लंदन के बैंकर के अलक़ायदा की कैद में सालों गुजारने की कहानी

  • 4 नवंबर 2017
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ये सहारा रेगिस्तान की एक साफ़ रात थी, स्टीफ़ेन मैकगाउन खुले आसमान के नीचे लेटे हुए तारों को टकटकी लगाकर देख रहे थे.

उन्हें दक्षिण अफ़्रीका में बिताए अपने बचपन के दिन याद आ रहे थे. उन्होंने सोचा, 'अगर मैं अल-क़ायदा का बंधक नहीं होता तो ये ज़िंदगी की कितनी ख़ूबसूरत छुट्टियां हो सकती थीं"

कैसी थी कैंप में रोजाना की ज़िंदगी?

साल 2017 की शुरुआत तक लंदन के इस बैंकर को बंधक बने पांचवां साल गुज़र चुका था.

वो अपने कैंप में अकेले शख़्स थे जिन्हें जाड़ों के दिनों में भी खुले आसमान में सोना पसंद था.

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लेकिन इतनी खुली जगह में रहने के बावजूद उनकी ज़िंदगी बेहद 'सीमित और नीरस' हो गई थी.

स्टीफ़ेन हर रोज नमाज़ पढ़ने के लिए सूरज उगने के पहले उठ जाते थे. वे बाकी बंधकों और उनके जिहादी अपहरणकर्ताओं के साथ घुटनों पर बैठकर नमाज़ पढ़ते थे.

नाश्ते में उन्हें ब्रेड और मिल्क पाउडर से बना दूध मिलता था. इसके बाद बंधक या तो सोने या व्यायाम करने चले जाते थे.

यमन में बंधक रहे भारतीय पादरी की आपबीती

स्टीफ़ेन याद करते हैं, "हम आसपास एक स्टेडियम जितने बड़े इलाक़े में घूमने के लिए आज़ाद थे, लेकिन अगर आप बहुत दूर निकल जाते थे तो आपको प्रताड़ित किया जाता और जो चेहरे दोस्तों जैसे होते थे वे अचानक कठोर हो जाते थे."

दोपहर के खाने में मैक्रोनी या चावल दिया जाता, जिन्हें छिपाकर एक बड़ी जगह में रखा जाता था और इसके साथ बकरी, भेड़ या ऊंट का मांस दिया जाता था.

बंधकों को लकड़ी से अपना खाना पकाने दिया जाता था क्योंकि जिहादी अधिक तेल का इस्तेमाल करते थे.

बंधकों को दिन में क़ुरान याद करने को कहा जाता था. वो कहते हैं, "मैं अरबी भाषा के शब्द ठीक से बोल नहीं पाता था तो वे हंसते थे इसलिए मैं अकेले क़ुरान पढ़ता था."

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अक्सर वे पूछते थे कि क़ुरान का पाठ कैसा चल रहा है.

स्टीफ़ेन बताते हैं कि जिस झोपड़ी में वह रहते थे, उसे उन्होंने ठीक किया ताकि हवा का आवागमन ठीक रहे और रेत की चमक अंदर न आए.

दोस्त बनने की कोशिश करने वाले बंधक

शाम को जब थोड़ा खुशनुमा माहौल होता तो वो अपने बंधकों से बातचीत करने की कोशिश करते.

वह बताते हैं, "वे चाय बनाते और अलक़ायदा के वीडियो देखते या कभी कभार फ़्रांसीसी रेडियो प्रसारण सुनते थे."

कभी कभी एकांत की इच्छा होती थी. उनके आस पास रहने, मौत और सिर काट देने के उनके लतीफ़ों से वह तंग आ गए था.

शाम को नमाज़ पढ़ने के बाद हम सोने चले जाते थे.

वह रात, जब चरमपंथियों ने खेला था खूनी खेल'

वो बताते हैं कि उन्हें अक्सर अपने परिवार की याद आती और सोचते कि क्या वो अभी भी इंतज़ार कर रहे होंगे या नहीं, कि वे ज़िंदा हैं भी या नहीं.

यात्रा

पांच साल पहले स्टीफ़ेन और उनकी पत्नी कैथेरीन जोहानिसबर्ग लौटने के लिए पुटनी के फ़्लैट में अपना सामान बांध रहे थे.

