क़तर में पाक महिलाएं रुकावटों को कैसे कर रही हैं चकनाचूर?

  • 22 अक्तूबर 2017
फ़ैशन डिज़ाइनर, सादिया ख़ुबाब, महनूर अंसारी
Image caption फ़ैशन डिज़ाइनर सादिया ख़ुबाब (दाएं) और महनूर अंसारी (बाएं)

मध्य पूर्व और खाड़ी देशों के चंद देशों के मुक़ाबले में क़तर में महिलाओं को अधिक आज़ादी हासिल है. महिलाओं को न सिर्फ़ गाड़ी चलाने की इजाज़त है बल्कि वे कई क्षेत्रों में नौकरी के साथ-साथ कारोबार चलाती हुई भी दिखाई देती हैं.

हालांकि, पारंपरिक रूप से क़तर भी बहुत रूढ़िवादी देश है. यहां लोगों के लिए जो नौकरियां निकलती हैं उन पर अधिकतर मर्दों को ही रखा जाता है. ऐसे बहुत कम पद हैं जिन पर सिर्फ महिलाओं की भर्ती की जाती हो.

बाहरी मुल्कों से उच्च शिक्षा हासिल करके आने वाली महिलाओं को भी अक्सर अपने हुनर के मुताबिक़ नौकरी नहीं मिल पाती है. रूढ़िवादी और मौकों की कमी के माहौल में महिलाओं के लिए घर से निकलकर काम करना मुश्किल हो जाता है.

क़तर में पाकिस्तानी औरतों को भी ऐसे ही हालात का सामना करना पड़ता है. अधिकतर महिलाएं महज़ अपने घर के मर्दों के साथ ही यहां आती हैं.

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मिसाल क़ायम कर रही महिलाएं

हालांकि, जहां महिलाओं की एक बड़ी तादाद घर की चारदीवारी तक सीमित होकर रह जाती है. वहीं, ऐसी पाकिस्तानी महिलाएं भी मौजूद हैं जो हर क़िस्म की रुकावटें पार करके व्यक्तिगत या सामाजिक विकास में एक रचनात्मक भूमिका अदा कर रही हैं.

दकियानूसी सोच का मुक़ाबला करना पड़े या मर्दवादी समाज में अपने लिए जगह बनानी हो, औरतें कामयाबी की मिसाल क़ायम कर रही हैं.

युवा फ़ैशन डिज़ाइनर सादिया ख़बाब और माहे नूर अंसारी भी ऐसी महिलाओं में शामिल हैं. हाल ही में क़तर में वर्जीनिया कॉमनवेल्थ यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन करने वाली दोनों महिलाओं के बनाए गए कपड़ों के डिज़ाइन्स ने स्थानीय संस्थानों और कई ब्रांडों से पुरस्कार हासिल किए हैं.

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मर्सिडीज़ के फ़ैशन शो में मिला मौका

सादिया ख़बाब को इस साल डिज़ाइन का प्रदर्शन के लिए अमरीका के शहर मियामी बुलाया गया. जबकि माहे नूर अंसारी को हाल ही में दोहा में होने वाले मर्सिडीज़ बेंज़ के फ़ैशन शो में कपड़ों के नमूनों को दिखाने का मौका मिला.

क़तर के रूढ़िवादी माहौल में रहते हुए फ़ैशन डिज़ाइनर बनने पर सादिया ख़बाब ने बीबीसी को बताया कि उन्हें शुरुआत करने में मुश्किल का सामना करना पड़ा.

उन्होंने कहा, "जब मैंने फ़ैशन डिज़ाइनिंग में जाने का इरादा किया तो मैंने ये बहुत सुना कि इस क्षेत्र के कई ऐसे पहलू होते हैं जो मुनासिब नहीं हैं तो आप यहां क्यों जा रही हैं. लेकिन मैं उनसे यही कहती थी कि यह हम पर निर्भर करता है कि हम क्या बनाएं और उसको कैसे दिखाएं."

