नज़रिया: 'अमरीका को उत्तर कोरिया ब्लैकमेल कर रहा है'

  • 13 दिसंबर 2017
किम जोंग उन इमेज कॉपीरइट Reuters

उत्तर कोरिया से अमरीका कभी भी बिना किसी शर्त के बातचीत के लिए तैयार है. ये पेशकश अमरीकी विदेश मंत्री रेक्स टिलरसन ने की है.

अमरीका पहले से ये कहता रहा था कि उत्तर कोरिया जब तक अपना परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम नहीं छोड़ेगा, उससे बातचीत नहीं होगी लेकिन अब अमरीकी विदेश मंत्री रेक्स टिलरसन के बयान को उत्तर कोरिया पर अमरीकी नीति में इस बयान को एक बड़े बदलाव की तरह देखा जा रहा है.

उत्तर कोरिया पर अमरीकी नीति में इस बयान को एक बड़े बदलाव की तरह देखा जा रहा है. अमरीका और उत्तर कोरिया के दरमियां इस बीच दो चीज़ें हुई हैं. पहले तो कूटनीतिक कोशिशों का एकमात्र मक़सद यही हुआ करता था कि उत्तर कोरिया अपने परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम को पूरी तरह से बंद करे.

लेकिन अब उनका हथियार कार्यक्रम वैज्ञानिक और तकनीकी लिहाज से पिछले एक साल में काफी विकसित हो गया है. उत्तर कोरिया का हथियार कार्यक्रम पहले की तुलना में अब ज्यादा दूर तक और अचूक तरीके से मार कर सकता है. अमरीका का पश्चिमी तट अब उत्तर कोरिया की मारक क्षमता की रेंज में है.

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ट्रंप का आक्रामक रुख

अमरीका मजबूरन एक ऐसे हालात में आ गया है, जहां वह जंग भी नहीं छेड़ सकता और और अगर युद्ध छिड़ गया तो इस बात की संभावना है कि उत्तर कोरिया गुआम या अलास्का जैसे अमरीकी ठिकानों पर हमला कर सकता है. इस वजह से अमरीका को मजबूरन हकीकत को कबूल करना पड़ रहा है.

दूसरी बात ये है कि अमरीका के ऊपर दक्षिण कोरिया की तरफ़ से बहुत ज्यादा दबाव पड़ रहा है. दक्षिण कोरिया अमरीका से कह रहा है कि राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप उत्तर कोरिया पर अपने आक्रामक रुख में थोड़ी नरमी लाएं.

दक्षिण कोरिया को डर है कि अगर ग़लती से युद्ध छिड़ जाता है तो शरुआती आधे-एक घंटे में राजधानी सोल में लाखों लोग मारे जा सकते हैं. दक्षिण कोरिया की आबादी का बड़ा हिस्सा राजधानी सोल और उसके आस-पास रहता है.

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उत्तर कोरिया को पेशकश

अगर युद्ध हुआ तो दक्षिण कोरिया अपने लोगों को शायद ही बचा पाए. एक तो सोल उत्तर कोरिया की रेंज में है और प्योंगयांग ऐसे में कई मिसाइलें राजधानी पर दाग सकता है. ये दो वजहें हैं, जिससे रेक्स टिलरसन ये चाह रहे हैं कि उत्तर कोरिया से बिना शर्त बातचीत शुरू हो जाए.

कोरियाई प्रायद्वीप के लिहाज से पिछला हफ्ता बहुत सक्रिय रहा. उत्तर कोरिया ने मिसाइल परीक्षण के बाद संयुक्त राष्ट्र के प्रतिनिधियों को अपने यहां बुलाया और उसके पड़ोस में दक्षिण कोरिया और अमरीका ने अब तक का सबसे बड़ा सैनिक अभ्यास किया.

लेकिन इन सब बातों के बीच ही रेक्स टिलरसन ने उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग-उन को ये पेशकश की है. अमरीका उत्तर कोरिया को ये संदेश देना चाहता है कि बातचीत की मेज पर आने से दोनों देशों का फायदा हो सकता है. ये एक तरह से अमरीका के लिए इज्जत बचाने का रास्ता भी है.

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अमरीका का खेल

जंग का फायदा किसी को भी नहीं होने वाला है. अगर गलती से भी जंग छिड़ जाती है तो दोनों कोरिया तबाह ही हो जाएंगे. उत्तर कोरिया भी अमरीका के गुआम जैसे ठिकानों पर हमला करके उसे बड़ा नुकसान पहुंचा सकता है. गुआम में अमरीका का बड़ा सैनिक अड्डा है जहां हज़ारों की तादाद में सैनिक होते हैं. इसमें फायदा किसी का नहीं है.

दरअसल उत्तर कोरिया ये चाहता है कि कोरियाई प्रायद्वीप में अमरीका को अपना प्रभुत्व बनाए रखने की इतनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ जाए कि उसे मजबूरन प्योंगयांग को वित्तीय छूट देनी पड़े. इसे दूसरे शब्दों में कुछ ऐसे कहा जा सकता है कि उत्तर कोरिया लॉन्ग टर्म में अमरीका को ब्लैकमेल कर रहा है.

उत्तर कोरिया का रुख ये है कि अगर उसे रियायतें न दी गई तो वो इस क्षेत्र में अमरीका का खेल ख़राब कर देगा. इसका नतीजा यही हो सकता है कि अमरीका उत्तर कोरिया को आर्थिक, कृषि और दूसरे तरह की रियायतें दें और बदले में प्योंगयांग अपने परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम रोक दे या फिर कुछ टेक्नॉलॉजी का इस्तेमाल छोड़ दे.

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रूस और चीन

कोरियाई देशों का झगड़ा यहीं पर आकर खत्म हो सकता है. इसके लिए जरूरी है कि बातचीत हो. इस फलक में चीन भी मौजूद रहा है लेकिन उसका कूटनीतिक प्रदर्शन असरदार नहीं रहा है. एक ताजा घटनाक्रम में रूस भी कोरियाई राजनीति में शरीक हो गया है.

अमरीका के लिए ये एक प्रतिकूल स्थिति है जहां रूस और चीन उत्तर कोरिया का समर्थन करेंगे और अमरीका वहां अलग-थलग पड़ जाएगा. साथ ही यहां सवाल ये भी है कि उत्तर कोरिया इसका कैसे जवाब देगा. अमरीका के साथ ये समस्या भी है कि उसकी तरफ से कोई ठोस प्रस्ताव नहीं दिया गया है कि वो बातचीत में करेगा क्या.

सोवियत संघ के विघटन के बाद कई देश जिनके पास परमाणु और विध्वंसक हथियार थे, उन्हें अमरीका ने पैसे और अन्य तरह के मदद की पेशकश की थी. उत्तर कोरिया के साथ भी अमरीका के तरफ़ से ऐसी ही मदद की जरूरत है.

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(अमरीका की डेलावेयर यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार मुक्तदर ख़ान से बीबीसी संवाददाता वात्सल्य राय की बातचीत पर आधारित)

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