जोसेफ़ स्टालिन: इंक़लाबी राजनीति से 'क्रूर तानाशाह' बनने का सफ़र

  • 10 नवंबर 2017
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सोवियत संघ के शासक जोसेफ़ स्टालिन को कभी कम्युनिस्टों का आदर्श माना जाता था. वो सोवियत संघ के बहुत बड़े हीरो थे. मगर, क्या वो वाक़ई ऐसे थे? या फिर उन्हें आज नरसंहार करने वाले नेता के तौर पर याद किया जाए?

उनकी ज़िंदगी पर नज़र डालें, तो लगता है कि स्टालिन हीरो भी थे और विलेन भी.

स्टालिन के नाम का मतलब होता है लौह पुरुष. स्टालिन ने जिस तरह की ज़िंदगी जी, उससे ये लगता है कि उन्होंने अपना नाम सार्थक किया. उन्होंने रूस को इतना ताक़तवर बनाया कि उसने हिटलर की जर्मन सेना को दूसरे विश्व युद्ध में मात दी. वो क़रीब एक चौथाई सदी तक सोवियत संघ के सबसे बड़े नेता रहे.

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लेकिन ये भी कहा जाता है कि स्टालिन के राज में ज़ुल्मो-सितम की भी इंतेहा हुई. उनकी नीतियों और फ़रमानों की वजह से कथित तौर पर दसियों लाख लोग मारे गए. एक दौर में दुनिया के सबसे ताक़तवर नेता रहे स्टालिन की ज़िंदगी एक मामूली से परिवार से शुरू हुई थी.

बेहद मामूली परिवार से थे स्टालिन

स्टालिन की पैदाइश 18 दिसंबर 1879 में जॉर्जिया के गोरी में हुई थी. उनके बचपन का नाम था, जोसेफ़ विसारियोनोविच ज़ुगाशविली. उस वक़्त जॉर्जिया रूस के बादशाह ज़ार के साम्राज्य का हिस्सा था.

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स्टालिन के पिता पेशे से एक मोची थे. मां कपड़े धोने का काम करती थी. सात बरस की उम्र में स्टालिन को चेचक की बीमारी हो गई. जिससे उनके चेहरे पर दाग़ पड़ गए. इस बीमारी की वजह से उनके बाएं हाथ में भी ख़राबी आ गई थी.

बचपन में स्टालिन बहुत कमज़ोर थे. दूसरे बच्चे उन्हें बहुत तंग किया करते थे. उनके पिता शराबी थे और अक्सर स्टालिन को पीटा करते थे. जब स्टालिन बड़े हो रहे थे, तो जॉर्जिया में ज़ार के ख़िलाफ़ बग़ावत की चिंगारी सुलग रही थी. वो जॉर्जिया की लोककथाओं और रूस विरोधी विचारों से काफ़ी प्रभावित हुए.

स्टालिन का पादरी बनने से इनकार

स्टालिन की मां धार्मिक ख़्यालात वाली थीं. उन्होंने 1895 में स्टालिन को पादरी बनने की पढ़ाई करने के लिए जॉर्जिया की राजधानी तिफ़्लिस भेजा. लेकिन स्टालिन को धार्मिक क़िताबों में ज़रा भी दिलचस्पी नहीं थी. वो छुप-छुपकर कार्ल मार्क्स की क़िताबें पढ़ा करते थे.

स्टालिन ने उन दिनों एक समाजवादी विचारधारा वाले संगठन की सदस्यता भी ले ली थी. ये संगठन रूस के बादशाह के ख़िलाफ़ लोगों को एकजुट करता था.

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मां की ख़्वाहिश के ख़िलाफ़ जाकर स्टालिन ने पादरी बनने से साफ़ इनकार कर दिया. 1899 में उन्हें धार्मिक स्कूल से बाहर कर दिया गया.