उनका कहना था कि जब उन्होंने डिज़ाइन करना शुरू किया तो उन्होंने पारिवारिक मूल्य और संस्कृति को ध्यान में रखा. उन्होंने कोशिश की कि ऐसे कपड़े बनाएं जिनमें ज़्यादा जिस्म नज़र न आए यानी जो अरब, पाकिस्तानी या पश्चिमी देशों की औरतें पहन सकें.

उन्होंने कहा, "जब सब परिवारवालों ने मेरे कलेक्शन देखे तो सब बहुत ख़ुश हुए और इसको सराहा. मुझे ख़ुशी ही कि उन्होंने इस हवाले से अपनी सोच बदली."

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फ़ैशन डिज़ाइनिंग में काफी तरक्की

माहे नूर समझती हैं कि पाकिस्तान में भी फ़ैशन डिज़ाइनिंग में काफी तरक्की देखने में आई है, जिसकी वजह से उन्हें भी अपने काम के लिए परिवार की तरफ़ से रज़ामंदी हासिल करने में आसानी हुई.

उन्होंने कहा, "मेरे ख़याल में पाकिस्तान में जो फ़ैशन इंडस्ट्री ने तरक़्क़ी की है इसकी वजह से भी परिवार वालों ने इसकी मंज़ूरी दी.''

  • सांस्कृतिक अंतर ज़रूर पाया जाता है, हालांकि वह हमारे काम को प्रभावित नहीं करता, क्योंकि मैं पश्चिमी और रूढ़िवादी दोनों तरह के लोगों के लिए डिज़ाइन बनाने की काबिलियत रखती हूं''

इन युवा फ़ैशन डिज़ाइनरों की तरह दो पाकिस्तानी महिलाएं बशरी रेशम और उनकी दोस्त नवाल हफ़ीज़ भी उन महिलाओं में शामिल हैं, जिन्होंने इस काम को चुना और समाज में ख़ुद के लिए जगह बनाई.

क़तर में पैदा होने और परवरिश हासिल करने के बाद दोनों उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए देश से बाहर चली गईं. वापसी के बाद उन्हें अपने काम में जगह बनानी थी और चंद सालों की कोशिशों के बाद वे अपने लक्ष्य को पूरा करने में कामयाब हुईं.

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मानसिक रूप से कमजोर बच्चों को शिक्षा

बशरी और नवाल ने मानसिक रूप से कमज़ोर बच्चों को शिक्षा देकर समाज का हिस्सा बनाने का मुश्किल काम करने की ठानी.

पाकिस्तान वेलफेयर फोरम क़तर और दी नेक्स्ट जेनरेशन स्कूल के सहयोग से उन्होंने दो साल पहले मानसिक रूप से कमज़ोर बच्चों को शिक्षा देने का ख़ाका तैयार किया.

व्यक्तिगत प्रयासों से तैयार पाठ्यक्रम और पढ़ाई के तरीके ने उनको इस क़दर कामयाबी दी कि अब क़तर में रहने वाले बहुत से परिजन अपने बच्चों को उनके यहां शिक्षा दिलाना चाहते हैं.

बीबीसी से बात करते हुए बशरी रेशम का कहना था कि वह ऐसी संस्थान बनाना चाह रही हैं, जहां से निकलने वाले बच्चे सामान्य बच्चों की तरह ज़िंदगी के हर क्षेत्र में तरक्की करें.

वह कहती हैं, "भविष्य के लिए हमारा मक़सद ये है कि जब किसी के यहां ऐसे बच्चे हों तो उन्हें ये न सोचना पड़े कि ये कहां पढ़ेगा और कहां काम करेगा.

उनका कहना है कि ऐसे बच्चों की शिक्षा पर उनका नज़रिया बच्चों को उंगली पकड़कर नहीं बल्कि रास्ता दिखाकर चलाने का है.

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