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उनकी मुलाक़ात 2006 में लंदन में घर साझा करने करने को लेकर हुई. स्टीफ़ेन शहर में काम करते थे जबकि कैथेरीन एनएचएस में बच्चों की स्पीच थेरेपिस्ट थीं.

कुछ समय बाद दोनों ने शादी कर ली.

साल 2011 में दोनों ने दक्षिण अफ़्रीका आने का फैसला किया, जहां वे दोनों बड़े हुए थे.

लेकिन कैथरीन ने विमान से लौटने का फैसला किया और स्टीफ़ेन ने अपनी मोटरसाइकिल से यूरोप और अफ़्रीका लौटने का फैसला किया.

मोटरसाइकिल से यात्रा का विचार बीबीसी पर प्रसारित एक डॉक्युमेंट्री 'लांग वे डाउन' से आया था.

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स्टीफ़ेन ने 11 अक्तूबर 2011 को ब्रिटेन छोड़ दिया. वो फ्रांस, स्पेन, जिब्राल्टर से होते हुए मोरक्को पहुंचे. नौ नवंबर को वो माली की ओर चल पड़े.

कैसे बंधक बने स्टीफ़ेन?

स्टीफ़ेन ने अपनी अधिकांश यात्रा डच मोटर साइकिल सवार फ़ोक्के के साथ तय की. बीच बीच में वो अलग भी होते रहे.

दोनों ने बुर्किनो फासो में मिलने की योजना बनाई थी लेकिन अंतिम क्षणों में टिंबकटू जाने वाले कुछ अन्य पर्यटकों के साथ चलने के लिए अपना रास्ता बदल दिया.

स्टीफ़ेन, फ़ोक्के के पहुंचने के एक दिन पहले ही वहां पहुंच गए थे.

यहां वो पुर्तगाल के पर्यटक जोड़े सजाके और टिली रिजके, स्वीडन के पर्यटक जोहान गुस्तफसोन और जर्मनी के पर्यटक मार्टिन से मिले.

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25 नवंबर को पर्यटकों का ये समूह टिंबकटू में घूमने निकला.

उस दिन आसमान साफ़ था. स्टीफ़ेन एक जगह धूप का मज़ा ले रहे थे.

तभी कुछ लोग आ धमके, एक के हाथ में पिस्तौल थी, जबकि दूसरा रास्ते में कलाश्निकोव लेकर खड़ा था.

उन्हें लगा कि ये पुलिस है.

लड़की ने बोको हराम की क़ैद से आज़ाद होने से किया इंकार

सजाक और जोहान के साथ उन्हें एक कार में ठूंस दिया गया.

स्टीफ़ेन ने बताया, "जर्मनी के पर्यटक ने थोड़ा विरोध जताया, तभी मैंने कार के पीछे गोली चलने की आवाज़ सुनी."

बर्बरता के बीच ज़िंदगी!

स्टीफ़ेन के पिता मैलकम मैकगाउन को जोहान्सबर्ग में नीदरलैंड में रह रहीं फ़ोक्के की मां का फ़ोन आया.

तब उन्हें पता चला कि उनके बेटे स्टीफ़ेन मैकगाउन का अलक़ायदा ने अपहरण कर लिया है.

उस समय स्टीफ़ेन की पत्नी कैथरीन और उनकी बहन लंदन में ही थीं. उन्हें इस घटना का पता चला.

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कैथरीन का कहना था कि उन्हें स्टीफ़ेन से दोबारा मिलने की उम्मीद थी.

उधर, स्टीफ़ेन और अन्य लोगों को अपहरणकर्ताओं को कार से रेगिस्तान के कच्चे रास्ते से ले जाया जा रहा था.

घंटों की सड़क यात्रा के बाद स्टीफ़ेन, सजाक और जोहान को माली के उत्तर में सहारा रेगिस्तान में कार से उतारा गया.

उन्हें बताया गया कि इस्लामी चरमपंथी संगठन अल क़ायदा इस्लामिक मग़रिब (एक्यूआईएम) ने उनका अपहरण किया है.

स्टीफ़ेन के पास दोहरी नागरिकता थी और ब्रिटिश पासपोर्ट उस समय उनके पास था.

वो इस बात से डरे हुए थे कि अतीत में ब्रितानी बंधकों के साथ जिहादियों बहुत बुरा बर्ताव कर चुके थे.

इस चरमपंथी समूह ने 1990 के दशक मे अल्जीरिया की सरकार से लड़ते हुए अपना विस्तार किया था.