एक बाग़ी

बीसवीं सदी की शुरुआत में स्टालिन ने तिफ़्लिस के मौसम विभाग में काम करना शुरू कर दिया था. इस दौरान वो लगातार रूसी साम्राज्य के ख़िलाफ़ बाग़ी तेवर अपनाए हुए थे. स्टालिन अक्सर हड़ताल और विरोध प्रदर्शन आयोजित किया करते थे.

ज़ार की ख़ुफ़िया पुलिस को स्टालिन की हरकतों का अंदाज़ा हो चुका था. मजबूरन उन्हें भूमिगत होना पड़ा. तब स्टालिन बोल्शेविक पार्टी में शामिल हो गए. 1905 में स्टालिन ने पहली बार रूसी साम्राज्य के ख़िलाफ़ गुरिल्ला युद्ध में हिस्सा लिया.

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रूस में बोल्शेविक क्रांति के अगुवा व्लादिमीर लेनिन से स्टालिन की पहली मुलाक़ात फ़िनलैंड में हुई थी. लेनिन उनकी प्रतिभा के क़ायल हो गए. 1907 में स्टालिन ने तिफ़्लिस में एक बैंक में डकैती डालकर ढाई लाख रूबल चुरा लिए. ये रक़म ज़ार विरोधी आंदोलन में काम आई.

लौह पुरुष स्टालिन

जोसेफ़ स्टालिन ने 1906 में पहला ब्याह केटेवान स्वानिज़े से किया. वो एक छोटे-मोटे सामंती परिवार से ताल्लुक़ रखती थीं. शादी के एक साल बाद स्टालिन के एक बेटा पैदा हुआ. तिफ़्लिस में बैंक डकैती के बाद स्टालिन को जॉर्जिया छोड़कर भागना पड़ा था. वो अज़रबैजान के बाकू शहर में जाकर रहने लगे.

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शादी के एक साल बाद ही 1907 में स्टालिन की पत्नी केटेवान का टाइफ़ाइड से निधन हो गया. इस बात से स्टालिन को ज़बरदस्त झटका लगा था. स्टालिन ने अपने बेटे को उसके नाना-नानी के पास छोड़कर ख़ुद को पूरी तरह से रूसी क्रांति के हवाले कर दिया. इसी दौरान उन्होंने अपना नाम बदलकर स्टालिन रख लिया.

बाग़ी तेवरों की वजह से स्टालिन को कई बार गिरफ़्तार किया गया. 1910 में उन्हें साइबेरिया भेज दिया गया था.

1917 में लेनिन की अगुवाई में रूस में कम्युनिस्ट क्रांति कामयाब हो गई. लेनिन ने लोगों से अमन, ज़मीन और रोटी का वादा किया. स्टालिन ने इस क्रांति में अहम रोल निभाया था. वो उस दौरान बोल्शेविक पार्टी का अख़बार प्रावदा चलाते थे.

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जब उन्होंने लेनिन को ज़ार की सेना से छुड़ाकर फ़िनलैंड भागने में मदद की, तो स्टालिन को पार्टी में बड़ा ओहदा दिया गया. ज़ार की हुकूमत ख़त्म होने के बाद रूस में गृह युद्ध छिड़ गया.

गृह युद्ध के दौरान स्टालिन ने पार्टी के भगोड़ों और बागियों को सरेआम सूली पर चढ़ाने का आदेश दिया. जब लेनिन सत्ता में आए तो उन्होंने स्टालिन को कम्युनिस्ट पार्टी का महासचिव नियुक्त किया.

जब स्टालिन बने रूस के तानाशाह

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1924 में लेनिन की मौत हो गई. इसके बाद स्टालिन ने ख़ुद को उनके वारिस के तौर पर पेश किया. हालांकि पार्टी के बहुत से नेता ये समझते थे कि लेनिन के बाद लियोन ट्राटस्की ही उनके वारिस होंगे. लेकिन ट्रॉटस्की को कई लोग बहुत आदर्शवादी मानते थे. उन्हें लगता था कि ट्रॉटस्की के सिद्धांतों को असल ज़िंदगी में लागू कर पाना बहुत मुश्किल है.

