ब्लॉग: 'पाकिस्तान में चर्च के बाहर मेरी क्रिसमस कहने पर जवाब मिला, क्या मुसलमान हो?'

  • 25 दिसंबर 2017
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मैं पाकिस्तानी पंजाब के जिस शहर रहीमयार खान में 55 साल पहले जन्मा, वहां एक ही चर्च था और अब भी है, सेंट एंड्रूज कैथोलिक चर्च.

इसमें बहुत हरियाली थी, इतने दरख्त थे कि गर्मियों में भी ठंडक सी महसूस होती. मेरी पाठशाला इस चर्च के बिल्कुल सामने थी.

जब छुट्टी होती तो हम दो-चार बच्चे इस चर्च का गेट लांघ कर अंदर चले जाते.

एक-दूसरे के पीछे शोर मचाते, दौड़ते और कभी-कभी दरख्तों की छांव में ही थोड़ी देर के लिए सो जाते. इस चर्च में एक फिलिपीनो नन थीं, हमारी दादी की उम्र की.

वो हमें अपने कमरे की खिड़की से देखतीं तो पास बुलातीं और कभी टॉफियां तो कभी फल देते हुए कहतीं कि अच्छे बच्चे शोर नहीं मचाते, ख़ुदा को शोर पसंद नहीं.

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चर्च को आग लगाने की कोशिश

क्रिसमस की रात चर्च सुबह तक खुला रहता, उसे रोशनियों की दुल्हन बनाया जाता. कोई भी अंदर सर्विस में जाकर खड़ा हो सकता था.

बिल्डिंग के बाहर एक बड़ी सी मेज़ पर छोटे-छोटे केक और झालर की शक्ल में फूल सजाए जाते. एक टंकी में चाय भर दी जाती.

कोई भी ये केक खा सकता और चाय सुड़क सकता था. फिर हम बच्चे बड़े होते चले गए, फिलिपीनो नन भी कहीं चली गईं.

मैं रहीम यार खान छोड़कर कराची आ गया और वहां से लंदन चला गया.

किसी ने एक दिन बताया कि जब बाबरी मस्जिद गिराई गई तो मंदिर तो कोई मिला नहीं तो चर्च पर गुस्सा निकाला गया और कुछ प्रदर्शनकारियों ने इसका गेट तोड़ दिया.

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'यीशू मसीह की मूर्ति टूटने से न बचा सके'

फिर 9/11 के बाद जब अमरीका ने अफ़ग़ानिस्तान पर हमला किया तो कुछ बलवाइयों ने इस चर्च को आग लगाने की कोशिश की.

मगर पुलिस और फायरब्रिगेड ने तुरंत कार्रवाई की और आग बुझा दी, लेकिन वो यीशू मसीह की मूर्ति और सलीब टूटने से न बचा सके.

पिछले दिसंबर में मेरा बहुत दिनों बाद रहीमयार खान जाना हुआ. ये इत्तेफाक है कि अगले दिन क्रिसमस पड़ रहा था. छोटे मामू मुझसे उम्र में तीन साल ही बड़े हैं.

मैंने कहा- मामू चलो आज रात सेंट एंड्रूज चलते हैं क्रिसमस केक खाएंगे. कहने लगे तुम पागल हो गए हो क्या गैर-मुस्लिमों का माल खाओगे?

मैंने कहा मामू, बचपन में तो तुम मैं और दूसरे बच्चे खूब जा जाकर केक ठूंसते थे और फिलिपीनो नन से टॉफियों और फल भी लेते थे अब तुम्हें क्या हो गया है?

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'गैर-मुस्लिमों की बनाई चीज़ खाना हराम'

कहने लगे वो बचपन था मियां, हमें मालूम नहीं था कि गैर-मुस्लिमों की बनाई चीज खाना और उनसे मेलजोल बढ़ाना हराम है.

तुम अकेले जाना चाहो तो चले जाओ मुझे क्यों गुनहगार करते हो. मैं गुस्से में पैर पटकता खुद ही चल पड़ा. सेंट एंड्रूज चर्च वैसा ही था जैसा 50 साल पहले.

बस इतना बदलाव आया था कि गेट बंद था और इसके बाहर खड़े कुछ युवा अंदर जाने वाले हर पुरुष, महिला और बच्चे की तलाशी ले रहे थे.

मैंने इन तलाशी लेने वालों में से एक से मुस्कुराते हुए कहा 'मेरी क्रिसमस.' उसने घूरते हुए मुझसे पूछा, सर क्या आप मुसलमान हैं?

मैंनू पूछा, हां, मगर तुम्हें कैसे पता चला? कहने लगा सर, यहां कोई क्रिश्चन चर्च के गेट से बाहर अब 'मेरी क्रिसमस' नहीं कहता.

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