इस साल के वो चार नेता जिन्होंने बदल दी दुनिया

  • 30 दिसंबर 2017
किम जोंग उन, डोनल्ड ट्रंप, शी जिनपिंग, व्लादिमीर पुतिन इमेज कॉपीरइट Getty Images
Image caption उत्तर कोरियाई शासक किम जोंग उन, अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप, चीनी राष्ट्रhति शी जिनपिंग और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन

साल 2017 में अमरीका को डोनल्ड ट्रंप के रूप में नया राष्ट्रपति मिला. उत्तर कोरिया अमरीका की हर चेतावनी को नज़रअंदाज़ कर लगातार बैलिस्टिक मिसाइलों का परीक्षण करता रहा.

एक तरफ़ जहां पूरी दुनिया उत्तर कोरियाई शासक किम जोंग-उन और ट्रंप की धमकियों और बातों में उलझी रही तो विश्व के मानचित्र पर चीन के मौजूदा राष्ट्रपति शी जिनपिंग और भी ताक़तवर होकर उभरे.

और ऐसा क्या हुआ साल 2017 में जिसने दुनिया की दिशा ही बदल कर रख दी?

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विरोध के बावजूद अमरीका के अरबपति डोनल्ड ट्रंप अप्रत्याशित रूप से उभरे और अमरीका के 45वें राष्ट्रपति बन व्हाइट हाउस में जा पहुंचे.

उसके बाद से कई मौजूदा मानदंडों को चुनौती दी और कई ऐसे फ़ैसले लिए जिनके कारण विवाद खड़ा हुआ.

अमरीका के कई शहरों में लोगों ने सड़कों पर उतरकर नवनिर्वाचित राष्ट्रपति के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन किया. राष्ट्रपति बनने के बाद ट्रंप ने कहा कि वो उग्र इस्लामिक चरमपंथ के ख़िलाफ़ सभ्य दुनिया को एकजुट करेंगे और इसे धरती से पूरी तरह ख़त्म कर देंगे.

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राष्ट्रपति बनने के एक साल के भीतर उन्होंने कई बहुपक्षीय संगठनों और समझौतों से बाहर जाने का फ़ैसला किया. जलवायु परिवर्तन के ख़िलाफ़ वैश्विक लड़ाई के बावजूद उन्होंने इससे दनिकलने का निर्णय लिया.

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अपने देश की संघीय जांच एजेंसी के बारे में उन्होंने कहा कि एजेंसी की प्रतिष्ठा 'तार तार' हो चुकी है. इसके बाद उन्होंने (शीत युद्ध के वक़्त से) अमरीका का दुश्मन माने जाने वाले देश की तरफ़ दोस्ती का हाथ बढ़ाया.

उन पर राष्ट्रपति चुनावों से पहले उनकी टीम ने रूसी अधिकारियों से संपर्क किया था. उन्होंने इसका बचाव किया.

ट्रंप ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मुलाक़ात की और उसके बाद कहा कि अमरीकी चुनाव में रूसी हस्तक्षेप के आरोप से राष्ट्रपति पुतिन ने ख़ुद को अपमानित महसूस किया है.

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ब्रुकिंग इंस्टिट्यूशन में अंतरराष्ट्रीय राजनीति के जानकार थॉमस राइट ने राष्ट्रपति चुनावों के बारे में कहा था कि हिलेरी क्लिंटन और डोनल्ड ट्रंप के बीच का विवादित चुनाव 1932 में हिटलर को सत्ता में लाने वाले जर्मनी में हुए चुनावों के बाद सबसे महत्वपूर्ण चुनाव हैं.

आज वो मानते हैं कि उन्होंने जो कहा वो ग़लत नहीं था.

उन्होंने बीबीसी से बातचीत में कहा, "मुझे लगता है कि वास्तव में ट्रंप को चुनने के बाद एक नया अंतरराष्ट्रीय आदेश बना चुका है."

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थॉमस राइट कहते हैं कि ट्रंप और विदेश नीति के बारे में और क्रांतिकारी बदलाव करने के संबंध में उनकी राय और पारंपरिक नौकरशाही के बीच जैसे एक द्वंद सा है.

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विदेश मंत्री रेक्स की नियुक्ति पहले ही विवादों में है और उनके और ट्रंप के बीच मतभेद की अफ़वाहें भी गरम हैं. हाल में उन्होंने ट्रंप को 'मंदबुद्धि' तक कह दिया था.