इस दौरान स्टालिन ने अपनी राष्ट्रवादी मार्क्सवादी विचारधारा का ज़ोर-शोर से प्रचार शुरू कर दिया. उन्होंने कहा कि उनका मक़सद सोवियत संघ को मज़बूत करना है, पूरी दुनिया में इंक़लाब लाना नहीं.

जब ट्रॉटस्की ने स्टालिन की योजनाओं का विरोध किया, तो स्टालिन ने उन्हें देश निकाला दे दिया. 1920 के दशक के आख़िर के आते-आते स्टालिन सोवियत संघ के तानाशाह बन चुके थे.

सोवियत संघ का औद्योगीकरण

बीस के दशक में ही स्टालिन ने पंचवर्षीय योजनाओं के ज़रिए देश की तरक़्क़ी के लिए काम करना शुरू कर दिया. वो सोवियत संघ को आधुनिक देश बनाने में जुट गए. स्टालिन को लगता था कि अगर सोवियत संघ में औद्योगीकरण नहीं हुआ, तो कम्युनिस्ट क्रांति नाकाम हो जाएगी. देश बर्बाद हो जाएगा. पड़ोस के पूंजीवादी देश उस पर क़ब्ज़ा कर लेंगे.

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स्टालिन के राज में सोवियत संघ में कोयले, तेल और स्टील का उत्पादन कई गुना बढ़ गया. देश ने तेज़ी से आर्थिक तरक़्क़ी की. स्टालिन ने अपनी योजनाओं को बहुत सख़्ती से लागू किया.

कारखानों को बड़े-बड़े टारगेट दिए जाते थे. कई बार तो ये टारगेट पूरे कर पाना नामुमकिन सा लगता था. जो लोग लक्ष्य हासिल करने में नाकाम रहते थे, उन्हें देश का दुश्मन कह कर जेल में डाल दिया जाता था.

रूस में भयंकर अकाल का दौर

जब स्टालिन सत्ता में आए तो रूस में ज़्यादातर ज़मीन छोटे-छोटे टुकड़ों के मालिकाना हक़ में बंटी हुई थी. अक्सर अकाल पड़ा करते थे. खेतों में बहुत कम अनाज होता था.

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स्टालिन ने खेती का आधुनिकीकरण शुरू किया. उन्होंने तमाम ज़मीन का राष्ट्रीयकरण कर दिया. बहुत से किसानों ने इसका विरोध किया. किसानों ने अपने जानवर मारकर और अनाज छुपाकर इसका विरोध किया. इसकी वजह से क़रीब पचास लाख लोग भुखमरी से मर गए.

इससे नाराज़ स्टालिन ने जमाखोरी करने वाले और उनकी नीतियों का विरोध करने वाले किसानों को मरवाना शुरू कर दिया. दसियों लाख लोग मारे गए. तीस के दशक का आख़िर आते-आते, सोवियत संघ में ज़मीन का पूरी तरह से राष्ट्रीयकरण हो गया था. अनाज का उत्पादन कई गुना बढ़ गया.

स्टालिन का आतंक

जोसेफ़ स्टालिन ख़ुद को एक नरमदिल और देशभक्त नेता के तौर पर प्रचारित करते थे. लेकिन, स्टालिन अक्सर उन लोगों को मरवा देते थे, जो भी उनका विरोध करता था. फिर चाहे वो सेना के लोग हों या फिर कम्युनिस्ट पार्टी के. आरोप तो ये भी है कि स्टालिन ने पार्टी की सेंट्रल कमेटी के 139 में से 93 लोगों को मरवा दिया था. इसके अलावा उन्होंने सेना के 103 जनरल और एडमिरल में से 81 को मरवा दिया था.

