है कि अमरीका इस बात को समझे कि वो उत्तर कोरिया को अपने परमाणु कार्यक्रम और इसकी ताक़त को मज़बूत करने के अपने क़ानूनी अधिकार से वंचित नहीं कर सकता. कोई भी उत्तर कोरिया को बाध्य नहीं कर सकता कि अगर उसके पास परमाणु हथियार हैं तो वो अपने परमाणु हथियारों को छोड़ दे."

परमाणु कार्यक्रम पूरा करके रहेंगे: उत्तर कोरिया

69 साल का उत्तर कोरिया और 85 साल की सेना?

मेस्ट्रो के मुताबिक, पीस कमिटी के बयान में ये बेहद महत्वपूर्ण बिंदु है. वो कहते हैं, "हममें से कई लोगों के लिए ये समझना बेहद मुश्किल है लेकिन दशकों से उत्तर कोरिया की विचारधारा और स्वभाव सैन्य सिद्धांत पर ही आधारित है. उनके लिए राजनीतिक व्यवस्था में अपनी ताक़त को बनाए रखने के लिए परमाणु हथियारों के ज़खीरे को बढ़ाना ज़रूरी है."

ये पीस कमेटी ही थी जिस पर दुनिया में यह संदेश फैलाने का आरोप लगाया जाता है कि उतर कोरिया को भी और देशों की तरह परमाणु हथियार रखने का अधिकार होना चाहिए.

यह एक मुख्य समूह है जो उत्तर कोरिया में अपने "साथी या समर्थन करने वाले देशों" के लिए और अंतरराष्ट्रीय प्रेस के सदस्यों के लिए "निर्देशित दौरों" का आयोजन करता है और विदेश नीति के एक विशेष हिस्से का समन्वय भी करता है.

इमेज कॉपीरइट AFP
Image caption उत्तर कोरिया के वर्कर पार्टी के सदस्य

मेस्त्रो बताते हैं, "उत्तर कोरिया में विदेश नीति को पार्टी में, राज्य और ग़ैर सरकारी सेक्टर के कई स्तरों पर निभाया जाता है. इन सभी संस्थानों पर कोरियाई वर्कर्स पार्टी की अंतर्राष्ट्रीय मामलों के विभाग और पार्टी से जुड़े अन्य विभाग की निगरानी रहती है. "

इस प्रकार, विदेश मंत्रालय आमतौर पर राजनयिक संबंधों के मामले में सरकारी नीतियों के लिए ज़िम्मेदार है, जबकि पार्टी, सुप्रीम पीपल्स असेंबली का प्रेसिडियम और पीस कमेटी देश के भीतर पार्टी के कामकाज, संसद का और कूटनीति के लिए ज़िम्मेदार है.

उ. कोरिया के मिसाइल टेस्ट पर महाशक्तियां बंटीं

अगर युद्ध हुआ तो कितना ख़तरनाक होगा उत्तर कोरिया?

इमेज कॉपीरइट KCNA via REUTERS

लेकिन इस कमेटी के नाम का क्या मतलब अगर इसका शांति के साथ कोई लेना-देना ही नहीं है?

जानकारों के अनुसार, उत्तर कोरिया की इस कमेटी के नाम के बारे में समझने के लिए ज़रूरी है कि आप देश की विचारधारा के काम करने के तरीके को समझें.

मेस्त्रो कहते हैं, "जैसा कि मैंने पहले भी कहा ये एक ऐसा देश है जहां सैन्य ताक़त और परमाणु कार्यक्रम इसकी विचारधारा का ही हिस्सा है, और इसलिए उनके लिए पीस का मतलब है अपने परमाणु कार्यक्रम को जारी रखना और अपने शत्रुओं को ख़त्म करना."

वो कहते हैं, "उनके लिए शांति का रास्ता युद्ध के रास्ते ही हो कर जाता है."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)