नेपाल में चुनाव स्थिरता के साथ शांति भी ला पाएंगे?

  • 9 दिसंबर 2017
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राजशाही के अंत और गृहयुद्ध ख़त्म होने के बाद नेपाल में पहली बार आम चुनाव हुए.

दो चरणों में हो रहे चुनाव में संघीय संसद की 275 सीटों और सात प्रांतीय सभाओं के लिए 550 सदस्यों को चुना जाना है.

पिछले 27 साल से नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता का दौर बन रहा है. इस दौरान कई सरकारें बनीं और गिरीं, कई प्रधानमंत्री बने मगर किसी को भी कार्यकाल पूरा करने का मौका नहीं मिला. पिछले 11 सालों में नेपाल 10 प्रधानमंत्री देख चुका है.

इस राजनीतिक अस्थिरता का नेपाल को बहुत नुकसान उठाना पड़ा है. देश के विकास की रफ़्तार मंद हो गई है. मगर अब नया संविधान बनने के बाद पहली बार हो रहे चुनावों से लोगों को उम्मीद है कि अबकी बार पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनेगी जो स्थिरता लाएगी. और शायद यही उम्मीद कड़ाके की ठंड के बावजूद लोगों में चुनाव को लेकर उत्साह देखने को मिला.

चुनाव मैदान में उतरे राजनेता भी देश को स्थिर सरकार देने का वादा कर रहे हैं. फिर चाहे वाम गठबंधन हो या फिर लोकतांत्रिक गठबंधन.

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राजनीतिक स्थिरता का वादा

वाम गठबंधन के मुख्य दल- कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ नेपाल (एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी) के नेता ईश्वर पोखरेल कहते हैं, "राजनीतिक अस्थिरता के कारण हमारी आर्थिक प्रगति बाधित हुई है. सामाजिक और सांस्कृतिक एकजुटता विघटित हो रही है. जनता के काम नहीं हो रहे, अच्छा शासन नहीं मिल पा रहा. ऐसा इसलिए है क्योंकि राजनीतिक नेतृत्व सरकार बनाने, गिराने और सरकार में बने रहने के चक्कर में रहता है. इसलिए हम राजनीतिक स्थिरता चाहते हैं."

यह पहला मौका है जब सभी वामपंथी दल मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं. उनका सीधा मुकाबला लोकतांत्रिक गठबंधन से है, जिसकी मुख्य घटक नेपाली कांग्रेस मानती है कि चुनाव प्रणाली में खोट भी कहीं न कहीं अस्थिरता के लिए जिम्मेदार है.

नेपाली कांग्रेस के सूचना अधिकारी केशव रिजाल कहते हैं, "नेपाल के इलेक्शन सिस्टम में ही दिक्कत है. इसके कारण पहले एक ही राजनीतिक दल का राजनीतिक बहुमत नहीं आया. इस बार इलेक्शन सिस्टम तो वही है, मगर हमारी पार्टी सरकार बनाएगी."

स्थिरता के साथ 'शांति' भी ज़रूरी

राजनीतिक पार्टियां तो कई मुद्दों को लेकर चुनाव लड़ रही हैं और एक-दूसरे पर आरोपों का सिलसिला भी जारी है. मगर सरकार जिसकी भी बनेगी, उसके सामने बिजली, पानी, स्वास्थ्य सुविधाओं और नौकरियों की व्यवस्था करने की चुनौती होगी. साथ ही उसे देश के नए संविधान को लेकर पैदा हुए संकट को भी दूर करना होगा.

नेपाल के तराई-मधेस इलाके में नए संविधान को लेकर असंतोष बना हुआ है. ऐसे में नई सरकार को देश में शांति भी बनानी होगी और यह काम आसान नहीं है. वरिष्ठ नेपाली पत्रकार सीके लाल कहते हैं कि तराई-मधेस के लोग और राजनीतिक दल चुनाव प्रक्रिया में भाग तो ले रहे हैं, मगर उनकी अपनी चिंताएं हैं.

वह कहते हैं, "लोग बंटे हुए हैं. एक तरफ मधेसी है जो कहते हैं कि हमारे साथ न्याय नहीं हुआ है, जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व नहीं मिला है. वे कहते हैं कि जो प्रांत बने हैं, उनमें भी हमारे साथ न्याय नहीं हुआ है, नागरिकता के प्रावधान उचित नहीं हैं. इन बातों को लेकर वहां असंतोष है. दूसरी तरफ खस आर्य और नाम की कैटिगरी बनाई है, जिनका कहना है कि यही संविधान लागू करना है. मधेस के दल चुनावों में हिस्सा तो ले रहे हैं मगर उनकी अपनी चिताएं हैं."

मधेस के मुद्दे पर क्या कहते हैं दल?

संविधान को अन्यायपूर्ण बताते हुए मधेस में तीन बार आंदोलन हुआ. वे संविधान में संशोधन की मांग कर रहे हैं. उनका कहना है कि हमें आबादी के आधार पर प्रतिनिधित्व करने का अधिकार दिया जाए, नागरिकता के नियमों को आसान बनाया जाए और नौकरियों में भी सही प्रतिनिधित्व मिले. प्रांतों के सीमांकन को लेकर भी उनमें असंतोष है. हाल ही में नेपाल में सात नए प्रदेश बनाए गए हैं.