स्टालिन की ख़ुफ़िया पुलिस बड़ी सख़्ती से उनकी नीतियां लागू करती थी. साम्यवाद का विरोध करने वाले तीस लाख लोग साइबेरिया के गुलाग इलाक़े में रहने के लिए ज़बरदस्ती भेज दिए गए थे. इसके अलावा क़रीब साढ़े सात लाख लोगों को मरवा दिया गया था.

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Image caption जोसेफ़ स्टालिन की दूसरी पत्नी नदेज़्जा की तस्वीर

स्टालिन की दूसरी पत्नी और बेटे का निधन

1919 में जोसेफ़ स्टालिन ने नदेज़्दा एल्लीलुएवा से दूसरी शादी की. इस शादी से स्टालिन को एक बेटी स्वेतलाना और बेटा वैसिली हुआ. लेकिन स्टालिन अपनी दूसरी पत्नी से बहुत बदसलूक़ी करते थे.

उनकी दूसरी पत्नी नदेज़्दा ने 1932 में ख़ुदकुशी कर ली. हालांकि आधिकारिक तौर पर बताया गया कि उनकी मौत बीमारी की वजह से हुई.

दूसरे विश्व युद्ध के दौरान स्टालिन की पहली शादी से हुए बेटे याकोव को जर्मन सेना ने गिरफ़्तार कर लिया. जब जर्मनी ने बंदियों की अदला-बदली में याकोव को रूस को सौंपने का प्रस्ताव किया, तो स्टालिन ने ये प्रस्ताव ठुकरा दिया. जर्मनी के युद्धबंदी कैंप में ही स्टालिन के बेटे याकोव की 1943 में मौत हो गई थी.

हिटलर से समझौता

जब दूसरा विश्व युद्ध शुरू हुआ, तो स्टालिन ने जर्मनी के तानाशाह हिटलर के साथ समझौता करके पूर्वी यूरोप के देशों का आपस में बंटवारा कर लिया.

जर्मनी की सेना ने बड़ी आसानी से फ्रांस पर क़ब्ज़ा कर लिया. ब्रिटेन को भी पीछे हटना पड़ा. इस दौरान रूसी सेना के जनरलों ने स्टालिन को आगाह किया कि जर्मनी, सोवियत संघ पर भी हमला कर सकता है. लेकिन स्टालिन ने अपने फौजी कमांडरों की चेतावनी अनसुनी कर दी.

1941 में जर्मनी ने पोलैंड पर क़ब्ज़ा कर लिया और सोवियत संघ पर भी ज़बरदस्त हमला किया. सोवियत सेनाओं को भारी नुक़सान उठाना पड़ा.

हिटलर के धोखे से स्टालिन इस क़दर ग़ुस्सा हो गए कि वो कोई फ़ैसला नहीं ले पा रहे थे. स्टालिन ने ख़ुद को एक कमरे में क़ैद कर लिया. कई दिनों तक सोवियत संघ की सरकार दिशाहीन रही. इस दौरान हिटलर की सेनाएं राजधानी मॉस्को तक आ पहुंचीं.

जब स्टालिन ने हिटलर को शिकस्त दे दी

जर्मनी के लगातार हमलों से सोवियत संघ का बुरा हाल था. देश तबाही के कगार पर खड़ा था. लेकिन, स्टालिन नाज़ी सेना पर जीत के लिए अपने देश के लाखों लोगों को क़ुर्बान करने के लिए तैयार थे.

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दिसंबर 1941 में जर्मन सेनाएं रूस की राजधानी मॉस्को के बेहद क़रीब पहुंच गईं. सलाहकारों ने स्टालिन को मॉस्को छोड़ने की सलाह दी. मगर स्टालिन ने इससे साफ़ इनकार कर दिया. उन्होंने अपने कमांडरों को फ़रमान जारी किया कि उन्हें नाज़ी सेनाओं को किसी भी क़ीमत पर हराना होगा.

