चीन और जापान क्यों हैं जानी दुश्मन?

  • 27 दिसंबर 2017
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Image caption 1931 में मंचुरिया के युद्धबंदी

जब भी जापान और चीन के दुश्मनी भरे रिश्ते और इतिहास की बात होती है तो 1937 में इसी महीने दिसंबर में चीनी शहर नानजिंग में शुरू हुए क़त्लेआम को ज़रूर याद किया जाता है.

जापानी सैनिकों ने नानजिंग शहर को अपने क़ब्ज़े में लेकर हत्या, रेप और लूट को अंजाम देना शुरू कर दिया था. यह क़त्लेआम 1937 में दिसंबर महीने में शुरू हुआ था और 1938 में मार्च महीने तक चला था.

नानजिंग में उस वक़्त के इतिहासकारों और चैरिटी संगठनों के अनुमान के मुताबिक़, ढाई से तीन लाख लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया था. इनमें ज़्यादातर महिलाएं और बच्चे थे.

बड़ी संख्या में महिलाओं से रेप भी हुआ था. हालांकि जापान के ज़्यादातर इतिहासकार इस पैमाने पर क़त्लेआम होने से इनकार करते हैं. वे रेप और हत्या की बात को स्वीकारते हैं लेकिन बड़ी तादाद से इनकार करते हैं. साथ ही यह भी कहते हैं कि ये सारी चीज़ें युद्ध के दौरान हुई थीं.

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चीन और जापान का युद्ध

1931 में जापान ने चीन के मंचूरिया में आक्रमण किया. जापान ने यह आक्रमण एक विस्फोट के बाद किया था जो जापानी नियंत्रण वाले रेलवे लाइन के पास हुआ था. इस दौरान जापानी सैनिकों का मुक़ाबला चीनी सैनिक नहीं कर पाए और जापान ने कई चीनी इलाक़ों को अपने क़ब्ज़े में ले लिया.

जापान चीन पर अपनी पकड़ मजबूत बनाता गया और चीन कम्युनिस्टों और राष्ट्रवादियों के गृह युद्ध में फंसा था. चीन के राष्ट्रवादी नेता च्यांग काई-शेक ने नानजिंग को राष्ट्रीय राजधानी घोषित किया था.

कई जापानियों को लगता है कि चीन में जापान की ज़्यादती को वहां की टेक्स्ट बुक में बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है. हालांकि यह ऐतिहासिक तथ्य है कि 1931 में जापान ने बड़ी आक्रामकता से चीन में मंचूरिया पर क़ब्ज़ा किया था.

इसके परिणामस्वरूप 1937 में एक व्यापक युद्ध की शुरुआत हुई थी और लाखों चीनियों की मौत के बाद 1945 में दूसरे विश्व युद्ध के अवसान के साथ इसका अंत हुआ था.

दूसरे विश्व युद्ध में पूर्वी एशिया जंग का मैदान बना हुआ था. इस इलाक़े में राष्ट्रीय अस्मिता को केंद्र में लाने में दूसरे विश्व युद्ध की बड़ी भूमिका रही है. चीन आज की तारीख़ में आर्थिक और सैन्य शक्ति में काफ़ी आगे निकल चुका है लेकिन इस सफर में उसके अतीत की भी ख़ासी भूमिका रही है.

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पाठ्य पुस्तकों में अपमान का इतिहास

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Image caption 1941 में जश्न मनाते जापानी सैनिक

चीन ने अपने अपमानजनक इतिहास को वहां की पाठ्य-पुस्तकों का हिस्सा बनाया और आने वाली पीढ़ी को बताया कि उनके मुल्क को कितना अपमान सहना पड़ा है.

चीन अपने नागरिकों को याद दिलाते रहता है कि उसे 1839 के पहले अफ़ीम युद्ध से लेकर दूसरे विश्व युद्ध तक कैसे जुल्म सहना पड़ा है. चीनी नागरिकों को यह नहीं भूलने दिया जाता है कि जापान और पश्चिम के उपनिवेशवादियों ने कैसे अपमानित किया है.

चीन ने 2014 में नानजिंग में मारे गए लोगों को याद में हर साल 13 दिसंबर छुट्टी रखने की घोषणा की थी. चीन जापान से नानजिंग नरसंहार के लिए माफ़ी की भी मांग कर चुका है.

चीन ने कहा था कि शिंज़ो आबे को नानजिंग स्मृति भवन में आकर माफ़ी मांगनी चाहिए. जब यूनेस्को ने नानजिंग नरसंहार से जुड़े दस्तावेजों को विश्व रिकॉर्ड के तौर पर सहेजने का फ़ैसला किया तो जापान ने कड़ी आपत्ति जताई थी और उसने यूनेस्को को फंड देना भी बंद कर दिया था.

कटुता का आलम

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प्यू रिसर्च के मुताबिक़ जापान और चीन के नागरिकों में भी काफ़ी कटुता है. प्यू रिसर्च के अनुसार केवल 11 फ़ीसदी जापानी ही चीन के बारे में सकारात्मक राय रखते हैं वहीं 14 फ़ीसदी चीनी जापान के बारे में ठीक राय रखते हैं.