मगर इन मांगों को लेकर राजनीतिक दल बंटे हुए हैं. कुछ दलों कहते हैं कि इसी संविधान को लागू करना है तो कुछ का कहना है कि इसमें संशोधन किया जाएगा.

वाम गठबंधन यूएमएल के नेता ईश्वर पोखरेल कहते हैं, "मधेस की जनता के साथ बैठकर बातचीत की सकती है. उन्होंने भी संविधान बनाने में योगदान दिया है. उनकी तरफ़ से आई बातों में से जो मुद्दे सुलझाए जा सकते हों, उन्हें संवैधानिक प्रक्रिया के तहत सुलझाया जा सकता है. मधेस-तराई के नेताओं से भी बातचीत हो रही है, उनसे भी हमने यही बात रखी कि देश को मजबूत बनाना है. हमारा देश अल्पसंख्यकों का देश है, हम सभी को मिलकर रहना है."

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Image caption मधेसी समुदाय मांगों को लेकर आंदोलन करता रहा है

वहीं लोकतांत्रिक गठबंधन की नेपाली कांग्रेस ख़ुद को मधेस की जनता का पैरोकार बताती है. पार्टी के सूचना अधिकारी केशव रिजाल कहते हैं, "नेपाली कांग्रेस हमेशा से मधेश की जनता के साथ है. संविधान में संशोधन करके मधेसी जनता की असंतुष्टि को बातचीत करके दूर किया जाएगा."

ऐसे में मधेसियों की मांग कैसे पूरी हो सकती है? नेपाली पत्रकार सीके लाल कहते हैं कि अगर मधेसी मतदाता मिलकर मधेसी पार्टियों को भी जिता देते हैं, तब भी वे संविधान में बदलाव नहीं ला पाएंगी.

मधेसी मदाताओं की दुविधा

सीके साल कहते हैं, "मधेसी मतदाताओं की समस्या यह है कि एक तरफ़ कुआं हैं, दूसरी तरफ़ खाई. अगर पूरे वोट मधेसी पार्टियों को मिलते हैं तब भी पूरी संसद में उनके 32 सदस्य होंगे और ये सीटें संविधान संशोधन के लिए पर्याप्त नहीं हैं. ऐसे में उन्हें किसी न किसी के साथ गठबंधन करना होगा."

अभी मधेसी पार्टियों ने वाम और लोकतांत्रिक गठबंधन से दूरी बनाई हुई है. मगर ज़रूरत पड़ने पर वे किस तरफ़ जा सकते हैं? सीके लाल कहते हैं, " सारी मधेसी पार्टियों को लगा कि दोनों गठबंधन एक तरह के हैं. मगर किसी एक को चुनना हो तो शायद वे लोकतंत्रवादियो के साथ आ सकते हैं क्योंकि नेपाली कांग्रेस नारे के लिए ही सही, संविधान संशोधन की बात तो कर रही है. वाम दल इतना भी मानने को तैयार नहीं है."

चुनाव के नतीजे आने के बाद ही साफ़ हो पाएगा कि कौन सा गठबंधन सत्ता में आ रहा है और मधेसियों की चिंताओं का समाधान काफी हद तक इसी पर निर्भर करेगा.

असंतोष दूर न हुआ तो क्या होगा?

उम्मीद जताई जा रही है कि चुनाव के बाद सारी नहीं, तो कुछ मांगों को पूरी करने के लिए सकारात्मक वातावरण बन सकता है. मगर नई सरकार तराई-मधेस के लोगों में संविधान को लेकर पैदा हुए असंतोष को नहीं सुलझा पाई, तो क्या होगा?

पत्रकार सीके लाल कहते हैं, "मतदान के अभी तक के ट्रेंड को देखें तो नेपाल में सभी चुनावों के बाद एक विभाजन सा आ जाता है और यहां तो पहले से विभाजन है. तो जो खाई पहले चौड़ी थी. अब वह गहरी भी हो जाए. हो सकता है कि यह चुनाव किसी समस्या को सुलझाने के बजाय नई समस्याएं खड़ी कर दे."

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लाल कहते हैं, "विदेशी शक्तियों की यहां रुचि रही है. कहा जाता है कि वामपंथी गठबंधन के पीछे चीन का हाथ हो सकता है और लोकतांत्रिक गठबंधन के पीछे दिल्ली का आशीर्वाद हो सकता है. मगर दोनों में अगर कोई भी उदार नहीं होगा तो मधेस भू-राजनीतिक अनाथ बनकर रह जाएगा. ऐसे में सशस्त्र विद्रोह की आशंका बढ़ जाती है. आंदोलन करने वाले परिणाम देखकर आंदोलन नहीं करते, गुस्से में करते हैं, अपनी आवाज़ उठाने के लिए करते हैं. इसलिए ऐसा ख़तरा बना हुआ है."

नेपाल की गिनती पिछड़े देशों में होती है और इसके बहुत से इलाक़ों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव रहा है.

पहले राजनीतिक अस्थिरता और फिर 2015 में आए भीषण भूकंप ने कई इलाक़ों और पीछे धकेल दिया है. लोग चाहते हैं कि अब जो सरकार बने वो स्थिर हो ताकि नेपाल विकास की राह पर आगे बढ़ सके. लेकिन नई सरकार के सामने सभी को साथ लेकर चलते हुए शांतिपूर्ण ढंग से देश के नए संविधान को अमल में लाने की चुनौती होगी.

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