ग्राउंड रिपोर्ट: श्रीलंका में चीन दुरुस्त, भारत सुस्त?

  • 19 अक्तूबर 2017
हंबनटोटा एअरपोर्ट
Image caption हंबनटोटा एअरपोर्ट

चीन और भारत के बीच आर्थिक मुकाबला कई देशों में है. उसका असर शुक्रवार को श्रीलंका की सड़कों पर नज़र आया.

राजधानी कोलंबो के दक्षिण में मत्तला एअरपोर्ट का प्रबंधन भारत को दिए जाने के प्रस्ताव पर शुक्रवार को श्रीलंका में विपक्ष ने भारतीय काउंसलेट के बाहर प्रदर्शन किया.

इसमें तीन पुलिसवाले घायल हो गए और 28 लोगों को गिरफ़्तार किया गया. श्रीलंका में चीन की उपस्थिति हर जगह है.

नई सड़कें, हंबनटोटा बंदरगाह, मट्टला एयरपोर्ट, कोलंबो की नई इमारतें, हर जगह चीन की कंपनियां काम में जुटी हैं.

चीन की मदद से बने एक्सप्रेस वे से हम राजधानी कोलंबो से हंबनटोटा शहर पहुंचे. चीन ने यहां भारी निवेश किया है लेकिन मांग की कमी से मुना़फ़ा शून्य है.

हाईवे के किनारे बने हाईटेक कान्फ्रेंस सेंटर में धूल इकट्टा हो रही थी. हंबनटोटा में एक क्रिकेट स्टेडियम है जहां कभी कभार ही मैच होते हैं.

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चीन का निवेश

भारत को खुश करने का श्रीलंकाई उपाय

हंबनटोटा के तट पर चीन ने पूर्वी एशिया और मध्य पूर्व को जोड़ने वाले महत्वपूर्ण समुद्री रास्ते पर एक बड़ा बंदरगाह बनाया.

एलटीटीई के साथ गृहयुद्ध खत्म होने के बाद श्रीलंका की कोशिश है कि अर्थव्यवस्था में तेज़ी आए.

हंबनटोटा हवाईअ़ड्डे से थोड़ी दूर मट्टला एयरपोर्ट पर हर दिन सुबह मात्र एक हवाई जहाज़ उतरता है. बाकी दिन यहां काम करने वाले कर्मचारी खाली बैठे रहते हैं.

चीन के बढ़ते निवेश पर भारत में चिंता है. भारत को खुश करने के लिए श्रीलंका की सरकार ने घाटे में चल रहे मट्टला एअरपोर्ट का प्रबंधन भारत को देने का फ़ैसला किया.

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डॉक्टर रजीता सेनरत्ने
Image caption सरकारी प्रवक्ता स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर रजीता सेनरत्ने

सरकार के प्रवक्ता और स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर रजीता सेनरत्ने कहते हैं, "हम मट्टला एअरपोर्ट हिंदुस्तान को देना चाहते हैं. इस बारे में कैबिनेट को जानकारी दे दी गई है कि मट्टला एअरपोर्ट को भारत को दिया जाए."

भारत और चीन के पड़ोस में स्थित श्रीलंका के लिए दोनो के साथ अच्छे संबंध महत्वपूर्ण है. श्रीलंका चाहता है कि तीन दशक चले गृहयुद्ध के बाद वहां विकास में तेज़ी आए.

सेनरत्न कहते हैं, "चीन हमें हर साल अरबों डॉलर देता है. भारत से पैसा सॉफ़्ट लोन की सूरत में आता है जिसके नियम आसान होते हैं. भारत चीन की तरह भारी ऋण नहीं दे सकता."

लेकिन वो मानते हैं कि कि "भारत से अच्छे संबंधों के बिना श्रीलंका का अस्तित्व संभव नहीं है."

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चीन का निवेश

'चीन नया उपनिवेशक?'

श्रीलंका में चीन और भारत आमने-सामने हैं. चीन की कंपनियों के पास निवेश के लिए भारत से ज़्यादा पैसा है और को सरकार की पूरी हिमायत है.