कहा जाता है कि 1949 से 1976 के बीच माओ के दौर में नानजिंग में हुए क़त्लेआम की उपेक्षा की गई. इसकी एक वजह यह है कि उस दौरान चीन में कम्युनिस्टों और राष्ट्रवादियों के बीच गृहयुद्ध छिड़ा हुआ था.

राष्ट्रवादियों ने नानजिंग को राष्ट्रीय राजधानी घोषित कर दिया था और 1930 के दशक में बहुत कम कम्युनिस्ट इस शहर में रहते थे.

चीन में राष्ट्रवादियों की हार के बाद 1949 में एकीकरण शुरू किया गया था. कम्युनिस्टों का दावा है कि उन्होंने जापानियों से भी युद्ध जीता था और गृह युद्ध में भी जीत हासिल की थी.

माओ की मौत के छह साल बाद हालात तेज़ी से बदले. जुलाई 1982 में जापान के शिक्षा मंत्री ने एक टेक्स्ट बुक छपवाई और उसमें दूसरे विश्वयुद्ध में जापान की भूमिका की लीपापोती की गई.

नागरिकों के स्तर पर भी समस्या

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चीन को लगा कि अगर जापान अपनी भूमिका को भूल रहा है तो वो उसे भूलने नहीं देगा. चीन ने इस नरसंहार से जुड़ा एक संग्रहालय खोला और जापानी टेक्स्टबुक के कुछ हफ़्ते बाद ही हुआ. 1982 के पहले चीन में नानजिंग नरसंहार को लेकर कोई भी दस्तावेज प्रकाशित नहीं किया गया था.

चीन और जापान दुनिया की दूसरी और तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हैं. दोनों देशों के बीच समस्या केवल राजनयिक स्तर पर नहीं है बल्कि नागरिकों के स्तर पर भी है.

अभी दोनों देशों के बीच दो छोटे द्वीप को लेकर विवाद हुआ था. एक द्वीप सेनकाकु जो जापान में है और दूसरा द्वीप दिओयु जो की चीन में है. दोनों देशों ने यहां अपनी-अपनी जलसेनाओं की गश्ती बढ़ा दी थी.

दोनों देशों में कोई विवाद होता है तो इतिहास के गड़े मुर्दे उखाड़े जाते हैं. दूसरी तरफ़ संबंधों को बेहतर बनाने की कोशिश की जाती है तो अतीत को याद किया जाता है.

'1500 सालों में एक बार भी संबंध ठीक नहीं'

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जापान के उपप्रधानमंत्री के तौर पर तारो असो 2006 में भारत के दौरे पर आए थे. उस वक़्त उन्होंने एक बयान में कहा था, ''अतीत के 1500 सालों से भी ज़्यादा वक़्त से इतिहास का ऐसा कोई वाक़या नहीं है जब चीन के साथ हमारा संबंध ठीक रहा हो.'

1972 में जापानी प्रधानमंत्री काकुई तानका चीन के दौरे पर गए थे. उन्होंने इस दौरे में चीन से रिश्ते सुधारने की कोशिश की थी. जिस जापान ने 1930 के दशक से 40 के दशक तक चीन पर इतनी सैन्य आक्रामकता दिखाई थी उसी चीन के नायक माओ ने जापानी पीएम की मेहमानवाज़ी की थी.

जापानी पीएम काकुई से माफ़ी की बात माओ से पूछी गई तो उन्होंने कहा कि इसकी कोई ज़रूरत नहीं है. माओ ने कहा कि बिना जापानी आक्रमण के चीन में कम्युनिस्ट क्रांति संभव नहीं हो पाती.

दुश्मन का दुश्मन, दोस्त?

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Image caption नानजिंग हत्याकांड की याद में रखे गए हज़ारों जोड़े जूते

आज भी चीन में कम्युनिस्ट पार्टी का ही शासन है और शी जिनपिंग को माओ के समान दर्ज़ा दिया गया है. माओ भले जापान के अतीत के हमले को भूल गए थे, लेकिन शी जिनपिंग ने उसे और ताज़ा किया है. ईस्ट चाइना सी को लेकर दोनों देशों के बीच तनाव जगजाहिर है. साउथ चाइना सी पर भी जापान ताइवान, अमरीका और मलेशिया के साथ है.

भारत के साथ जापान के बढ़ते रिश्तों के लेकर भी चीन हरकत में है. जापान के सहयोग से भारत चीन से लगी सीमा पर आधारभूत ढांचे का विकास कर रहा है. दूसरी तरफ़ उत्तर कोरिया जापान के लिए ख़तरा बना हुआ है.

वहीं उत्तर कोरिया और चीन के बीच अच्छे संबंध किसी से छुपे नहीं है. अगर चीन और जापान के बीच शत्रुता भरा इतिहास है तो भारत और चीन के बीच भी ऐसा ही है. ऐसे में भारत और जापान की दोस्ती को समझना बहुत कठिन नहीं रहा जाता है.

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