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पश्चिमी देशों के बंधकों को उत्तरी अफ़्रीका में ले जाया जाता था जिन्हें इस्लामी बंदियों या पैसे के बदले छोड़ा जाता था.

स्टीफ़ेन बताते हैं, "हमें चलताऊ अंग्रेज़ी में बताया गया कि वे हमें नहीं मारेंगे. वो बताने की कोशिश कर रहे थे कि हम ज़्यादा परेशानी ना खड़ी करें. हम सब हैरान थे."

पहली शाम को डराने के लिए उन्होंने हमारे सामने ही एक जानवर को काटा.

जब उन्हें पता चला कि स्टीफ़ेन के ब्रिटिश पासपोर्ट के बारे में पता चला वो बहुत खुश हुए.

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स्टीफ़ेन कहते हैं, "मैंने समझाया कि मैं दक्षिण अफ़्रीका में जन्मा और पला बढ़ा हूं, फिर भी वो मुझे ब्रिटिश नागरिक कहते रहे. मैं डर गया था."

तीन बंधकों को 17 जिहादी ले जा रहे थे, जिनके पास कलाश्निकोव राइफ़लें और हैंड ग्रेनेड थे.

वो बताते हैं, "शुरुआती दिनों में हमें हर दो हफ़्ते बाद एक कैंप से दूसरे कैंप ले जाते समय हमारी आंखों पर पट्टी बांध दी जाती. शाम को जंजीर से बांधा जाता."

शुरुआती दिनों में हम निकल भागने के बारे में सोचते लेकिन हर बार इसलिए रुक जाते क्योंकि इससे दूसरों को ख़तरा पैदा हो जाता.

स्टीफ़ेन के पिता कहते हैं, "2012 के फ़रवरी या मार्च तक बंधकों को छुड़ा लिए जाने की हमें उम्मीद थी. लेकिन इसी दौरान माली में तख्तापलट हो गया और सारी उम्मीद धूमिल हो गई."

बंधकों का जीवन

मार्च 2012 में माली की चुनी हुई सरकार का तख़्तापलट हो गया और सत्ता पर जिहादी संगठनों का कब्ज़ा हो गया.

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इस उथल पुथल के दौर में बंधकों से संपर्क टूट गया.

जब कैमरे के सामने आए स्टीफ़ेन

लेकिन जुलाई में यूट्यूब पर स्टीफ़ेन और जोहान का एक वीडियो दिखा. उनकी दाढ़ी बढ़ चुकी थी. उनके पीछे नक़ाब में चार हथियारबंद लोग खड़े थे.

वीडियो में स्टीफ़ेन कहते हुए दिखते हैं, "मुझे अपने देश से ये चिट्ठी मिली है. मैं यहां स्वस्थ हूं और हमारे साथ अच्छा व्यवहार हो रहा है."

ये पत्र उनके परिवार ने लिखा था, लेकिन उन्हें ये कभी पढ़ने को नहीं दिया गया.

स्टीफ़ेन कहते हैं, "मुझे लगा कि मैंने कैमरे के सामने झूठ बोला है."

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Image caption स्टीफ़ेन के पिता मैलकॉम

बंधकों के कम से कम ऐसे 15 वीडियो बनाए गए लेकिन इनमें से कुछ वीडियो ही बाहरी दुनिया तक पहुंच सके.

धर्म ने रेगिस्तान में दिया सहारा

स्टीफ़ेन ने बताया कि उन्होंने बहुत समझबूझ कर बंधकों के साथ अच्छे रिश्ते बनाए. इनमें से कुछ लोग चले जाते थे. कुछ लोग मारे जाते थे, कुछ नए लोग आ जाते थे.

स्टीफ़ेन ने कैद में छह महीने बिताने के बाद ही इस्लाम कबूल करने का फैसला किया.

"मैंने फ़ैसला किया कि मैं सहारा में एक बेहद संतुलित मानसिकता वाले व्यक्ति के रूप में आया था और यहां से एक गुस्सैल और लोगों से नफ़रत करने वाले व्यक्ति के रूप में नहीं जाऊंगा."

वह कहते हैं, "मैं ईसाई हूं और दोनों धर्मों में बहुत सी कहानियां एक जैसी हैं. रेगिस्तान में धर्म ने ही मुझे सहारा दिया."