थॉमस राइट कहते हैं कि साल 2018 में ये देखना होगा कि पारंपरिक नौकरशाहों की टीम राष्ट्रपति के प्रदर्शन को रोकने की कोशिश करती है या फिर अपने हाथ खड़े कर देती है. दोनों ही सूरतों में राष्ट्रपति की मुश्किलें बढ़ सकती हैं.

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साल 2017 शुरू तक नहीं हुआ था और अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसियों ने कहा कि रूस अमरीकी राष्ट्रपति चुनावों में हस्तक्षेप कर रहा है.

इसके बाद अमरीका से ले कर स्पेन तक यहां तक कि हाल में हुए कैटेलोनिया संकट में भी रूस की परछाईं साफ दिखाई देने लगी. हालांकि पुतिन अपनी तथाकथित 'ट्रोलिंग मशीनरी' पर लगे सभी आरोपों को ख़ारिज करते रहे हैं.

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सेंटर फॉर स्ट्रैटिजिक स्टडीज़ के उपाध्यक्ष साइबर सिक्योरिटी विशेषज्ञ जेम्स एंड्रयू लुइस रूस एक तरीक़े से "दूसरे विश्व युद्ध के बाद बनाए गए उदार वर्ल्ड ऑर्डर को चुनौती देता है."

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फेक न्यूज़ के बारे में बात करते हुए वो कहते हैं कि पुतिन को एक नया हथियार मिल गया है और वो देशों के बीच संघर्ष पैदा कर रहे हैं और पश्चिमी देश इससे निपटने का तरीक़ा नहीं ढूंढ पा रहे हैं.

जेम्स एंड्रयू लुईस कहते हैं, "तकनीकी कंपनियां, जानकार मानते हैं कि इंटरनेट एक गणतांत्रिक शक्ति है, लेकिन वो इस बात की तरफ़ ध्यान नहीं देते कि इसके व्यापक दुष्प्रभाव हैं जैसे कि ट्रोल्स, भद्दे कमेंट्स और पहचान छिपा सकना."

तकनीक की दुनिया के केंद्र अमरीका के बारे में वो कहते हैं कि "इंटरनेट को ऐसे बनाया गया था जैसा कि दुनिया उत्तरी कैलिफोर्निया में ही है, लेकिन ऐसा है नहीं.

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बीते कुछ वक़्त से चीन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी मौजूदगी दर्ज़ करने की कोशिश कर रहा है और वैश्विक महत्व के मुद्दों में वो अपना पक्ष रखता है. हाल में चीनी राषट्रपति शी जिनपिंग ने इसकी पुष्टि की है कि आने वाले वक़्त में ये ट्रेंड बढ़ेगा.

हाल में दिए अपने एक भाषण में शी जिनपिंग ने आने वाले दशक के लिए अपने लक्ष्यों को सामने रखा. उन्होंने कहा "चीन एक नए युग में प्रवेश कर चुका है, जहां हमें दुनिया के केंद्रीय मंच पर अपनी जगह लेनी चाहिए."

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माओ के बाद 'सबसे ताकतवर' हुए शी जिनपिंग

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Image caption इस साल अक्तूबर में हुए कम्युनिस्ट पार्टी के सम्मेलन हुआ जिसमें सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी ने राष्ट्रपति शी जिनपिंग की विचारधारा को संविधान में शामिल करने का फ़ैसला किया

शी जिनपिंग का कहना है कि अपनी ताक़त और अंतरराष्ट्रीय प्रभाव के कारण चीन 2050 तक एक 'वैश्विक लीडर' बन जाएगा.

चीन ने 2017 से ही इसकी कोशिशें शुरू कर दी हैं. वो ऐसी परियोजनाएं लागू कर रहा है जिससे एक नया वर्ल्ड ऑर्डर बनेगा जिसके केंद्र में एशिया होगा.

इसके दो उदाहरण हैं- (1) द सिल्क रोड, जो अरबों डॉलर के निवेश से पूर्व को पश्चिम से जोड़ने की एक महत्वाकांक्षी परियोजना है (2) एशियन इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक, जो चीन में होगा और जिसे जापान और अमेरिका के विरोध के बावजूद अंतर्राष्ट्रीय समर्थन हासिल हो गया है.

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पेकिंग विश्वविद्यालय में अंतर्राष्ट्रीय मामलों के प्रोफेसर वांग डोंग का कहना है, "चीन एक तरह से वर्ल्ड ऑर्डर को बदलने की कोशिश कर रहा है? ये आप पर निर्भर करता है कि आप इसे कैसे परिभाषित करते हैं.बेशक, चीन मौजूदा वर्ल्ड ऑर्डर में अपना योगदान दे रहा है और अपने प्रस्ताव रख रहा है."

