सऊदी अरब और ईरान क्यों हैं दुश्मन?

  • 18 नवंबर 2017
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सऊदी अरब और ईरान आमने-सामने हैं. ये दोनों देश लंबे समय से एक दूसरे के विरोधी रहे हैं लेकिन पिछले कुछ दिनों में हालात और गंभीर हो गए हैं.

सऊदी अरब और ईरान दोनों ही ताक़तवर पड़ोसी हैं और क्षेत्रीय प्रभुत्व के लिए लड़ रहे हैं.

दशकों पुराने इस विवाद के पीछे का कारण धार्मिक मतभेद है. दोनों इस्लाम के अलग-अलग पंथ को मानते हैं. ईरान में ज़्यादातर शिया मुसलमान हैं, वहीं सऊदी अरब ख़ुद को एक सुन्नी मुस्लिम शक्ति की तरह देखता है.

ये धार्मिक फूट दूसरे खाड़ी देशों में भी दिखती है जहां सुन्नी और शिया मुसलमान हैं. कुछ देश समर्थन के लिए ईरान की तरफ़ देखते हैं और कुछ सऊदी अरब की तरफ़.

ऐतिहासिक रूप से सऊदी अरब अपने आप को मुस्लिम दुनिया का नेता मानता रहा है. लेकिन साल 1979 में ईरान में इस्लामिक क्रांति ने इसे चैलेंज किया.

इसने इस क्षेत्र में एक नए प्रकार के राज्य का निर्माण किया- एक धर्मतंत्र. इस मॉडल को सीमाओं से आगे फैलाने का लक्ष्य था.

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पिछले 15 सालों में ईरान और सऊदी अरब के बीच दूरियां और बढ़ीं हैं. 2003 में अमरीका की अगुवाई में सद्दाम हुसैन को गद्दी से हटा दिया गया जो कि ईरान का विरोधी था.

इसने इराक़ के मुक़ाबले में एक बड़ी सैन्य ताक़त को हटा दिया, जो कि उस समय बढ़ रहा था.

साल 2011 में अरब जगत के कई हिस्सों में आंदोलन हुए जिसके कारण राजनीतिक अस्थिरता पैदा हो गई. ईरान और सऊदी अरब ने इस मौके का फ़ायदा अपना प्रभाव सीरिया, बहरीन और यमन जैसे देशों में बढ़ाने के लिए किया.

ईरान के आलोचकों का मानना है कि यह पूरे क्षेत्र में खुद या अपने साथियों का वर्चस्व इस इलाक़े में बढ़ाना चाहता है. वो भूमध्य सागर तक फैले भूमि पर नियंत्रण हासिल करना चाहता है.

अचानक चीज़ें ख़राब क्यों हो गईं?

ये झगड़ा बढ़ता जा रहा है क्योंकि कई मायनों में ईरान ये क्षेत्रीय लड़ाई जीत रहा है. सीरिया में ईरान और रूस ने राष्ट्रपति बशर-अल-असद को समर्थन दिया जिससे सऊदी के समर्थन वाले विद्रोही गुटों को हटाने में कामयाबी मिली है.

सऊदी अरब अपने देश में ईरान के प्रभाव को कम करने की पूरी कोशिश कर रहा है. सऊदी अरब के क्राऊन प्रिंस यमन के ख़िलाफ़ जंग छेड़ दी है ताकि ईरान का प्रभाव कम हो सके लेकिन ये तीन साल के बाद ये उन्हें बहुत महंगा पड़ रहा है.

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उधर लेबनान में कई लोगों का मानना है कि वहां के प्रधानमंत्री ने सऊदी अरब के दबाव में इस्तीफ़ा दिया है ताकि देश अस्थिरता आ सके जहां शिया हिज़्बुल्ला एक बड़े राजनीतिक ब्लॉक की अगुवाई करता है और एक उसके पास हथियारों से लैस एक बड़ी सेना है.

कुछ बाहरी ताक़तों का भी इसमें योगदान है. सऊदी अरब को डोनल्ड ट्रंप का समर्थन है. इसराइल, जो ईरान को ख़तरे के रूप में देखता है, वो ईरान को रोकने के लिए सऊदी के प्रयासों का समर्थन कर रहा है.

इसराइल को सीरिया बार्डर के पास कब्ज़ा जमाए हुए ईरान समर्थक लड़ाकों से डर है.

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इसराइल और सऊदी अरब दोनों देशों ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने वाले 2015 अंतर्राष्ट्रीय समझौते का विरोध किया था और कहा था कि यह ईरान को बम प्राप्त करने से रोकने के लिए क़दम पर्याप्त नहीं थे.

इनके क्षेत्रीय समर्थक कौन हैं.

सऊदी के कैंप में सुन्नी देश हैं जैसे कि यूएई, कुवैत और बहरीन. मिस्र और जॉर्डन भी इसके लिए खड़े हैं.

ईरान के समर्थन में सीरिया की सरकार है जिसे ईरान के अलावा शिया लड़ाकू गुटों का भी समर्थन हासिल है, इसमें हिज़्बुल्ला भी शामिल है जो सुन्नी विद्रोहियों से लड़ते आए हैं.

शिया आबादी वाली इराक सरकार भी ईरान के साथ है. लेकिन उसका अमरीका से भी ख़ास रिश्ता है जिसकी मदद से उसने आईएस से लड़ाई की है.

सऊदी अरब और ईरान का विवाद कैसा है?

ईरान और सऊदी अरब सीधे नहीं लड़ते लेकिन ये प्रॉक्सी वॉर कर रहें हैं. सीरिया इसका उदाहरण है जिसने आरोप लगाया है कि ईरान हूथी विद्रोहियों को मिसाइल सप्लाई किया जो सऊदी के कुछ इलाक़ों में दागी गई थीं.

लेकिन यमन में पिछड़ जाने औऱ सीरिया में हार के बाद सऊदी अरब की निगाहें अब लेबनान के प्रॉक्सी लड़ाई के मैदान पर है.

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क्या ईरान और सऊदी अरब के बीच युद्ध छिड़ सकता है

अभी तक तेहरान और रियाद प्रॉक्सी वॉर करते आए हैं, दोनों में से कोई भी सीधी लड़ाई के लिए तैयार नहीं है. लेकिन सऊदी अरब की राजधानी पर यमन अगर एक भी रॉकेट गिराता है तो समीकरण बदल सकता है.

खाड़ी के पानी में दोनों देशों में सीधा संघर्ष हो सकता है. लेकिन यहां भी ख़तरा हो सकता है क्योंकि अमरीका और अन्य पश्चिमी शक्तियों के लिए, खाड़ी में नेविगेशन की आज़ादी आवश्यक है.

लंबे समय से अमरीका और उसके सहयोगियों ने ईरान को मध्य पूर्व में एक अस्थिरता फैलाने वाले देश की तरह देखा है. सऊदी अरब भी ईरान को एक ख़तरे की तरह देख रहा है और क्राउन प्रिंस जो भी कार्रवाई ज़रूरी हो, वो लेना चाहते हैं

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