नेपाल के 'बाल' माओवादियों की त्रासद कहानी

  • 15 दिसंबर 2017
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वर्ष 1996 में पहली बार माओवादी छापामारों ने नेपाल के रोल्पा ज़िले के एक पुलिस शिविर पर हमला किया. फिर शुरू हुआ हिंसा का एक ऐसा दौर जिसने एक दशक तक नेपाल को इसमें झोंके रखा.

माओवादियों और नेपाल की राजशाही के बीच चल रहे इस संघर्ष में बहुत बड़ा योगदान उन बच्चों का भी था जो उनके साथ कम उम्र में ही जुड़ गए थे.

माओवादियों का दावा था कि ये बच्चे उनकी 'विचारधारा से प्रभावित' होकर उनसे जुड़े थे. लेकिन माओवादियों पर इन बच्चों को जबरन अपनी 'पीपल्स लिबरेशन आर्मी' (पीएलए) में शामिल करवाने का आरोप था.

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माओवादियों की छापामार सेना में शामिल इन बच्चों को हथियारों से लैस किया गया. नेपाल की शाही सेना से वो भी वैसे ही लड़े जैसे बड़ी उम्र के माओवादी कमांडर.

मगर 2006 में संयुक्त राष्ट्र की देखरेख में शांति प्रक्रिया शुरू हुई और माओवादी छापामारों ने हथियार डाल दिए. फिर लोकतंत्र की बहाली हुई और माओवादियों ने नेपाल में सत्ता भी संभाल ली.

जनमुक्ति छापामार सेना यानी पीएलए का नेपाल की सेना में विलय कर दिया गया. पीएलए के कैम्प ख़त्म कर दिए गए.

शांति बहाली और माओवादियों के समायोजन की इस प्रक्रिया के दौरान, संघर्ष में शामिल बाल छापामारों को अयोग्य क़रार दे दिया गया. इन बाल लड़ाकुओं से कहा गया कि वो कम उम्र के हैं इसलिए उन्हें नेपाल की सेना में नहीं रखा जा सकता.

उनके पुनर्वास की योजना बनाई गई जिसे इन बाल लड़ाकुओं ने इसलिए अस्वीकार कर दिया क्योंकि उसमें उन्हें कुछ भी नहीं मिल रहा था. संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में चल रही इस प्रक्रिया के दौरान अयोग्य क़रार दिए गए बाल लड़ाकुओं को दस हज़ार नेपाली रूपए दिए गए.

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लेनिन बिस्ता का गांव काठमांडू से 40 किलोमीटर की दूरी पर है. महज़ 12 साल की उम्र में वो माओवादियों से जुड़ गए थे.

उनके पिता श्याम काजी बिस्ता काठमांडू की एक कपड़ा फैक्ट्री में काम करते थे. विचारधारा से समाजवादी होने की वजह से उन्होंने अपने बेटे का नाम लेनिन रखा.

2015 में आए विनाशकारी भूकंप में उनका घर क्षतिग्रस्त हो गया था. मगर बेरोज़गारी की वजह से लेनिन अपने टूटे घर की मरम्मत नहीं करवा पा रहे हैं. आज वो अपने अधिकार के लिए अपने ही नेताओं के सामने आवाज़ उठा रहे हैं.

बीबीसी से हुई मुलाक़ात में लेनिन ने कहा, "शांति प्रक्रिया के दौरान माओवादी नेताओं ने मुझसे कहा कि मैं सेना में भर्ती के लिए अयोग्य हूँ. मैंने उनसे पूछा जब हम आपके लिए लड़ रहे थे तब योग्य थे. अब कैसे अयोग्य हो गए? जब हमारे खेलने कूदने के दिन थे तब हम माओवादियों की पीएलए में बाल सैनिक बनकर लड़ रहे थे. अब इतने सालों के बाद हम कहाँ जाएँ?"

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संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार लगभग 4000 बच्चे माओवादियों की छापामार सेना में शामिल थे.

माओवादियों के सत्ता में आने के बाद इन बच्चों ने अपने ही नेताओं से अपना हक़ माँगना शुरू किया तो उनके ख़िलाफ़ भी वही हुआ जो अमूमन सरकारें विरोधियों के ख़िलाफ़ करती हैं.

कई पूर्व बाल लड़ाकुओं को जेल भेज दिया गया. इनमे से एक हैं तुलसी नेपाल जो कुछ महीनों पहले ही जेल से रिहा हुए हैं.

वो कहते हैं, "जब हमने अपनी मांगें माओवादी नेताओं के सामने रखीं तो उन्होंने हम में से कई को जेल में डाल दिया. तब माओवादियों की ही सरकार थी और प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टाराय थे. मैं चार साल तक जेल में था. यही वो लोग हैं जिनके लिए हमने हथियार उठाकर लड़ाई की थी. आज इन्होंने ही हमें जेल भेज दिया. मैंने अपना बचपन खोया, करियर खोया. परिवार और रिश्तेदारों से भी कट गया. पता नहीं क्रांति से मैंने क्या पाया? नेताओं को सत्ता मिली और हमें ठेंगा."

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इस मामले को लेकर नेपाल सरकार ने एक आयोग का गठन किया. कई पूर्व बाल छापामार इसके सामने पेश हुए और अपने अधिकारों की मांग की.

पूर्व बाल लड़ाकुओं के संगठन ने बीबीसी को वो वीडियो दिखाए जो उन्होंने आयोग के समक्ष अपनी बात रखने के दौरान बनाये थे.

इनमें से सबसे मार्मिक वीडियो पूर्व बाल लड़ाकू खड़क बहादुर रामटेल का था जिसमे वह आयोग के सामने रोते हुए दिख रहे हैं.

वीडियो में रामटेल आयोग के सदस्यों के सामने कहते हुए नज़र आये, "क्या मैं लड़ाकू नहीं था? आप हमारी समस्या का समाधान क्यों नहीं करते?"

वो पूछते हैं, "मैं पीएलए की छठी वाहिनी का प्लाटून कमांडर था. माओवादी कैसे कह सकते हैं मैं उनका सैनिक नहीं था? अब माओवादी नेता हमें धमका रहे हैं."

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शांति प्रक्रिया शुरू होने से पहले पीएलए के सदस्य रहे ये बच्चे अब युवा हो गए हैं और बेरोज़गारी की मार झेल रहे हैं.

नेपाल में संसाधनों का अभाव और रोज़गार के कम अवसर होने से इनकी ज़िन्दगी अब काफी मुश्किल हो गई है.

देश के मानव अधिकार आयोग ने भी सरकार को इनके पुनर्वास के लिए बार-बार निर्देश जारी किए हैं.

आयोग की सदस्य मोहना अंसारी ने बीबीसी को बताया कि पूर्व बाल लड़ाकुओं के मामले में नेपाल की सरकार को आयोग कई सालों से अपनी रिपोर्ट भेजता रहा हैं.

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मोहना अंसारी कहतीं हैं, "आयोग ने रिपोर्ट पिछले साल भी भेजी. इस साल भी. सरकार हमारी रिपोर्ट पर कोई कार्रवाई नहीं कर रही है. बाल लड़ाकुओं का मामला पिछले 11 सालों से लंबित है."

माओवादियों की पीएलए के बड़े कमांडर देश की सेना में फिर उसी रैंक में समायोजित कर लिए गए. जो नेता थे उनके हाथ लगी कुर्सी और सत्ता.

मगर शांति प्रक्रिया एक बाद पीएलए में शामिल बच्चे जब अपने घरों को लौटे तो वे खाली हाथ ही थे.

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