रॉबर्ट मुगाबे: ज़िम्बाब्वे के नायक या खलनायक?

  • 22 नवंबर 2017
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Image caption हरारे की सड़कों पर मुगाबे के इस्तीफ़े के बाद उतर हज़ारों लोग

ज़िंम्बाब्वे की संसद के स्पीकर ने घोषणा की है कि रॉबर्ट मुगाबे ने राष्ट्रपति पद से इस्तीफ़ा दे दिया.

अचानक आए इस्तीफ़े के बाद उनके ख़िलाफ़ शुरू की गई महाभियोग की कार्यवाही को स्थगित कर दिया गया है.

मुगाबे के फ़ैसले के बाद देश भर में लाखों लोग सड़कों पर उतर आए हैं.

हरारे की सड़कों पर लोग सैनिकों के साथ तस्वीरें ख़िचवाते और नारे लगाते देखे जा रहे हैं.

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मुगाबे का ज़िम्बाब्वे

बीते 37 वर्षों से रॉबर्ट मुगाबे और ज़िम्बाब्वे एक-दूसरे का पर्याय रहे हैं. कुछ लोगों के लिए तो मुगाबे तमाम विवादों के बावजूद एक हीरो हैं जिन्होंने देश को आज़ादी दिलाई.

यहां तक कि उन्हें सत्ता से हटाने वालों ने भी मुगाबे से ज़्यादा उनकी पत्नी और उनके आस-पास के कथित अपराधियों पर ही इल्ज़ाम लगाए.

लेकिन उनके अलोचकों की संख्या बीते कुछ वर्षों से लगातार बढ़ती रही है. वे उन्हें सत्ता में बने रहने के लिए हर तिकड़म अपनाने वाले एक अफ़्रीकी तानाशाह लगते थे जिन्होंने अपनी कुर्सी बचाने के लिए पूरे देश को तबाह कर दिया.

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Image caption सेना के साथ तस्वीरें ख़िंचवाते लोग

सेना नाख़ुश

आख़िर में वही फ़ौज मुगाबे के ख़िलाफ़ हो गई जिसके सहारे उन्होंने वर्षों तक विपक्ष और विरोधियों पर नकेल कस रखी थी.

सेना इस बात से नाख़ुश थी कि मुगाबे ने लंबे समय से सहयोगी रहे इमर्सन मनांगाग्वा को उप राष्ट्रपति पद से बर्ख़ास्त कर दिया. सुरक्षा बलों को शायद ये भी शक था कि मुगाबे अपनी पत्नी ग्रेस को ये पद सौंपना चाहते थे.

अपने जीवन में कई संकटों से उभरकर सत्ता में बने रहने वाले मुगाबे के लिए 93 साल की उम्र में अपने पुराने सहयोगियों का सहयोग बरक़रार रख पाना अंसभव होता जा रहा था.

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'सिर्फ़ ईश्वर हटा सकता है...'

साल 2008 के चुनाव से पहले मुगाबे ने कहा था, "अगर आप चुनाव हारें तो आपको राजनीति से तौबा कर लेनी चाहिए."

लेकिन मॉर्गन त्सवानगिराई से हारने के बाद वो अपने बयान मुकरे ही नहीं बल्कि ये कहा कि उन्हें सिर्फ़ ईश्वर ही सत्ता से हटा सकता है.

मुगाबे को समझने के लिए ज़िम्बाब्वे में 1970 के दशक में चले छापामार युद्ध को समझना पड़ेगा.

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Image caption साल 1960 की इस तस्वीर में सबसे बाईं और बैठे है रॉबर्ट मुगाबे

आर्थिक मुद्दों की समझ पर सवाल

37 साल तक सत्ता में बने रहने के बाद भी मुगाबे का दुनिया के प्रति नज़रिया क़रीब वैसा ही था जैसा कि 1970 के दशक में.

उन्हें लगता था कि उनकी सोशलिस्ट पार्टी ज़ानू-पीएफ़, अब भी पूंजीवाद और उपनिवेशवाद से लड़ रही है.

हर आलोचक को तुरंत गद्दार और बिका हुआ घोषित कर दिया जाता था. ठीक वैसे ही जैसा कि छापामार युद्ध के दौरान होता था.

वो ज़िम्बाब्वे के माली हालत के लिए हमेशा ही पश्चिमी ताक़तों को ज़िम्मेदार ठहराते थे.

लेकिन उनके आलोचकों का कहना था कि मुगाबे को इस बात की समझ ही नहीं है कि एक आधुनिक अर्थव्यवस्था को कैसे चलाया जाता है.

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सालाना मंहगाई दर 23 करोड़ प्रतिशत

मुगाबे हमेशा केक को शेयर करने की बात करते थे. केक कैसे बनाए जाएं इस पर बात नहीं होती थी.

