क्या हाफ़िज़ सईद को रोक पाएगा पाकिस्तान?

  • शुमाइला जाफ़री
  • बीबीसी संवाददाता, इस्लामाबाद, पाकिस्तान से
हाफ़िज़ सईद

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चरमपंथी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापक हाफ़िज़ सईद की नई राजनीतिक पार्टी मिल्ली मुस्लिम लीग (एमएमएल) को पाकिस्तान चुनाव आयोग ने पहले लाहौर और फ़िर पेशावर में उपचुनाव लड़ने से रोक दिया.

अब मिल्ली मुस्लिम लीग ने इस्लामाबाद हाई कोर्ट में एक याचिका दर्ज़ कर चुनाव आयोग के फ़ैसले को चुनौती दी है.

भारत विरोधी चरमपंथी संगठनों के साथ नई राजनीतिक पार्टी की मौजूदगी से विदेशों के साथ ही पाकिस्तान में भी चिंताएं जताई जाने लगी हैं.

अमरीका ने ऐसे समूहों को जड़ से उखाड़ने में नाकाम रहे पाकिस्तान की आलोचना की, तो इस नई राजनीतिक पार्टी के गठन से पाकिस्तान में चरमपंथी संगठनों की मुख्य धारा में प्रवेश पर नई बहस शुरू हो गई है.

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हाफ़िज़ की विचारधारा से चलेगी मिल्ली मुस्लिम लीग

अगस्त 2017 में, लगभग उसी वक़्त जब ट्रंप प्रशासन ने अपनी अफ़गान नीतियों की घोषणा की और पाकिस्तान से चरमपंथी संगठनों पर कार्रवाई करने को कहा, मुल्क में इस नई पार्टी का जन्म हुआ.

मिल्ली मुस्लिम लीग ने यह स्पष्ट कर दिया है कि हाफ़िज़ सईद जिन पर 2008 में मुंबई हमलों के मास्टरमाइंड होने के आरोप हैं और जिनके सिर पर 10 मिलियन डॉलर का इनाम है, राजनीति में नहीं उतरेंगे, लेकिन पार्टी उनकी और उनके जमात-उद-दावा की विचारधारा का पालन करेगी.

जब यह पार्टी आकार ले रही थी, तभी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ को भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण उनके पद के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया.

उन्हें अपनी लाहौर संसदीय सीट भी छोड़नी पड़ी और मिल्ली मुस्लिम लीग को इसके साथ ही अपने गठन के महज कुछ हफ़्तों में ही चुनावी अभियान में उतरने का अवसर मिल गया.

एमएमएल ने इस तथ्य के बावजूद आक्रामक अभियान चलाया कि वास्तविक मुक़ाबला पाकिस्तान के दो प्रमुख राजनीतिक दलों, पूर्व प्रधानमंत्री के मुस्लिम लीग और पूर्व क्रिकेटर इमरान ख़ान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ के बीच था.

नवाज़ शरीफ़ के गढ़ लाहौर में चुनाव लड़ने से अच्छा मौक़ा क्या होता, इसलिए एमएमएल ने क़ानूनी तौर पर पार्टी को पंजीकृत कराने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ी.

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मिल्ली मुस्लिम लीग की ताक़त बड़ी पार्टियों जैसी

एक लाहौरी के रूप में, मुझे हाफ़िज़ सईद या उनके जेयूडी से कभी फ़र्क नहीं पड़ा क्योंकि हाल के वर्षों में उनकी मौजूदगी इस शहर का हिस्सा बन चुकी है.

उनका बेहद सुरक्षित अहाता "मस्जिद-ए-कद्दासिया" लाहौर के केंद्र में स्थित ऐतिहासिक मुगल स्मारक चौबुर्जी के पास है.

यह वह जगह है जहां हाफ़िज़ सईद शुक्रवार को उपदेश देते हैं और जनवरी में उनकी नज़रबंदी से पहले कभी-कभार उन्हें यहां रैली को संबोधित करते हुए भी देखा जा सकता था.

लेकिन कुछ हफ़्ते पहले जब मैं एमएमएल से जुड़ी ख़बरों की तलाश में लाहौर गई, तो मुझे उनके अभियान और संगठन के स्तर को देखकर ताज्जुब हुआ. वो आसानी से राजनीति की मुख्यधारा से जुड़ी पार्टियों से मेल खाती दिखीं.

देश के चुनाव आयोग के साथ मिल्ली मुस्लिम लीग के पंजीकरण का अनुरोध अब भी लंबित था. क़ानून के तहत सभी राजनीतिक दलों को राजनीति में भाग लेने के योग्य होने के लिए चुनाव आयोग में पंजीकरण करवाना अनिवार्य है.

लेकिन इस मामले में, चुनाव आयोग में पंजीकरण का अनुरोध लंबित होना भी एमएमएल को अप्रत्यक्ष रूप से चुनाव लड़ने से रोक नहीं सका. उनके उम्मीदवार निर्दलीय के रूप में चुनाव में उतरे और एमएमएल का उन्हें आधिकारिक रूप से समर्थन प्राप्त था.

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पाकिस्तान में क्यों छिड़ी बहस?

और लाहौर चुनाव में केवल एमएमएल की मौजूदगी और मैदान में दिखने की ही वजह नहीं थी, जिससे अंतरराष्ट्रीय मीडिया की निगाहें इस पर गईं, एक और कट्टरपंथी इस्लामिक पार्टी तहरीक-ए-लब्बैक समर्थित उम्मीदवार पर भी सवाल उठाए गए, क्योंकि इस पार्टी पर पंजाब के पूर्व गवर्नर सलमान तासीर की हत्या कराने का आरोप है.

