नज़रिया: ईरान में विरोध-प्रदर्शन के मायने क्या हैं?

  • 31 दिसंबर 2017
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ईरान में पिछले कुछ दिनों से जारी विरोध-प्रदर्शनों पर दुनिया भर की नज़र गई है. आख़िर ईरान में इन विरोध-प्रदर्शनों की ज़मीन क्या है और इसका क्या असर होगा? पूरे मामले पर बीबीसी संवाददाता संदीप सोनी ने प्रोफ़ेसर मुक्तदर ख़ान से बात की. ख़ान के ही शब्दों में ही पढ़िए यह विश्लेषण-

यह प्रदर्शन आर्थिक नीतियों के ख़िलाफ़ हैं. बेरोज़गारी बहुत बढ़ गई है. मंहगाई भी बहुत बढ़ गई है और इन सारी चीज़ों से लोगों में बहुत नाराज़गी है.

लोगों को लगता है कि ईरान सीरिया और यमन में पैसे खर्च कर रहा है, लेकिन अपने ही घर में विकास के काम ठप पड़े हैं. लोग ईरान फ़र्स्ट का स्लोगन भी लहरा रहे हैं.

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अर्थव्यवस्था की समस्या से जुड़ा यह प्रदर्शन अब सत्ता परिवर्तन की मांग कर रहा है. लोग ईरान के प्रमुख धार्मिक नेता ख़मेनई का विरोध कर रहे हैं. तक़रीबन 10 से 12 शहरों में विरोध की आग फैल गई है. जिन शहरों प्रदर्शन हो रहा है वो काफ़ी धार्मिक शहर हैं.

सरकार के समर्थन में भी लोग सड़क पर उतरे हैं. हालांकि यह स्वाभाविक प्रदर्शन से ज़्यादा रणनीतिक होता है. सरकारें लोगों के विरोध-प्रदर्शन के समानांतर ऐसे प्रदर्शनों को अंजाम दिलवाती हैं.

ऐसा तुर्की में भी देखने को मिला था. ऐसा करके अंतरराष्ट्रीय समुदाय को दिखाने की कोशिश की जाती है कि सरकार पर लोगों का भरोसा बना हुई है.

अभी ईरान में सरकार के समर्थन में जितने प्रदर्शन हुए हैं वो काफ़ी छोटे हैं. दिलचस्प ये है कि जब सरकार के समर्थन में लोग सड़क पर उतरे तो सरकार विरोधी विरोध-प्रदर्शन और तेज़ हो गए.

हम कह सकते हैं कि ये विरोध-प्रदर्शन काफ़ी गंभीर हो चुके हैं. ईरान में इस तरह के प्रदर्शन कोई नई बात नहीं है. 2008 और 2009 से इस तरह के विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गए थे.

इन विरोध-प्रदर्शनों को देखें तो दो-तीन चीज़ें साफ़ नज़र आती हैं. ईरान पर अमरीका के अलावा किसी और का प्रतिबंध नहीं है. इस वजह से ईरान का तेल निर्यात अधिकतम पर है.

तेल की क़ीमत भी 40 डॉलर प्रति बैरल से 60 डॉलर प्रति बैरल हो गई है. ऐसे में ईरानी नागरिकों को पता है कि सरकार के पैसे ख़ूब आ रहे हैं, लेकिन इन पैसों का इस्तेमाल घरेलू अर्थव्यवस्ता को दुरुस्त करने के लिए नहीं हो रहा है.

लोगों के मन में यह बात मजबूती से बैठ गई है कि उनकी सरकार देश के विकास में काम करने बजाय सीरिया, यमन और इराक़ में खर्च कर रही है.

ईरान के आरोप में कितना दम?

दुनिया में कहीं भी प्रदर्शन होता है तो वहां की सरकार बड़ी आसानी से कह देती है कि विदेशी ताक़तें इसके पीछे हैं. ईरान की राजनीति में विदेशी ताक़तें तो हमेशा से रही हैं. अमरीका की इरान पर पाबंदियां कोई नई बात नहीं है.

1980 से ही हम इसे देख सकते हैं. 2009 और 2012 के आंदोलनों को देखें तो पता चलता है कि ईरान में सत्ता परिवर्तन को लेकर अमरीका कितना उतावला रहा है. 2009 में ट्विटर कुछ रीसेट करने वाला था तो हिलेरी क्लिंटन ने ट्विटर से कहा था कि ईरान में प्रदर्शन तक रीसेट रोककर रखो.

ज़ाहिर है ईरान में सरकार विरोधी कुछ भी प्रदर्शन होगा तो इसराइल और अमरीका उसे बढ़ावा देंगे. अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान में विरोध-प्रदर्शनों को लेकर ट्वीट करना शुरू कर दिया है.

अगर ट्रंप ईरान के विपक्ष को खुलकर समर्थन करना शुरू कर देंगे तो वहां वो अप्रासंगिक हो जाएंगे. इसलिए बेहतर होगा कि ट्रंप इससे दूर रहें और समर्थन भी कम करें. वो दुनिया के अन्य नेताओं को भी बोलने दें तो ज़्यादा अच्छा रहेगा.

क्या अमरीका फ़ायदा उठा पाएगा?

ईरानी राष्ट्रपति रूहानी को कट्टर नहीं माना जाता है. उन्हें चुनाव में रूढ़िवादी नेताओं के विरोध का सामना करना पड़ा है. ईरान में लोकतंत्र है, लेकिन इसकी जड़ें बहुत मजबूत नहीं हैं.

ऐसे लोकतंत्र में रूहानी लोगों ज़्यादा आज़ादी देने की बात करते हैं. रूहानी ने ख़मेनई की सहमति के बिना ओबामा से परमाणु समझौता किया था. ऐसे में ईरान में विरोध-प्रदर्शन के दो मायने हो सकते हैं.

पहला यह कि वहां का रूढ़िवादी नेतृत्व लोगों को रूहानी के ख़िलाफ़ भड़का रहा है, लेकिन विरोध-प्रदर्शन में रूढ़िवादी शामिल होते तो नारे रुहानी के ख़िलाफ़ लगते. पर यहां नारे ख़मेनई के ख़िलाफ़ लग रहे हैं.

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ईरान की जो सोसायटी है वो काफ़ी आभिजात्य है. वो दुनिया को समझती है. वो दुनिया के ग्लोबल ट्रेंड को भी समझती है. हाल ही में ईरान में चुनाव हुए हैं इसलिए दोबारा चुनाव की गुंजाइश नहीं है.

ऐसा अभी नहीं लग रहा है कि अरब स्प्रिंग की ओर यह विरोध-प्रदर्शन बढ़ रहे है. इस विरोध प्रदर्शन का असर यो हो सकता है कि रूहानी और उदारीकरण लेकर आएं.

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