मुगाबे ने एक बार कहा था कि उनका देश कभी भी दिवालिया नहीं हो सकता. जुलाई 2008 में जब सालाना मंहगाई दर 23 करोड़ प्रतिशत बढ़ गई, तो लगा कि जैसे वो अपने सिंद्धात को टेस्ट करना चाहते हैं.

साल 2000 में अपने सियासी करियर में उन्होंने पहली बार एक मज़बूत विपक्ष का सामना किया. इस चुनौती से लड़ने के लिए उन्होंने अफ़्रीका की एक मज़बूत अर्थव्यवस्था को सियासी नियंत्रण के लिए इस्तेमाल किया.

उन्होंने अर्थव्यवस्था की रीढ़ समझे जाने वाले गोरे लोगों के फ़ार्म्स को सरकारी कब्ज़े में ले लिया.

ये एक लोकप्रिय क़दम साबित हुआ. वो सत्ता में तो बने रहे लेकिन अर्थव्यवस्था पटरी से उतर गई.

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सेना और मीडिया का इस्तेमाल

साल 2000 के जनमत संग्रह में मिली हार हो या 2008 में राष्ट्रपति चुनावों के पहले चरण में हार हो... मुगाबे ने हर बार सुरक्षा बलों और सरकारी मीडिया का अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल किया.

अपने सियासी विरोधियों के प्रति मुगाबे के रवैये की झलक 1980 के दशक में ही मिलने लगी थी. तब उन्होंने उत्तरी कोरिया में प्रशिक्षित सेना की एक ब्रिगेड को अपने विरोधी जोशुआ एनकोमो के इलाके में भेज दिया था.

जब तक एनकोमो मुगाबे की शर्तें मानते, हज़ारों नागरिकों की मौत हो चुकी थी.

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अफ़्रीका में सबसे अधिक सारक्षता

लेकिन मुगाबे के राज में ज़िम्बाब्वे में शिक्षा का ख़ूब प्रसार हुआ. इस वक्त देश की 89 फीसद आबादी साक्षर है जो कि किसी भी अफ़्रीकी देश से अधिक है.

एक कमेंटेटर कहा था कि शिक्षा का प्रसार कर मुगाबे ख़ुद अपनी कब्र खोद रहे हैं.

मुगाबे अक्सर ये कहते थे कि वो देश के गरीबों के हक़ के लिए लड़ रहे हैं. लेकिन उन्होंने जो बड़े ज़मींदारों से ज़मीनें ज़ब्त की वो उनके करीबियों हाथ लगीं.

आर्चबिशप डेसमंड टूटू ने एक बार कहा था कि ज़िम्बाब्वे के राष्ट्रपति एक कार्टून बनकर रह गए हैं.

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Image caption ये तस्वीर 19 नंवबर की है जब मुगाबे सेना के अधिकारियों से मिलने के बाद टीवी पर भाषण देने आए थे

निष्ठावान कैथोलिक

मुगाबे निष्ठावान कैथोलिक हैं. और इसका अहसास कई बार हरारे कैथोलिक कैथिडरल में संडे मास के लिए आने वालों को हो चुका है. क्योंकि जब भी वो वहां आते, दल-बल के साथ आते.

लेकिन उनका धर्म तब उनके आड़े नहीं आया जब वो कैंसर से पीड़ित पहली पत्नी के ज़िंदा रहते, ग्रेस के दो बच्चों के बाप बने.

उनकी यही दूसरी पत्नी ग्रेस उनके पतन का कारण बनीं.

साल 2011 में विकीलीक्स के ज़रिए सामने आए एक अमरीकी दस्तावेज़ के मुताबिक उन्हें प्रोस्टेट कैंसर है.

लेकिन वो देखने में तो स्वस्थ लगते हैं.

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योग और शाकाहारी भोजन

उनकी पत्नी ग्रेस ने एक बार कहा था कि मुगाबे रोज़ सुबह पांच बजे उठकर योग समेत कई कसरतें करते हैं. वो शराब या कॉफ़ी नहीं पीते और लगभग शाकाहारी हैं.

जब ग्रेस ने अपने तीसरी संतान को जन्म दिया था तो मुगाबे 73 वर्ष के थे. वो अक्सर कहते थे कि वो तभी सत्ता छोड़ेंगे जब क्रांति सम्पूर्ण हो जाएगी. उनका इशारा गोरे ज़मींदारों से ली गई ज़मीनों को ग़रीबों में बांटने की ओर था. साथ ही वो अपनी पार्टी के भीतर से ही अपना उत्तराधिकारी चुनना चाहते थे.

डिडिमस मुटासा मुगाबे के साथ कई दशकों तक रहे. उन्होंने एक बार बीबीसी को बताया था कि ज़िम्बाब्वे में राजा तभी बदला जाता है जब उसकी मौत हो जाए. और मुगाबे उनका राजा है. लेकिन उनके निकट सहयोगी भी ये नहीं चाहते थे कि ज़िम्बाब्वे एक राजशाही बन जाए.

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