सजाक और जोहान ने भी धर्म बदल लिया. ऐसा करते ही उन्होंने अपने साथ हो रहे व्यवहार में परिवर्तन देखा.

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बंधकों ने अरबी के कुछ शब्द सिखाने की कोशिश की लेकिन स्थानीय भाषा 'हसानिया' नहीं सिखाई, जिसका वो खुद इस्तेमाल करते थे.

इसके बाद उनकी मां की उन्हें एक चिट्ठी मिली, जिसे पढ़ने दिया गया.

उन्होंने बताया, "इसमें पत्नी ने लिखा था कि सभी दोस्त मिलकर रिहाई की कोशिश कर रहे हैं."

माली के राष्ट्रपति की अपील पर साल 2013 में फ्रांसीसी सैनिक यहां आए. जल्द ही गाओ और टिंबकटू पर उन्होंने कब्ज़ा कर लिया.

ये वो समय था जब स्टीफ़ेन को लगता था कि वो कभी भी रिहा नहीं हो पाएंगे.

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जिहादी बंधकों को लेकर तेजी से स्थान बदल रहे थे, ऐसे में किसी भी समझौते की उम्मीद धूमिल हो चुकी थी.

इसी बीच जोहान ने भागने की कोशिश की लेकिन उसे दूसरे दिन ही पकड़ लिया गया. अब तीनों बंधकों के सामान छीन लिए गए, लेकिन जोहान का सामान वापस कर दिया गया.

सजाक और जोहान पर साज़िश रचने का आरोप लगा था.

एक साल बाद सज़ा को अलग कर दिया गया. इस बीच स्टीफ़ेन हर बार छोड़ दिए जाने की उम्मीद करते रहे.

उन्हें डर था कि उनका परिवार उन्हें भूल जाएगा और उनकी पत्नी नई ज़िंदगी शुरू कर देंगी.

आज़ादी के लिए संघर्ष

इस बीच कैथरीन उनकी रिहाई के लिए लगातार कोशिश करती रहीं. स्टीफ़ेन के पिता भी सरकारी एजेंसियों से रिहाई की पैरवी कर रहे थे.

सरकारी प्रक्रिया के साथ ही एक स्वतंत्र मध्यस्त के ज़रिए पैसे भिजवाए गए.

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उनके पिता बताते हैं, "उनमें से एक ने दावा किया कि वो रेड क्रीसेंट में किसी को अच्छी तरह जानता है, जिसकी मेरे बेटे से बात हुई थी लेकिन उसे और पैसे चाहिए थे. मैंने कहा कि मैं पैसे दे दूंगा अगर वो मेरे बेटे के कुत्ते का नाम बता दे. यहीं बात अटक गई."

मैलकम ने एक संस्था गिफ़्ट ऑफ़ गिवर्स से भी संपर्क साधा, जिसने एक दक्षिण अफ़्रीकी की रिहाई के लिए सफलता पूर्वक यमन में अलक़ायदा से बातचीत की थी.

संस्था के संस्थापक डॉ इम्तियाज़ सूलीमान ने कोशिश की लेकिन वो असफल रही.

जब लगा कि बंधक समझौता चाहते हैं

जून 2015 में स्टीफ़ेन का एक और वीडियो आ गया. सूलीमान ने कहा कि लगता है कि बंधक बातचीत करना चाहते हैं.

उन्होंने दक्षिण अफ़्रीका में एक रेडियो अपील की. इसमें उन्होंने एक माली नागरिक से उनके लिए एक मध्यस्थ की भूमिका निभाने के लिए कहा था. इस अपील का जवाब मोहम्मद इही डिको ने दिया जिसे एक महीने बाद माली भेज दिया गया.

सूलीमान कहते हैं, "मैंने उनसे कहा कि वह अपने माली पहुंचने का मकसद जगजाहिर कर दें."

एक हफ़्ते के अंदर किसी ने डिको से संपर्क किया और "सही जगह पहुंचने" की बात कही.

सूलीमान बताते हैं, "यह एक लंबी प्रक्रिया है जिसमें समय लगता है. संदेश फोन और ईमेल के ज़रिए लोगों तक पहुंचने की जगह एक हाथ से दूसरे हाथ होकर पहुंचते हैं."

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साल 2015 के नवंबर महीने में एक नया वीडियो जारी किया गया जिसमें स्टीफ़ेन ने दान संस्था ने उनकी रिहाई की कोशिश करने के लिए शुक्रिया कहा.

