भारत और पाकिस्तान की जेलों में बंद मछुआरों की रिहाई की राह देखती पत्नियां

  • 24 अक्तूबर 2017
लैला और अमृत, भारत पाकिस्तान
Image caption पतियों के न होने पर लैला (बाएं) और अमृत (दाएं) पर परिवार चलाने की जिम्मेदारी है

लैला और अमृत के बीच अरब सागर है. वे पाकिस्तान और भारत में रहती हैं लेकिन उनके बीच बहुत सी चीजें एक जैसी हैं. उनके पति मछुआरे हैं और एक-दूसरे के देश की जेलों में बंद हैं.

लैला पांच बच्चों की मां हैं जबकि अमृत के चार बच्चे हैं. लैला के पति भारत की जेल में बंद हैं जबकि अमृत के पति पाकिस्तानी जेल में.

उनके पतियों को समुद्री सीमा पार करने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था. उनका कहना है कि वे निर्दोष हैं और ग़लती से विदेशी सीमा पर चले गए.

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भारत और पाकिस्तान की महिलाओं का एक जैसा दर्द

दिसंबर 2016 में लैला के परिवार के 16 सदस्यों को भारतीय सरकार ने हिरासत में लिया था. अमृत के पति कांजी और छह अन्य को पाकिस्तान सरकार ने जनवरी 2017 में गिरफ़्तार किया था.

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दोनों महिलाएं छोटी बच्चियों की मां हैं जो उनसे सिर्फ यही पूछती हैं कि उनके पिता समुद्र से कब वापस आएंगे?

Image caption लैला अपने पति इब्राहिम के बिना किसी तरह ज़िंदगी गुजार रही हैं.

पाकिस्तान के झांगीसर गांव में रहने वाली लैला कहती हैं, "मेरे बच्चे उन्हें बहुत याद करते हैं, ख़ासकर मेरी छोटी बच्ची. वह हमेशा अपने पिता के बारे में पूछती रहती है और उनके वापस आने के सपने देखती है."

पाकिस्तान के सिंध प्रांत के इस गांव में मछुआरों का एक छोटा समुदाय सिंधु नदी के किनारे पर रहता है.

समुद्र के दूसरी तरफ पश्चिमी भारत में दमन और दीव के एक गांव में रहने वाली अमृत सोलंकी भी अपनी बेटी से झूठ बोलकर उसे मनाती हैं.

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Image caption अमृत को इंतज़ार है कि समुद्र एक दिन पाकिस्तान से उनके पति कांजी को घर वापस लाएगा.

सरकार की खामोशी

वह अपनी 13 साल की बेटी नम्रता से झूठ बोलती हैं कि उसके पिता जल्द वापस लौटेंगे, ताकि वह खाना खा ले.

केंद्र शासित दीव में बसा वनाकबाड़ा दूसरा गांव है जहां के लोग मछली पकड़कर गुजारा करते हैं.

अमृत ने बताया कि उन्होंने अपना परिवार चलाने के लिए ब्याज पर पैसे लिए हैं. उन्होंने कहा, "मैंने पैसे देने वालों से वादा किया है कि मेरे पति के पाकिस्तानी जेल से लौटने के बाद मैं उनका पैसा लौटा दूंगी."

गुजरात के मत्स्य पालन कमिश्नर मोहम्मद शेख बताते हैं कि गुजरात, दमन और दीव के कम से कम 376 मछुआरे पाकिस्तान में हिरासत में हैं.

वहीं, पाकिस्तानी एनजीओ 'द फिशर फोक फोरम' का कहना है कि क़रीब 300 पाकिस्तानी मछुआरे, जिनमें से 55 थट्टा ज़िले से हैं, भारतीय जेलों में बंद हैं.

लेकिन पाकिस्तानी सरकार इन आंकड़ों को नकार रही है. सरकार का कहना है कि भारत की कस्टडी में कुल 184 मछुआरे हैं.

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Image caption पाकिस्तान झांगीसर की महिलाओं को उम्मीद है कि एनजीओ उनके पतियों को वापस लाने में मदद करेगा.

भारत और पाकिस्तान

जेलों में बंद मछुआरे अपने परिवारों में रोजी-रोटी कमाने वाले इकलौते शख्स हैं.

उनकी मां और पत्नियां ज़िंदगी गुजारने के लिए खुद मछली पकड़ने या फिर भीख मांगने को मजबूर हैं.

गुलाब शाह पाकिस्तान में 'द फिशर फोक फोरम' के लिए काम करते हैं.