उन्होंने बीबीसी को बताया, "सैद्धांतिक पूर्वाग्रहों के कारण चीन की कोशिशों को नज़रअंदाज किया जा रहा है." वो मानते हैं कि मौजूदा वर्ल्ड ऑर्डर को एक उदार व्यवस्था के रूप में बनाया गया था, लेकिन ये पश्चिमी मानदंडों पर आधारित है और चीन इससे दूर है.

वो कहते हैं, "मुझे लगता है कि इसके बारे में एक ग़लत धारणा है. इस बात की ओर कोई ध्यान नहीं देता कि अमरीका की तुलना में चीन मौजूद व्यवस्था को बचाने की कोशिश कर रहा है."

वांग कहते हैं कि इस साल जब ट्रंप यूनेस्को, पेरिस समझौते या एशिया-प्रशांत आर्थिक सहयोग समझौते से बाहर जाने की घोषणा कर रहे थे तब चीन के शी जिनपिंग ने नेता के रूप में इस खाली जगह को भरा और जलवायु परवर्तन क मुद्दे पर भी खुल कर सामने आए.

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Image caption राष्ट्रपति बनने के तुरंत बाद डोनल्ड ट्रंप ने 'ट्रांस पैसिफिक पार्टनरशिप' (टीपीपी) से बाहर निकलने के लिए एक कार्यकारी आदेश पर दस्तख़त किए. इस व्यापार समझौते को पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा की एशिया नीति की धुरी माना जाता था जिस पर 12 देशों ने हस्ताक्षर किए थे.

लंबी दूरी की मिसाइल

उत्तर कोरिया ने इंटरकॉन्टिनेंटल मिसाइल (आईसीबीएम) का तीसरा परीक्षण किया और इसे मील का पत्थर बताया.

उत्तर कोरिया के सरकारी मीडिया की रिपोर्ट्स के मुताबिक़, शीर्ष नेता किम जोंग-उन ने कहा कि टेस्ट में यह साबित हो गया है कि अब पूरा अमरीका उनकी ज़द में है.

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जानकारों को संदेह था कि क्या वाकई उत्तर कोरिया ने ऐसी तकनीक विकसित कर ली है कि उनकी मिसाइलें अपने लक्ष्य को बिना किसी समस्या के पूरा कर सकें.

लेकिन अब उनका कहना है कि साल 2017 जिस तरह उत्तर कोरिया ने अपने परमाणु कर्यक्रम को आगे बढ़ाया है, वो अपने लक्ष्य को हसिल कर सकता है.

इसलिए सीधे तौर पर कहा जा सकता है कि परमाणु हमले का ख़तरा लौट आया है.

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अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए में कोरिया मामलों की जानकार के तौर पर काम कर चुकीं सुई माई टेरी कहती हैं, "अपने परमाणु कार्यक्रम को पूरा करने के लिए उत्तर कोरिया तकनीकी तौर पर तैयार है."

वो चेतावनी देती हैं, "अगर उत्तर कोरिया परमाणु शक्ति बन जाती है पूर्व एशिया का परिदृश्य पूरी तरह से जाएगा."

मौजूदा वक्त में सेंटर फॉर स्ट्रैटिजिक एंड सिक्योरिटी स्टडीज़ के साथ विश्लेषक के तौर पर जुड़ी सुई माई टेरी मानती हैं "उत्तर कोरिया शायद अगले साल अपने लक्ष्य के बेहद क़रीब पहुंच जाए. और ऐसे में दुनिया को एक कड़ा फ़ैसला लेना होगा- कि वो परमणु ताक़त के तौर पर उत्तर कोरिया को स्वीकार करे और उसके साथ संबंध रखे या फिर.... "

"दूसरा विकल्प है सैन्य. ज़ाहिर है इसके विनाशकारी परिणाम होंगे."

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अगर उत्तर कोरिया परमाणु शक्ति संपन्न हो जाता है तो दक्षिण कोरिया और जापान भी अपने हथियारों का भंडार बढ़ाने के बारे में सोचने को मजबूर हो जाएंगे.

सुई माई टेरी कहती हैं, "इस बात की संभावना अधिक है कि साल 2018 में भी अमरीका उत्तर कोरिया पर दवाब डालना जारी रखे. ऐसा करके वो उत्तर कोरिया को उसका लक्ष्य हासिल करने से नहीं रोक सकता."

"ऐसा कर के वो महज़ इस बात को स्वीकार करने से इनकार करेगा कि किम जोंग-उन परमाणु हमला नहीं कर सकते."

जो भी हो इस मामले में 2018 में अशांति जारी रहेगी.

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