वीडियो में उन्होंने कहा, "यह संदेश मेरी पत्नी और परिवार के लिए है. मुझे उम्मीद है कि घर में आप सब ठीक होंगे. मैं सोचता हूं कि मैं जल्द ही आप सबसे मिलूंगा. मुझे लगता है कि एक दक्षिण अफ़्रीकी संगठन मेरी रिहाई की कोशिश कर रहा है."

दरअसल स्टीफ़ेन सुरक्षित होने से कहीं दूर थे. उनका 15 किलोग्राम वज़न गिर चुका था.

उन्होंने बताया कि मांसपेशियों में कोशिकाएं मृत होने से वह 80 साल के वृद्ध लग रहे थे.

स्टीफ़ेन ने बताया, "मुझे जोड़ों में दिक्कत हो रही थी और मेरे पैर कमजोर हो गए थे. एक दिन मेरा घुटना अचानक जगह से हट गया, फिर मुझे इसे दबाकर ठीक करना पड़ा."

नया वीडियो सामने आने के बाद सूलीमान ने उत्तरी माली में अल-क़ायदा शिविर के पास रहने वाले लोगों को ख़ुश करने का अभियान शुरू कर दिया.

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चैरिटी संस्था ने समुदाय के लिए पशु खरीदने के साथ-साथ भोजन देने और कुंए खोदने का काम शुरू किया.

आख़िरकार समुदाय के वृद्ध नेता बंधकों को छुड़ाने के लिए अल-क़ायदा से बात करने के लिए तैयार हो गए.

लेकिन समझौते से जुड़ी बातचीत एक बार फिर रुक गई.

सूलीमान कहते हैं, "समाज के वृद्ध नेता बंधकों को छुड़ाने के लिए सहमत थे लेकिन युवाओं ने कहा कि ये नहीं किया जा सकता क्योंकि इससे एक नज़ीर बनेगी."

संवेदना के आधार पर रिहाई की कोशिश

मैलकॉम ने स्टीफन की रिहाई के लिए काम जारी रखा. इसी समय वह फेंफड़ों की बीमारी से जूझ रही अपनी पत्नी की देखभाल कर रहे थे. वह अब पूरे समय मशीन से ऑक्सिज़न ले रही थीं.

मैलकॉम कहते हैं, "यह काफ़ी कठिन था लेकिन मैंने पूरी तरह से उनका ध्यान रखा."

उन्होंने दक्षिण अफ्रीकी राष्ट्रपति जैकब जूमा को एक पत्र दिया. इसमें उन्होंने अपनी पत्नी की हालत के बारे में बताकर मदद मांगी.

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मैलकॉम कहते हैं, "मुझे लगता है कि उन्होंने पत्र पढ़कर सोचा कि उन्हें रिहाई के लिए कुछ करना चाहिए."

साल 2016 के दिसंबर महीने में स्टीफ़ेन को रेगिस्तान में दक्षिण अफ़्रीकी सरकार का एक पत्र मिला.

स्टीफ़ेन कहते हैं, "मुजाहिद्दीन पत्र के बारे में जानकर बहुत उत्साहित हुए और जानना चाहते थे कि पत्र में क्या लिखा है."

इस पत्र में स्टीफ़ेन को पता चला कि उनकी मां बेहद बीमार हैं और सरकार अल-क़ायदा से स्टीफ़ेन पर दया दिखाते हुए उन्हें छोड़ने की बात कह रही थी.

लेकिन मुजाहिद्दीन ये जानकर निराश हुए.

जब लगने लगी रिहाई की बात मज़ाक

इसके बाद जुलाई, 2017 में एक दिन के व्रत के बाद स्टीफ़ेन को बताया गया कि जोहान कैंप में नहीं है.

वह आज़ाद कर दिए गए थे.

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स्टीफ़ेन कहते हैं, "मैं ख़ुश था क्योंकि इससे पता चला कि मध्यस्थता की जा सकी और लोग रिहा हो सके.

एक साल पहले उन्होंने और जोहान ने अफ़वाह सुनी थी कि सज़ाक को फ्रांसीसी सैनिकों ने रिहा करा लिया है. इसका मतलब ये था कि स्टीफेन आख़िरी बंधक थे.

इसके बाद जुलाई में उन्हें बताया गया कि उन्हें भी रिहा कर दिया जाएगा.