एक बेल्ट एक रोड के अंतर्गत चीन की कोशिश है कि रास्तों का विस्तार हो और व्यापार बढ़े. लेकिन जिस तेज़ी से चीन ऊंची दरों पर ऋण दे रहा है, उसे नया उपनिवेशक बताया जा रहा है.

चीन के पैसे से बंदरगाह तो बन गया लेकिन घाटे के कारण श्रीलंका को इसे चीन को ही लीज़ पर देना पड़ा.

चीन का निवेश

कई परियोजनाएं शुरू हुईं

सेनरत्न कहते हैं, "हंबनटोटा के लिए हमें हर साल 9.2 अरब रुपये देने पड़ रहे थे. साल 2020 से हमें 15.2 अरब रुपये देने पड़ते जबकि हमें बंदरगाह से कोई मुनाफ़ा नहीं हो रहा था. इसलिए हमें इसे किसी को तो देना ही थी. इससे हम पर पड़ रहा दबाव कम होगा. हम उस पैसे को लोगों को राहत पहुंचाने के लिए कर सकते हैं."

चीन से मिलने वाला व्यवसायिक ऋण पर पांच प्रतिशत से ज़्यादा ब्याज़ दर पर पैसा चुकाना पड़ता है.

नमल राजपक्षे सांसद हैं और पूर्व राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे के पुत्र हैं. महिंदा राजपक्षे के दौर में श्रीलंका में कई चीनी परियोजनाओं की शुरूआत हुई थी.

नमल राजपक्षे

"चीन तेज़ी से काम करता है"

नमल कहते हैं, "हमारी नीति साफ़ थी. श्रीलंका का हित सबसे आगे है. हम वही करेंगे जिससे लोगों को फ़ायदा हो. हमें चीन की सरकार को इज्ज़त देनी चाहिए. उन्होंने खुद यहां आकर बंदरगाह नहीं मांगा था. वो इसे बनाने और स्तानांतरण की बात कह सकते थे. वो चाहते तो कहते कि आप हमें ज़मीन दे दीजिए, हम इसका विकास करेंगे."

नमल के मुताबिक भारत के सुस्त रवैये के कारण श्रीलंका को चीन का रुख करना पड़ा था. अफ़्रीकी देशों में भी भारत और चीन को लेकर आपको ऐसे ही जवाब मिलेंगे.

डॉक्टर रजीता सेनरत्ने कहते हैं, "भारत एक लोकतंत्र है और वहां भी श्रीलंका की तरह नौकरशाही है, इसलिए उन्हें वक्त लगता है. लेकिन चीन तेज़ी से काम करता है क्योंकि चीन में एक हाईकमान होता है. जब वो फ़ैसला लेते हैं तो सभी को तुरंत काम करना होता है."

निशन डा मिल

दूसरा पहलू

आरोप है कि द्विपक्षी समझौतों में प्रक्रियाओं का पालन नहीं होता.

कोलंबो में आर्थिक मामलों के जानकार निशन डा मिल कहते हैं, "प्रक्रिया का पालन नहीं करने पर काम तेज़ी से होता है. चीन के साथ व्यापार बढ़ाने के लिए यही कारण दिया गया था. लेकन इससे खर्चों में बढ़ोत्तरी होती है और परियोजनाओं पर राजनीति हावी हो जाती है."

चीन का निवेश

"चीन भविष्य की ओर देखता है"

लेकिन ऐतिहासिक कारणों से श्रीलंका में कई लोग भारत को शक़ की निगाह से देखते हैं.

वो कहते हैं, "श्रीलंका में भारत और अमरीका के बारे में माना जाता है कि वो श्रीलंका के आंतरिक मामलों में दखल दे सकते हैं. चीन को लेकर यहां ऐसी सोच नहीं है. लेकिन फिर भी देश की संपत्ति को किसी विदेशी कंपनी को देने पर यहां चिंता है."

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निशन के अनुसार, "चीन भविष्य की ओर देखता है और देशों से लंबे समय तक राजनीतिक और आर्थिक संबंधों को बढ़ाने पर ध्यान देता है, जबकि भारतीय नौकरशाह तुरंत फ़ायदे या नुकसान को देखते हैं."

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