सांप्रदायिक तनाव की आग में झुलसने लगा है कर्नाटक?

  • 22 दिसंबर 2017
कर्नाटक चुनाव, बीजेपी इमेज कॉपीरइट Getty Images

कर्नाटक में पिछले कुछ हफ़्तों में हुई घटनाओं, जिनमें कुछ हिंसक भी थीं, से यह आशंका पैदा हो रही है कि क्या कर्नाटक में अगले साल चुनाव से पहले सांप्रदायिक तनाव बढ़ रहा है.

साल 2013 में हुए लोकसभा चुनाव से पहले भी ऐसा ही कुछ माहौल था. चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर में सांप्रदायिक दंगे हुए थे. हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच हुए इस टकराव में करीब 62 लोग मारे गए थे.

कनार्टक में हुईं सांप्रदायिक तनाव की घटनाओं को पूर्व मुख्यमंत्री और जदयू नेता एचडी कुमारस्वामी की तरह कुछ राजनेता मुज़फ़्फ़रनगर दंगों से जोड़ रहे हैं और चिंता व्यक्त कर रहे हैं.

कुमारस्वामी ने बीबीसी से कहा, ''उत्तर प्रदेश में चुनाव से पहले लगभग हर दिन सांप्रदायिक तनाव और हिंसा की स्थिति बनी रही थी. लेकिन, लोकसभा चुनाव के बाद अचानक यह सब शांत हो गया.''

''पिछले दो-तीन महीनों में, हम देख रहे हैं कि कर्नाटक में छोटे-छोट झगड़ों को तूल दिया जा रहा है. यहां अभी हालात मुज़फ़्फ़रनगर जैसे नहीं हैं लेकिन चिंता की बात ज़रूरी है.''

सड़क हादसे के बाद सांप्रदायिक तनाव

इमेज कॉपीरइट Getty Images

कुमारस्वामी ने ये बातें हाल ही में सीमावर्ती ज़िले उत्तर कन्नड़ में हुई उस घटना के बाद कही हैं जो हिंसा और आगजनी का कारण बनी थी. इस घटना में होन्नावर में एक मोटर साइकिल और ऑटोरिक्शा की टक्कर हो गई थी लेकिन फिर यह सड़क हादसा हिंदू और मुस्लिमों के बीच टकराव का कारण बन गया.

अगले दिन, 19 साल के परेश मेस्ता के माता​​-पिता ने पुलिस में उसके खोने की शिकायत दर्ज करवाई. एक दिन बाद, पुलिस को परेश की लाश एक पानी के टैंक में मिली थी.

बीजेपी की नेता शोभा करंदलाजे ने कहा, ''एक मछुआरे की लाश कैसे एक टैंक में पाई जा सकती है जबकि शहर में निषेधाज्ञा का आदेश है.'' बीजेपी कर्नाटक में मुख्य विपक्षी दल है और यहां कांग्रेस की सरकार है.

करंदलाजे की अपनी पार्टी कार्यकर्ताओं को निषेधाज्ञा की अवहेलना करने के लिए उकसाने वाले ट्वीट की कांग्रेस ने काफ़ी आलोचना की थी. हालांकि, परेश के आरएसएस का कार्यकर्ता होने के उनके दावे को परेश के माता—पिता ने सिरे से ख़ारिज कर दिया था.

पहचान छुपाने की शर्त पर एक पुलिस अधिकारी ने बताया, ''निषेधाज्ञा के आदेश की जानबूझ कर अवहेलना की गई. अगर आप होन्नावर में हालात को नियंत्रित करते हैं तो वो पड़ोस के कुमता में परेशानी पैदा करते हैं. जब एक बार सबकुछ नियंत्रण में आ जाए तो बीजेपी के नेता सिरसी में विरोध करते हैं.''

इमेज कॉपीरइट Getty Images

सिरसी से बीजेपी विधायक विश्वेश्वर हेगड़े कागरी ने कहा, ''सिरसी में, पुलिस ने इसे ​ठीक से नहीं संभाला. सबसे पहले उन्होंने किसी को विरोध जताने नहीं दिया. जब हमने कहा कि हम शांतिपूर्वक विरोध करेंगे तो उन्होंने हमें गिरफ़्तार कर लिया, जिसमें मैं भी था. जब हमें ज़मानत मिल गई तो उन्हें नए मामले दर्ज कर दिए.''

