नवाज़ शरीफ़ की पत्नी कुलसुम नवाज़ लाहौर 'उपचुनाव जीतीं'

  • 18 सितंबर 2017
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Image caption कुलसुम नवाज़ और उनकी बेटी मरियम नवाज़

भ्रष्टाचार के मामले में पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के पद से हटने के बाद खाली हुई लाहौर सीट से उनकी पत्नी कुलसुम नवाज़ चुनाव जीत गई हैं.

स्थानीय मीडिया में आई ख़बरों के अनुसार, कुलसुम को 61,254 वोट मिले जोकि उनकी क़रीबी प्रतिद्वंद्वी इमरान ख़ान की पार्टी तहरीक ए इंसाफ़ की यास्मिन राशिद से 14,188 वोट अधिक हैं.

हालांकि अभी इसकी आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है.

सत्तारूढ़ पीएमएल (एन) और विपक्षी पार्टियां इसे नवाज़ शरीफ़ को अयोग्य ठहराए जाने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर जनमतसंग्रह के तौर पर ले रही थीं.

कुलसुम नवाज़ इस समय कैंसर के इलाज़ के लिए लंदन में हैं. उनकी अनुपस्थिति में उनकी बेटी मरियम नवाज़ ने प्रचार का पूरा ज़िम्मा संभाला.

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नवाज़ की पार्टी का वोट प्रतिशत घटा

पार्टी ने दावा किया है कि कुलसुम की जीत इस बात का सबूत है कि पाकिस्तान की जनता मानती है कि नवाज़ शरीफ़ राजनीतिक साजिश का शिकार हुए हैं.

हालांकि बीबीसी के सिकंदर किरमानी के अनुसार, मुख्य चुनावी क्षेत्र में पार्टी का वोट प्रतिशत 7 प्रतिशत तक घटा है.

2016 के पनामा पेपर्स मामले में भ्रष्टाचार को लेकर हुई जांच के बाद सुप्रीम कोर्ट ने नवाज़ को प्रधानमंत्री पद पर बने रहने के लिए अयोग्य ठहरा दिया था.

हालांकि उन्होंने इन आरोपों से हमेशा इनकार किया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले पर पुनर्विचार से इनकार कर दिया है.

इस्लामाबाद में बीबीसी संवाददाता आसिफ़ फ़ारुक़ी के अनुसार, इस चुनाव में इमरान ख़ान की पार्टी की उम्मीदवार यास्मीन राशिद को 2013 के चुनाव इतना ही वोट मिला है. यानी इमरान ख़ान का आधार वोट अभी भी उनके साथ बना हुआ है.

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हाफ़िज सईद का प्रभाव बढ़ा

उनके मुताबिक़, इस चुनाव में इसकी पूरी संभावना थी कि कुलसुम नवाज़ जीत जाएंगी और इमरान ख़ान की पार्टी दूसरे नंबर पर आएगी.

विश्लेषकों को लग रहा था कि तीसरे नंबर पर ज़रदारी की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी आएगी, लेकिन हैरानी वाली बात है कि इस बार ये पार्टी चौथे नंबर पर आई है.

जबकि तीसरे नंबर पर एक स्वतंत्र उम्मीदवार याक़ूब शेख़ आए हैं, जिन्हें मिल्ली मुस्लिम लीग का समर्थन हासिल है.

मिल्ली मुस्लिम लीग अभी कोई पंजीकृत राजनीतिक पार्टी नहीं है, लेकिन इसे हाफ़िज सईद के संगठन जमात उद दावा का समर्थन हासिल है. ये चिंताजनक बात बताई जा रही है.

आसिफ़ फ़ारुक़ी कहते हैं कि 'अब ये देखना होगा कि क्या ये ट्रेंड आने वाले दिनों में राष्ट्रीय स्तर पर भी उभर कर सामने आता है या ये इसी स्थान तक सीमित रहता है.'

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