लाहौर के चुनाव से पाकिस्तान के भीतर एक बहस शुरू हो गई. एमएमएल और टीएलपी जैसे प्रतिबंधित गुटों को मुख्यधारा की राजनीति में लाने की देश के शक्तिशाली सैन्य प्रतिष्ठान की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है.

सेना के रिटायर्ड जनरल अमजद शोएब इस बहस के केंद्र में हैं. वो कहते हैं कि वो देश की सुरक्षा संस्थान द्वारा चरमपंथी गुटों को दिए गए एक प्रस्ताव के विषय में जानते हैं, जिसे पिछले साल अप्रैल में राष्ट्रीय आतंक विरोधी प्राधिकरण की बैठक में प्रस्तुत किया गया था.

जनरल ने बीबीसी से कहा कि सैन्य संस्थान सरकार को उन हज़ारों लोगों से निपटने के लिए अन्य सुझावों और प्रस्तावों के साथ आने को कहा जो प्रतिबंधित और नज़र रखे जा रहे समूहों के सदस्य हैं, लेकिन जिन्होंने कोई अपराध नहीं किया है.

रिटायर्ड लेफ़्टिनेंट जनरल अमजद शोएब ने कहा कि राजनीतिक मुख्यधारा से जोड़ना केवल एक सुझाव था.

उन्होंने कहा, "यह सरकार की ज़िम्मेदारी थी कि वो इस मुद्दे पर बहस करे और अन्य समाधान निकाले जो उसने किया नहीं."

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एमएमएल समर्थित उम्मीदवार को 10 फ़ीसदी वोट

लाहौर उपचुनाव ने राजनीतिक पंडितों को चौंका दिया है. एमएमएल और तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान को 10 फ़ीसदी वोट मिले, चुनाव में किसी नई पार्टी को ऐसा समर्थन मिलेगा इसकी उम्मीद नहीं की गई थी.

विश्लेषकों का कहना है कि इसका मतलब है कि कट्टरपंथी समूहों की ताक़त और उनके प्रति समर्थन बढ़ रहा है. उन्हें यह भी डर है कि राजनीति में प्रवेश की इजाज़त देकर उन्हें और अधिक मज़बूत बना दिया जाएगा.

लेकिन एक सैन्य प्रवक्ता ने एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस के दौरान इन आरोपों को सिरे से ख़ारिज कर दिया कि सेना इस तरह के सुझावों को समर्थन दे रही है.

मेजर जनरल आसिफ़ गफ़ूर ने कहा, "यह सरकार का विशेषाधिकार है और सरकार ही यह तय करेगी लेकिन प्रत्येक नागरिक को क़ानून के तहत राजनीतिक गतिविधियों से जुड़ने का अधिकार प्राप्त है."

कुछ दिनों बाद, चुनाव आयोग ने एमएमएल की राजनीतिक पार्टी के रूप में रजिस्ट्रेशन के अनुरोध को अस्वीकार कर दिया.

लेकिन इसने एमएमएल को पेशावर में होने वाले उपचुनाव में एक निर्दलीय उम्मीदवार को समर्थन देने से नहीं रोका. हाजी लियाकत अली एक स्थानीय व्यापारी हैं. वो खुल कर एमएमएल को समर्थन देते हैं.

उन्होंने बीबीसी से कहा, "मिल्ली मुस्लिम लीग अदालत में चुनाव आयोग के फ़ैसले को चुनौती देगी. मुझे उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट एमएमएल के पक्ष में निर्णय देगा."

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"एमएमएल को राजनीति में आने से रोका नहीं जा सकता"

लेकिन विश्लेषक आमिर राणा उलझन में हैं. वो मानते हैं कि अदालत हाफ़िज़ सईद के विचारों पर बनी पार्टी को पाकिस्तान में आधिकारिक तौर पर चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं देगी, हालांकि उनका यह भी मानना है कि वो एमएमएल को राजनीति में शामिल होने से रोक नहीं सकती.

वो कहते हैं, "जब हम यह पूछते हैं कि उनकी (चरमपंथी गुटों की) गतिविधियों पर पूरी तरह प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया जा रहा तो हमें प्रशासन से कोई जवाब नहीं मिलता. कोई पॉलिसी नहीं है और यही समस्या है."

आमिर राणा इसकी भी आलोचना करते हैं कि यह बहस कैसे तैयार की गई.

वो कहते हैं, "एक समूह इसे बड़े पैमाने पर पुनर्गठन के प्रयास के रूप में प्रोजेक्ट करने की कोशिश कर रहा था, जबकि मामला यह नहीं था. इससे सिर्फ़ लश्कर-ए-तैयबा और जमात-उद-दावा प्रभावित हुए हैं क्योंकि वो अस्तित्व में बने रहने की जद्दोजहद कर रहे हैं. इस तरह का कोई प्रस्ताव कभी विचाराधीन नहीं था."

लेकिन लेफ़्टिनेंट जनरल अमजद शोएब जोर देकर कहते हैं कि इन समूहों को बनाए रखना चाहिए.

वो कहते हैं, "यदि कोई और योजना है जो देश को अधिक उपयुक्त लगता है तो इसका स्वागत है. लेकिन उन्हें आज की स्थिति में छोड़ देना सही नहीं है."

पाकिस्तान को एक कठिन चुनौती का सामना करना पड़ रहा है. चरमपंथी संगठनों को मुख्यधारा में लाना उन्हें शक्तिशाली बना सकता है और देश को हिंसा के रास्ते पर और आगे ले जा सकता है लेकिन उन्हें मिटा देने की कोशिश या नज़रअंदाज करने से और अधिक समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं.

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