कई अन्य घटनाएं

लेकिन, कर्नाटक के इस तटीय ज़िले में यह पहला मामला नहीं है. पुलिस अधिकारियों ने पिछले कुछ महीनों में हुई घटनाओं की सूची बनाई है.

एक घटना इस साल की शुरुआत की है, जब मंगलूरू में एक नौजवान बाइक चला रहा था. एक पुलिस अधिकारी ने कहा, ''उसके दाढ़ी थी और उसे ग़लती से मुस्लिम समझकर मार दिया गया.''

21 जून को सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ़ इंडिया (एसडीपीआई) के एक्टिविस्ट अशरफ़ कलई की हत्या हो गई थी और इसने दक्षिण कन्नड़ ज़िले के बंटवाल तालुक में सांप्रदायिक तनाव को बढ़ावा दे दिया.

4 जून को आरएसएस के एक कार्यकर्ता शरथ मदिवाला की बदला लेते हुए हत्या कर दी गई जो केरल में सामने आ रही राजनीतिक हत्याओं की तरह है. इस मामले में पुलिस ने तेज़ी से काम किया और दोनों राजनीतिक पक्षों के आरोपियों को गिरफ़्तार कर लिया.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

तीन दिसंबर को मैसूर लोकसभा से सांसद प्रताप सिम्हा ने उनके कार्यकर्ता को रोकने के लिए लगाया बैरिकेड तोड़ दिया. उनके कार्यकर्ता उसी सड़क से होते हुए हनुमान जयंती मनाना चाहते थे जहां ईद मिलाद मनाई जा रही थी. सिम्हा को 100 और कार्यकर्ताओं के साथ गिरफ़्तार कर लिया गया.

श्राइन के लेकर तनातनी

चार दिसंबर को एक भीड़ चिकमगलुर ज़िले में बाबा बुदान गिरी श्राइन में संरक्षित क्षेत्र के अंदर घुस गई और वहां भगवा झंडे लगा दिए. इसके बाद पुलिस को कार्रवाई करनी पड़ी.

हिंदू संस्थान मांग कर रहे हैं कि इस गुफा जैसे श्राइन को हिंदू मंदिर घोषित कर देना चाहिए. मुसलमान और हिंदू सदियों से पहाड़ी के ऊपर प्रार्थना करते रहे हैं. मुसलमान सूफी बाबा बुदान गिरी श्राइन में और​ हिंदू श्राइन के दूसरी तरफ दत्तात्रेय मंदिर में पूजा करते हैं.

पहचान छुपाने की शर्त पर एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया, ''ये सभी व्यक्तिगत फ़ायदे के लिए सांप्रदायिक भावनाओं को भड़काकर समाज को बांटने के लिए के लिए जानबूझकर किए गए प्रयास हैं.''

मैसूर विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर मुजफ्फर अस्सादी ने बीबीसी से कहा, ''साफ़तौर पर इसका एजेंडा हिंदुत्व के लिए सामान्य, धर्मनिरपेक्ष और उदार हिंदू को सांस्कृतिक हिंदुओं में तब्दील करना है.''

प्रोफेसर अस्सादी ने कहा, ''राजनीतिक रूप से ये समाज को गोलबंद करने की कोशिश है लेकिन इसका ज़्यादा फ़ायदा नहीं है. हमारे समाज में जातिगत मसले इतने मज़बूत हैं कि उनकी उत्तर प्रदेश जैसे उत्तर भारतीय राज्यों से तुलना नहीं की जा सकती है.''

कुमारस्वामी ने कहा, ''हनुमान जयंती और ईद मिलाद कई बार एक ही दिन पड़े हैं. अब से पहले हमने कभी ऐसा तनाव नहीं देखा. इसलिए, मेरा सवाल है कि क्या वो कर्नाटक में मुज़फ़्फ़रनगर बनाना चाहते हैं.''

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

मिलते-जुलते मुद्दे