'मिशन सीरिया' से पुतिन बने मध्य पूर्व के 'दबंग'!

  • 17 दिसंबर 2017
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साल 2015 में जब रूस ने सीरिया में सैन्य अभियान शुरू किया था तब अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भविष्यवाणी की थी कि मॉस्को 'दलदल में फंसने जा रहा है'.

तत्कालीन अमरीकी रक्षा मंत्री एश्टन कार्टर ने कहा था कि रूस की नीति 'नाकाम होनी तय है'.

ऐसा लग रहा है कि रूस ने दो साल बाद ऐसी भविष्यवाणी करने वालों को ग़लत साबित कर दिया है.

इस हफ़्ते औचक दौरे पर सीरिया गए रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने अपने देश के सैनिकों से कहा कि वो 'शानदार' तरीके से लड़े और 'विजेताओं की तरह घर लौट सकते हैं'.

उन्होंने सीरिया में मौजूद रूस की सैन्य शक्ति के 'अहम हिस्से' की वापसी का आदेश जारी कर दिया.

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मॉस्को का प्रभाव बढ़ा

तो क्या रूस का मिशन पूरा हो गया है? लगता तो ऐसा ही है.

सितंबर 2015 में अपने मिशन की जानकारी देते हुए राष्ट्रपति पुतिन ने सार्वजनिक तौर पर बताया था कि मकसद 'अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद' से संघर्ष है.

कथित इस्लामिक स्टेट को सीरिया में शिकस्त मिली है. हालांकि पश्चिमी देशों की सरकार सीरिया के उदारवादी विपक्ष को निशाना बनाने के लिए रूस की आलोचना करती रही हैं.

रूस के अभियान का एक और मक़सद था अपने सहयोगी राष्ट्रपति बशर अल असद को सत्ता में बनाए रखना. रूस ने ये लक्ष्य हासिल कर लिया.

सीरिया को रूस की ओर से मिले सैन्य समर्थन ने ज़मीन पर हालात को असद के पक्ष में ला दिया. सीरिया में सरकार बदलने की संभावना धूमिल हो गई.

अमरीका, तुर्की और सऊदी अरब शांति के लिए असद को हटाए जाने को शर्त रख रहे थे लेकिन अब वो ऐसा नहीं कर रहे हैं.

सीरिया की राजनीति में अहम बने रहने का श्रेय असद रूस के राष्ट्रपति पुतिन को देते हैं और इससे सीरिया में मास्को का प्रभाव साबित होता है.

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रूस 'बड़ा खिलाड़ी'

लेकिन मध्य पूर्व में रूस की भूमिका सिर्फ़ सीरिया तक सीमित नहीं है. रूस इस संघर्ष से पूरे क्षेत्र में 'बड़े खिलाड़ी' के तौर पर उभरा है.

  • मिस्र के हवाई क्षेत्र और हवाई पट्टी की रूस को इस्तेमाल की अनुमति देने के लिए मिस्र से बातचीत
  • तुर्की से सतह से हवा में मार करने वाली एस-400 मिसाइल प्रणाली देने के लिए बातचीत
  • सऊदी अरब से संबध सुधारने के लिए कोशिश

और पूरे मध्य पूर्व में रूस की कूटनीति सीरिया में राजनीतिक स्थिरता कायम करने के लिए कोशिश करने की है.

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अमरीकी छवि को झटका

मध्य पूर्व में रूस का दखल बढ़ रहा है तो इसके विपरीत क्षेत्र मे अमरीका की छवि समस्याओं में घिरने लगी है. अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के यरूशलम को इसराइल की राजधानी के तौर पर मान्यता देने से अरब जगत नाराज़ है. इस फ़ैसले से क्षेत्र में अमरीका की मध्यस्थ वाली छवि को धक्का लग सकता है.

सीरिया में रूस के सैन्य अभियान के वैश्विक स्तर पर भी नतीजे सामने आए हैं.

साल 2014 में क्रीमिया में दखल के बाद रूस को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलगाव का सामना करना पड़ा. लेकिन सीरिया में सैन्य अभियान ने इस स्थिति को बदल दिया. पश्चिमी देशों के नेताओं को सीरिया के मामले पर रूस के साथ बातचीत की मेज पर आना पड़ा. भले वो ऐसा करना चाहते रहे हों या फिर नहीं.

साल 2015 में रूस में कई लोगों को आशंका थी कि सीरिया उनके देश के लिए दूसरा अफ़ग़ानिस्तान बन सकता है. जहां 1980 के दशक में करीब दशक भर लंबे सैन्य अभियान में दस हज़ार से ज्यादा सोवियत सैनिक मारे गए थे.

लेकिन आधिकारिक जानकारी के मुताबिक सीरिया में 41 सैनिकों की मौत हुई है. रिपोर्टों के मुताबिक कुछ दर्ज़न निजी ठेकेदारों की मौत की जानकारी सामने आई है.

क्रेमलिन के जीत का ऐलान करने और सैनिकों की संख्या में कटौती का संकेत देने साफ है की सीरिया पुतिन का अफ़ग़ानिस्तान नहीं बनने जा रहा है.

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चुनाव में फायदा?

क्रेमलिन के नेता के तौर पर पुतिन तीन महीने के दौरान दोबारा चुनाव का सामना करने जा रहे हैं. एक उम्मीदवार के तौर पर मत अपने पक्ष में करने के लिए पुतिन का नारा हो सकता है 'मिशन पूरा हुआ.'

उम्मीदवारी के ऐलान के एक हफ्ते से भी कम वक्त के बाद पुतिन के सीरिया जाने को चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है.

हालांकि, रूस के सैनिकों की वापसी की घोषणा के बाद भी सीरिया के कुछ हिस्सों में इस्लामिक स्टेट संघर्ष कर रहा है. सीरिया में संघर्ष अभी ख़त्म नहीं हुआ है.

और ऐसी गारंटी नहीं है कि सीरिया में राजनीतिक स्थिरता लाने के रूस के प्रयास कामयाब होंगे.

अगले महीने रूस के सोची में प्रस्तावित सीरियन पीपुल्स कांग्रेस को अगले साल तक के लिए टाल दिया गया है. शांति प्रक्रिया के प्रमुख साझेदारों के बीच मतभेद बने हुए हैं.

किसी संघर्ष में जीत का ऐलान वास्तविकता में संघर्ष की समाप्ति नहीं होता. खासकर अगर संघर्ष सीरिया के युद्ध की तरह जटिल हो.

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