स्टीफ़ेन कहते हैं, "मुझे विश्वास नहीं हुआ. मैंने उनसे पूछा कि इसके 60 प्रतिशत चांस हैं. मैंने सोचा, 'मैंने तो 90 प्रतिशत चांस के बारे में सुना है जो कि असफल हो चुका है."

लेकिन कुछ दिनों बात वह सहारा रेगिस्तान में कार से निकले. ये यात्रा ढाई दिनों तक चलती रही.

आख़िरकार, ये कार गाओ से ठीक पहले आकर रुकी.

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स्टीफ़ेन ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया, "मेरा ड्राइवर मेरी तरफ मुड़ा और बोला, 'तुम आज़ाद हो और जा सकते हो.'"

स्टीफ़ेन को लगा कि ड्राइवर मज़ाक कर रहा है.

"उसने कहा, अगर तुम्हें मुझ पर यकीन नहीं तो तुम अपने पैरों से चलकर जा सकते हो' और मैंने सोचा, 'शायद वह मेरा मज़ाक नहीं उड़ा रहा है.'"

तभी एक दूसरी कार आई. स्टीफ़ेन को इस नई कार में बिठाया गया. इसके बाद स्टीफन को अहसास हुआ कि उन्हें रिहा कर दिया गया है.

"ये एक बेहद ख़ास पल था. मेरे लिए इसे समझना मुश्किल था क्योंकि बीते साढ़े पांच सालों में कई उतार-चढ़ाव रहे हैं."

पिता के गले लगकर रो पड़े स्टीफ़ेन

स्टीफ़ेन 29 जुलाई, 2017 को मेडिकल चेक-अप के बाद जोहान्सबर्ग लौट गए. उन्हें घर लौटते हुए अपने परिवार से बात करने की आज़ादी नहीं दी गई. इससे उन्हें चिंता होने लगी कि घर पहुंचकर उन्हें क्या जानने को मिलेगा.

वह कहते हैं, "मैंने अपने साथ जा रहे लोगों से पूछा, 'क्या घर में कुछ ठीक नहीं है?', इसका जवाब था, "वाह, क्या मिठाई शानदार नहीं थी."

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जब वह घर से सिर्फ़ 10 मिनट की दूरी पर थे तो उन्हें बताया गया कि दो महीने पहले उनकी मां गुजर चुकी हैं.

"मुझे कुछ भी समझ नहीं आया. मुझे याद है कि मैं सोच रहा था, "मुझे इस समय कैसा महसूस करना चाहिए, क्या मेरी आंखों में आंसू होने चाहिए?"

हालांकि, उन्हें कई दिनों पहले रिहा कर दिया गया था लेकिन उनके पिता और पत्नी को उनकी रिहाई के बारे में घर पहुंचने के एक घंटे पहले ही बताया गया था.

स्टीफ़ेन कहते हैं, "मैंने कार से अपनी आंखों को देखा, मेरी आंखों में आंसू आ गए और रोने लगा. ये बेहद खूबसूरत अहसास था, मुझे विश्वास नहीं हुआ."

मैंने उन्हें गले लगा लिया और मुझे मज़बूती का अहसास हुआ.

पत्नी को देखते ही आंसुओं से भीगी आंखें

स्टीफेन इसके बाद घर में घुसे जहां पर कैथरीन उन्हें एयरपोर्ट ले जाने के लिए कपड़े पैक कर रही थीं.

स्टीफेन कहते हैं, "वह बदहबासी में मेरे बैग के बारे में बात करते हुए दौड़ते हुए आई लेकिन उसे पता नहीं था कि मैं पहुंच चुका था."

अपने हाथों से चेहरा ढकते हुए वह वह रोते-रोते जमीन पर बैठ गई.

"वह बेहद ख़ूबसूरत लग रही थी. मैं आश्चर्यचकित रह गया. उसे देखना अपने आप में बहुत सुंदर अनुभव था."

कैथरीन कहती हैं, "वह काफी अलग लग रहे थे लेकिन उनके चेहरे पर अभी भी बड़ी सी मुस्कान है."

"उनके बाल लंबे और घुंगराले थे जिसकी मैंने कल्पना नहीं की थी. और वह रेगिस्तानों इलाकों जैसे कपड़े पहने हुए जो मुझे थोड़ा अजीब लगा."