जर्मनी और रूस के बीच जंग में स्टालिनग्राड की लड़ाई से निर्णायक मोड़ आया. हिटलर ने इस शहर पर इसलिए हमला किया क्योंकि इसका नाम स्टालिन के नाम पर था. वो स्टालिनग्राड को जीतकर स्टालिन को शर्मिंदा करना चाहता था. लेकिन स्टालिन ने अपनी सेनाओं से कहा कि वो एक भी क़दम पीछे नहीं हटेंगी.

स्टालिनग्राड के युद्ध में रूसी सेना के दस लाख से ज़्यादा सैनिक मारे गए. लेकिन आख़िर में सोवियत सेनाओं ने जर्मनी को मात दे दी. इसके बाद तो सोवियत संघ ने हिटलर की सेनाओं को वापस जर्मनी की तरफ़ लौटने को मजबूर कर दिया. सोवियत सेनाएं, जर्मनी को खदेड़ते हुए राजधानी बर्लिन तक जा पहुंचीं.

लोहे के पर्दे की ज़द में यूरोप

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Image caption जोसेफ़ स्टालिन इस तस्वीर में विंस्टन चर्चिल के साथ नज़र आ रहे हैं

दूसरे विश्व युद्ध में जर्मनी को हराने में स्टालिन ने बहुत अहम भूमिका निभाई थी. युद्ध के बाद पूर्वी यूरोप के एक बड़े हिस्से पर सोवियत सेनाओं ने क़ब्ज़ा कर लिया. उन्होंने जर्मनी की राजधानी बर्लिन के पूर्वी हिस्से पर भी क़ब्ज़ा कर लिया.

स्टालिन ने कहा कि ये सभी देश सोवियत संघ के अंगूठे तले रहेंगे. दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अमरीका और ब्रिटेन, स्टालिन के साथ थे. मगर युद्ध के बाद स्टालिन की नीतियों के चलते वो उसके दुश्मन बन गए. ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने कहा कि स्टालिन यूरोप के एक बड़े हिस्से को लोहे के पर्दे से बंद कर रहे हैं.

बर्लिन को लेकर ब्रिटेन-अमरीका और सोवियत संघ के बीच तनातनी इस क़दर बढ़ गई कि स्टालिन ने पूर्वी बर्लिन में अमरीकी और ब्रिटिश सेनाओं के घुसने पर रोक लगा दी. अमरीका ने पूर्वी बर्लिन में फंसे लोगों को 11 महीने तक हवाई रूट से मदद पहुंचाई.

शीत युद्ध का आग़ाज़ हो चुका था. सोवियत संघ ने 29 अगस्त 1949 को अपने पहले एटम बम का परीक्षण किया.

एक युग का अंत

अपने आख़िरी दिनों में स्टालिन बहुत शक्की हो गए थे. वो पार्टी में कई लोगों को अपना दुश्मन मानने लगे थे. ऐसे हर शख़्स को वो मरवा दिया करते थे.

5 मार्च 1953 को दिल का दौरा पड़ने से स्टालिन का निधन हो गया. सोवियत संघ में बहुत से लोगों ने उनकी मौत पर मातम मनाया. उन्हें महान नेता बताया, जिसने देश को एक नई ऊंचाई पर पहुंचाया था. जिसने हिटलर को हराने में अहम भूमिका निभाई.

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लेकिन सोवियत संघ में ही लाखों लोग ऐसे भी थे, जिन्होंने स्टालिन की मौत का जश्न भी मनाया. स्टालिन के बाद सोवियत संघ के नेता बने निकिता ख्रुश्चेव ने स्टालिन की नीतियों से किनारा कर लिया.

कुल मिलाकर स्टालिन की ज़िंदगी एक ऐसे शख़्स की रही, जिसने शुरुआत तो इंक़लाब से की थी. मगर बाद में वो सनकी तानाशाह बन गए. यानी वो हीरो भी थे और विलेन भी.

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