वह कहते हैं, "समुद्र पर कोई सीमा नहीं होनी चाहिए और सर क्रीक विवाद सुलझाया जाना चाहिए."

98 किलोमीटर की यह धारा भारत और पाकिस्तान दोनों की जद में है जो अरब सागर में मिलती है.

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Image caption ख़तरों के बावजूद मछुआरे समुद्र में जाते हैं

घर वापसी

गुलाब शाह कहते हैं, "ये मछुआरे छोटी खाड़ियों में जाते हैं और कई बार खुले समुद्र में खो जाते हैं और ग़लती से सीमा पार करने पर जेल पहुंच जाते हैं. कई बार ज़िंदगी भर के लिए."

"अगर अवैध रूप से सीमा पार करना एक समस्या है तो उन्हें कानूनी तौर पर सिर्फ तीन महीने जेल की सजा दी जाए." भारत में मछुआरों के प्रतिनिधि भी यही कहते हैं.

गुजरात में पोरबंदर फिशिंग बोट एसोसिएशन (PFBA) के पूर्व अध्यक्ष मनीष लोधारी कहते हैं कि जब भी पाकिस्तानी मरीन सिक्योरिटी एजेंसी (PMSA) भारतीय मछुआरों को गिरफ़्तार करती है, उनका संस्थान भारत सरकार से हर बार मदद की अपील करता है.

वह कहते हैं, "यह एक लंबी प्रक्रिया है और अगर सब कुछ बहुत तेज़ी से हो भी जाता है तो पाकिस्तान में गिरफ़्तारी के बाद मछुआरों की घर वापसी में क़रीब एक साल लग जाता है."

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न्यायिक आयोग

भारत और पाकिस्तान ने इस मुद्दे को सुलझाने के लिए एक न्यायिक आयोग का गठन किया है.

इसकी सिफ़ारिशों के मुताबिक, कमिशन एक-दूसरे की जेलों में बंद मछुआरों से साल में एक बार मिलेगा और उनकी काउंसलिंग, बेहतर खाने और रहने की अच्छी स्थिति के साथ मेडिकल सुविधाओं का भी ध्यान रखेगा.

हालांकि इनमें से एक भी सिफ़ारिश लागू नहीं की गई.

दोनों देश उस अंतरराष्ट्रीय कानून पर हस्ताक्षर कर चुके हैं जिसके तहत मछुआरों को गिरफ़्तार करना प्रतिबंधित है और उसे दोनों ही नज़अंदाज़ करते हैं.

जेलों में बंद मछुआरों के मुद्दे को सुलझाने के लिए हर छह महीने में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय वार्ता होती है लेकिन प्रक्रिया धीमी है.

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Image caption दीव में रहने वाली महिलाएं बेबस महसूस कर रही हैं. बाएं से दूसरी महिला शांता कोलीपटेल है.

दर्द और परेशानियां

शांता कोलीपटेल के पति कांजीभाई को भी पाकिस्तान सरकार ने जनवरी में गिरफ़्तार किया था. दोनों तरफ की महिलाएं आम तौर पर अनपढ़ हैं जिसके चलते अपने पतियों के लिए आवाज नहीं उठा पातीं.

शांता कहती हैं, "नावों के मालिक भी हमें किसी तरह की आर्थिक या कानूनी मदद नहीं उपलब्ध कराते जिससे हम अपने पतियों के केस की जानकारी हासिल कर सकें."

पाकिस्तान के सिंध में झांगीसर में रहने वाली सलमा का दर्द और बुरा है. उन्हें अपने बेटे की गिरफ़्तारी का पता मीडिया के ज़रिए चला.

वह कहती है, "मैंने अपने बेटे की तस्वीर इंटरनेट पर देखी तब उसकी गिरफ़्तारी का पता चला. पाकिस्तान ने भारतीय मछुआरों को गिरफ़्तार किया है और उन्होंने हमारे बेटों को हिरासत में ले रखा है."

उन्होंने बताया कि बेटे की गिरफ़्तारी के दुख में एक महीने बाद उनके पति की मौत हो गई.

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Image caption सलमा ने अपने बेटे से एक साल से बात नहीं की है. वह भारतीय जेल में बंद है

सलमा कहती हैं, "सरकार को हमारी मदद के लिए उनके मछुआरों को रिहा कर देना चाहिए ताकि बदले में वो हमारे बेटे लौटा दें."

दीव में रहने वाली शांता कोलीपटेल कहती हैं, "पाकिस्तान की महिलाएं भी हमारी तरह की मुश्किलें झेल रही हैं. हर जगह मछुआरों की ज़िंदगी एक जैसी है."

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