कैथरीन ने सूलीमान को फोन करके बताया कि स्टीफेन घर पहुंच गए हैं.

वह कहते हैं, "मैं बेहद खुश था क्योंकि मैंने बीते कई सालों में इस परिवार का दर्द देखा था."

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स्टीफेन को इस बारे में नहीं पता है कि उनकी रिहाई कैसे हुई लेकिन उन्हें न्यू यॉर्क टाइम्स में छपी ख़बर के बारे में पता था. इस ख़बर के मुताबिक़, दक्षिण अफ़्रीकी सरकार ने उनकी रिहाई के लिए 3 मिलियन पाउंड की राशि अदा की थी.

हालांकि, दक्षिण अफ़्रीकी सरकार इससे मना करती है.

स्टीफेन कहते हैं कि कुछ भी हुआ हो लेकिन वह उन सभी लोगों का शुक्रिया अदा करना चाहते हैं जिन्होंने उनकी रिहाई के लिए कोशिश की.

वह कहते हैं कि उनकी चुनौती अपनी पुरानी ज़िंदगी में वापस लौटना थी.

स्टीफेन बताते हैं, "मैं अपने पिता, पत्नी, बहन को देखता हूं तो लगता कि कल ही इन्हें देखा था. लेकिन हमारे बीच में छह सालों की लंबी और अंतहीन दूरी रही है, मैं अपनी जगह को लेकर अनिश्चित हूं और मुझे नहीं पता कि मेरी जगह कहां है."

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स्टीफेन को कई तरह की रोजमर्रा की दिक्कतों का सामना करना पड़ा. इनमें पुराने बैंक खातों को खोलकर अपनी आंखों और पीठ के इलाज़ के लिए पैसा निकालना शामिल है. लेकिन उन्हें अपने मानसिक सदमे को देखकर आश्चर्य होता है.

रिहा होने के बाद उनकी ज़िंदगी में आई ख़ुशी अब "विचारों और भावनाओं के भंवर" में बदल चुकी है. हालांकि, उन्हें उम्मीद है कि वे जल्दी ही उबर जाएंगे.

स्टीफेन को लगता है कि अब वह उबरने की स्थिति में हैं.

बीते कई साल रेगिस्तान में रहने के बाद वह अब इतने सालों में इकट्ठी हुई जानकारियों को समझने में लगे हैं. और उन्हें दूसरे लोगों से बात करने में दिक्कत होती है.

स्टीफेन की अंग्रेजी भी बहुत अच्छी नहीं है.

वह कहते हैं, "सही शब्दों को तलाशना बहुत मुश्किल होता है."

स्टीफेन की चिंताओं के बावजूद उनकी पत्नी कहती हैं कि वह अभी भी वही व्यक्ति हैं.

वह कहती हैं, "वह अभी भी मुझे हंसाते है जो मुझे पसंद है."

स्टीफेन कहते हैं कि वह रोजमर्रा की चीजों की बहुत कद्र करते हैं जैसे बिजली चमकने पर घर के अंदर जाना और धूप में पेड़ों की छांव में जाना.

वह परिवार से घुलने मिलने की कोशिश करते हैं. माली में रहते हुए अपनी भतीजी और एक नवजात से मिल चुके हैं. वह अपने पिता के साथ साइकिलिंग ट्रिप पर जाने की योजना बना रहा है.

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"मैं उनसे साइकिल चलवाना चाहता हूं क्योंकि ये उनकी सेहत के लिए अच्छा होगा, उन्हें अपने व्यवसाय, मेरी मां की बीमारी और मेरी रिहाई से जूझना पड़ा लेकिन वह अभी भी बेहद सकारात्मक व्यक्ति हैं."

जब स्टीफेन रेगिस्तान में थे तो उन्होंने एक कवच के अंदर नहीं रहने वाले शख़्स बनने का फैसला किया था. दक्षिण अफ़्रीका आने के बाद भी उन्होंने अपने इस लक्ष्य को नहीं छोड़ा है.

वह कहते हैं, "मैं मोटी चमड़ी का शख्स नहीं बनना चाहता, मैं अब ज़्यादा समझदार और संवेदनशील होता हूं जब लोगों को समस्याओं से जूझता हुआ देखता हूं. मुझे आशा करता हूं कि मैं अपनी ज़िंदगी में कभी भी रुका न रह जाऊं और ये ना देख पाऊं कि मेरे आसपास क्या है."

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